जब घर का कोई युवा पहली जॉब शुरू करता है, तो परिवार को लगता है कि अब उसकी जिंदगी एक सही रास्ते पर आ गई है। लेकिन कुछ ही महीनों बाद जब वही युवा यह कहने लगे कि उसे यह नौकरी छोड़नी है, तो घर में चिंता और कई तरह के सवाल उठने लगते हैं। बड़े-बुजुर्ग अक्सर यह मान लेते हैं कि आजकल के बच्चों में 'पेशेंस' यानी सब्र की कमी है या फिर वे जिम्मेदारी से भाग रहे हैं। लेकिन क्या नौकरी छोड़ने की इस इच्छा का मतलब हमेशा काम से जी चुराना होता है?
सिर्फ सैलरी नहीं, मानसिक सुकून भी है प्राथमिकता
आज की युवा पीढ़ी यानी जेन जी (Gen Z) के लिए ऑफिस या नौकरी सिर्फ महीने के अंत में मिलने वाले पैसे का जरिया भर नहीं है। वे अपने काम के साथ-साथ अपनी पर्सनल लाइफ, मेंटल पीस और जीवन में आगे बढ़ने के मौकों को भी बहुत अहमियत देते हैं। इसलिए उनके नौकरी छोड़ने के फैसले को सही से समझने के लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि वे ऐसा कदम क्यों उठा रहे हैं।
अगर किसी कर्मचारी को हर दिन काम पर जाने से भारी स्ट्रेस हो, ऑफिस का माहौल जहरीला हो या काम में कोई रचनात्मकता या रुचि न बचे, तो वह दूसरी बेहतर संभावनाओं की तलाश करने लगता है। इसका कतई यह अर्थ नहीं है कि वह मेहनत से डरता है, बल्कि इसका मतलब है कि वह अपने लिए एक सही और सकारात्मक माहौल की तलाश में है।
Corporate Culture & Gen Z: जब काम और मेंटल हेल्थ के बीच उलझ जाए युवा पीढ़ी, क्या है सही रास्ता?
डेलॉयट रिपोर्ट और वर्क-लाइफ बैलेंस का सच
डेलॉयट की एक रिपोर्ट के अनुसार, जेन जी के लिए कार्यस्थल पर तरक्की के मौके और पर्सनल-प्रोफेशनल लाइफ का संतुलन सबसे ऊपर आता है। भारत में करियर या अपनी कार्यक्षेत्र बदलने वाले जेन जी युवाओं में से करीब 39% ने बेहतर 'वर्क-लाइफ बैलेंस' को इसकी मुख्य वजह बताया, जबकि इतने ही युवाओं ने बेहतर 'करियर ग्रोथ' को इसका कारण माना। वहीं, सिर्फ 28% युवाओं ने बेहतर वेतन (सैलरी) को प्राथमिकता दी। इससे साफ जाहिर होता है कि युवाओं के फैसलों के पीछे कई गहरे सामाजिक और मानसिक कारण जुड़े होते हैं।
क्या हर बार नौकरी छोड़ना सही है?
दूसरी तरफ, यह भी सच है कि हर बार नौकरी छोड़ना कोई समझदारी भरा कदम नहीं होता। नई जगह पर तालमेल बिठाने में थोड़ा वक्त लगता है और कई बार शुरुआती दौर में काम कठिन लग सकता है। इसलिए बिना किसी ठोस प्लानिंग या वित्तीय बैकअप के नौकरी छोड़ने से बचना चाहिए। युवाओं को चाहिए कि वे अपने सीनियर से खुलकर बात करें और बिना सोचे-समझे कोई बड़ा फैसला न लें। वहीं परिवारों को भी चाहिए कि वे अपने बच्चों की मानसिक परेशानियों को सुनें और उन्हें सही दिशा में मार्गदर्शन दें।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वायरल इस चर्चा और रिपोर्ट्स के दावों की सत्यता की 'The Freelance' स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है। यह विषय वर्तमान कॉर्पोरेट संस्कृति और युवाओं के बीच व्यापक चर्चा का केंद्र बना हुआ है। जानकारी साभार: रिपोर्ट्स एवं संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स।
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