बॉस बनकर आया वॉट्सएप मैसेज और शुरू हुआ ठगी का खेल
राजस्थान के जोधपुर शहर से साइबर ठगी का एक बेहद हैरान करने वाला मामला सामने आया है। यहां शातिर ठगों ने तकनीक का इस्तेमाल कर लोगों को आसानी से अपने जाल में फंसाने का नया पैंतरा आजमाया है। मामला जोधपुर के पॉश इलाके सरदारपुरा का है, जहां रहने वाले एक युवक को साइबर ठगों ने अपना शिकार बनाया। ठगों ने हूबहू किसी बड़े अधिकारी या बॉस की तरह बर्ताव करते हुए वॉट्सएप पर चैट की और पीड़ित को इस बात का जरा भी अहसास नहीं होने दिया कि वह किसी असली बॉस से नहीं बल्कि एक शातिर अपराधी से बात कर रहा है। इस पूरी घटना ने एक बार फिर डिजिटल दुनिया में सुरक्षा और सतर्कता को लेकर कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
साइबर अपराध के बढ़ते मामलों के बीच ठग अब रोजाना नए-नए हथकंडे अपना रहे हैं। कभी केवायसी के नाम पर तो कभी लॉटरी के नाम पर लोगों को लूटा जाता था, लेकिन इस बार मामला पेशेवर और व्यक्तिगत पहचान से जुड़ा हुआ था। ठगों ने बड़े ही शातिर तरीके से पीड़ित के कार्यस्थल के माहौल और बॉस के रुतबे का फायदा उठाया। पुलिस अब इस बात की गहराई से जांच कर रही है कि आखिर ठगों के पास पीड़ित की और उसके बॉस की इतनी सटीक जानकारी कैसे पहुंची। शुरुआती जांच में यह सामने आया है कि इस प्रकार के अपराधों में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध जानकारियों का दुरुपयोग किया जाता है।
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विदेशी नंबर से आया संदेश, खुद को बताया कंपनी का सर्वेसर्वा
सरदारपुरा थाने में दर्ज कराई गई एफआईआर के मुताबिक, यह पूरी घटना 15 अगस्त की रात करीब 9 बजे हुई। पीड़ित नितेश जेठानी के मोबाइल पर अचानक एक विदेशी नंबर से वॉट्सएप मैसेज आया। मैसेज भेजने वाले ने अपनी डीपी और स्टाइल ऐसी रखी थी जिससे वह बिल्कुल नितेश का बॉस लगे। संदेश में कहा गया कि वह किसी जरूरी काम में व्यस्त है और उसे तुरंत कुछ एप्पल गिफ्ट कार्ड्स की जरूरत है। ठग ने नितेश को निर्देश दिया कि वह तुरंत ऑनलाइन माध्यम से एप्पल गिफ्ट कार्ड खरीदे और उनके कोड वॉट्सएप पर शेयर कर दे। बॉस का आदेश समझकर नितेश ने बिना किसी शक के इस पर तुरंत अमल करना शुरू कर दिया।
साइबर विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में स्कैमर्स आमतौर पर सोशल मीडिया जैसे लिंक्डइन, फेसबुक या इंस्टाग्राम से दफ्तर के अधिकारियों और कर्मचारियों की पूरी फेरहिस्त निकाल लेते हैं। वे फर्जी वॉट्सएप अकाउंट बनाते हैं जिसमें बॉस की तस्वीर लगी होती है ताकि सामने वाला कर्मचारी जरा भी शक न कर सके। 15 अगस्त की रात का समय होने के कारण दफ्तर बंद थे और लोग अपने घरों में थे, इसलिए ठगों ने इसी समय को सबसे मुफीद मानकर इस सुनियोजित ठगी को अंजाम दिया। पीड़ित नितेश को लगा कि उसके बॉस को किसी इमरजेंसी में इन गिफ्ट कार्ड्स की जरूरत है, जिसके चलते उसने तुरंत ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म्स का रुख किया।
मां और दोस्तों के खातों से खरीदे गए लाखों रुपए के गिफ्ट कार्ड्स
ठगों की मांग यहीं नहीं रुकी। पहले चरण में नितेश ने अपने अमेजन अकाउंट से 1.10 लाख रुपए के कुल 11 एप्पल गिफ्ट कार्ड खरीदे और उनके कोड कथित बॉस को भेज दिए। इसके बाद भी जब ठग का पेट नहीं भरा तो उसने और पैसों की मांग की। भरोसे में फंसे नितेश ने अपनी मां निशा जेठानी के अमेजन खाते से भी 60 हजार रुपए के 6 और गिफ्ट कार्ड खरीदे और उनके कोड भी वॉट्सएप पर फॉरवर्ड कर दिए। इस तरह पहले ही राउंड में करीब 1 लाख 70 हजार रुपए की चपत लग चुकी थी, लेकिन ठगों का लालच अभी और बढ़ गया था।
"मुझे पूरी तरह यकीन हो गया था कि मैं अपने असली बॉस से बात कर रहा हूं। उनकी बातें करने का तरीका और तात्कालिकता दिखाने का अंदाज बिल्कुल दफ्तर जैसा था। जब उन्होंने और पैसों की मांग की तो मैंने अपने दोस्तों से मदद मांगने में भी संकोच नहीं किया। मुझे क्या पता था कि यह एक बहुत बड़ा जाल है जिसमें मैं फंसता चला जा रहा हूं।" — नितेश जेठानी, पीड़ित
परिस्थिति की गंभीरता को समझते हुए नितेश ने अपने दोस्तों से भी संपर्क साधा। उसने अपने एक दोस्त से करीब 1.30 लाख रुपए और दूसरे दोस्त से करीब 1.70 लाख रुपए के गिफ्ट कार्ड्स की व्यवस्था करवाई। इन सभी नए कार्ड्स के कोड भी लगातार आरोपी के वॉट्सएप नंबर पर भेजे जाते रहे। इस तरह देखते ही देखते कुछ ही घंटों के भीतर कुल मिलाकर तीन लाख रुपए से ज्यादा की रकम साइबर ठगों के खाते में समा गई। जब बाद में असली बॉस से इस बारे में बातचीत हुई तब जाकर नितेश को अहसास हुआ कि उसके साथ एक बहुत बड़ा धोखा हो चुका है।
पुलिस जांच और तकनीकी साक्ष्यों की पड़ताल
घटना के तुरंत बाद पीड़ित ने जोधपुर के सरदारपुरा पुलिस थाने पहुंचकर पूरे मामले की औपचारिक शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने आईपीसी और आईटी एक्ट की प्रासंगिक धाराओं के तहत मामला दर्ज कर इसकी गहन छानबीन शुरू कर दी है। पुलिस कमिश्नरेट की साइबर सेल की टीम उन तमाम मोबाइल नंबरों, वॉट्सएप चैट्स और बैंक ट्रांजैक्शन की तकनीकी डिटेल्स खंगाल रही है जिनका इस्तेमाल इस ठगी में किया गया था। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि गिफ्ट कार्ड्स को भुनाने (रिडीम) वाले मर्चेंट और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स से भी संपर्क साधा जा रहा है ताकि अपराधियों तक जल्द से जल्द पहुंचा जा सके।
जांच अधिकारियों के अनुसार, एप्पल गिफ्ट कार्ड्स और इस तरह के अन्य डिजिटल वाउचर्स साइबर क्रिमिनल्स के बीच बहुत लोकप्रिय होते जा रहे हैं क्योंकि इन्हें ट्रैक करना और कैश में बदलना पारंपरिक बैंक खातों की तुलना में अलग तरीके से होता है। पुलिस का यह भी मानना है कि इस गिरอง के तार देश के बाहर या अन्य राज्यों से जुड़े हो सकते हैं क्योंकि जिस नंबर का इस्तेमाल किया गया था वह एक विदेशी नंबर था। पुलिस ने आम जनता से भी अपील की है कि यदि उनके पास भी इस तरह के कोई संदिग्ध संदेश आते हैं, तो बिना वेरिफ़िकेशन के कोई भी वित्तीय लेनदेन न करें।
बढ़ते साइबर अपराध और जनता के लिए जरूरी सबक
यह मामला एक बार फिर डिजिटल युग की विसंगतियों और खतरों को उजागर करता है। आज के समय में जब हर काम ऑनलाइन और स्मार्टफोन के जरिए हो रहा है, अपराधियों ने भी अपने तरीके पूरी तरह बदल लिए हैं। वॉयस क्लोनिंग, एआई जनरेटेड तस्वीरें और इस तरह की सोशल इंजीनियरिंग तकनीकें आम आदमी को आसानी से भ्रमित कर देती हैं। दफ्तरों में काम करने वाले कर्मचारियों को विशेष तौर पर ऐसे मामलों में सतर्क रहने की आवश्यकता है। यदि कोई उच्च अधिकारी अचानक से पैसों की मांग करे या गिफ्ट कार्ड्स मांगे, तो हमेशा फोन कॉल करके या आमने-सामने मिलकर उसकी पुष्टि अवश्य कर लेनी चाहिए।
विशेषज्ञों का सुझाव है कि किसी भी अनजान लिंक पर क्लिक करने या वॉट्सएप पर आने वाले पैसों के संदेशों पर आंख मूंदकर भरोसा करने से बचना चाहिए। कंपनियां और संस्थान भी अपने स्तर पर कर्मचारियों के बीच साइबर सुरक्षा को लेकर जागरूकता अभियान चला रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद जागरूकता की कमी के कारण लोग ठगी का शिकार हो रहे हैं। जोधपुर की यह घटना पूरे समाज के लिए एक बड़ा सबक है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सुरक्षा उपायों का पालन करना कितना अनिवार्य हो चुका है। पुलिस इस मामले में जल्द ही कुछ बड़े खुलासे करने का दावा कर रही है।






