ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में इन दिनों शिक्षा व्यवस्था और शिक्षकों के भविष्य को लेकर एक बार फिर बड़ा घमासान मचा हुआ है। राज्य के विभिन्न सरकारी प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में अपनी सेवाएं दे रहे करीब 13,000 जूनियर शिक्षकों ने अपनी नौकरियों को नियमित करने की मांग को लेकर जोरदार प्रदर्शन किया है। हाथों में तख्तियां लिए और सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए इन शिक्षकों ने साफ कर दिया है कि जब तक उनकी मांगों पर ठोस कदम नहीं उठाया जाता, तब तक उनका यह आंदोलन थामने वाला नहीं है।
भुवनेश्वर के महात्मा गांधी मार्ग पर उमड़ी शिक्षकों की भारी भीड़
गुरुवार को ओडिशा जूनियर टीचर्स एसोसिएशन के आह्वान पर राज्यभर से आए हजारों जूनियर शिक्षक भुवनेश्वर के ऐतिहासिक महात्मा गांधी मार्ग पर धरने पर बैठ गए। सुबह से ही शुरू हुए इस प्रदर्शन में शिक्षकों का गुस्सा साफ तौर पर देखने को मिल रहा था। शिक्षकों का कहना है कि वे बीते कई सालों से स्कूलों में बच्चों का भविष्य संवार रहे हैं, लेकिन उनकी खुद की नौकरी का भविष्य अब भी अधर में लटका हुआ है। संविदा आधारित नियुक्ति व्यवस्था के कारण उन्हें न तो वे तमाम सुविधाएं मिलती हैं जो एक नियमित सरकारी शिक्षक को मिलती हैं, और न ही उनके करियर को लेकर कोई स्थिरता है।
इस विरोध प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा के भी कड़े इंतजाम किए गए थे, लेकिन शिक्षकों के जोश और आक्रोश के आगे प्रशासन भी सतर्क नजर आया। एसोसिएशन के नेताओं ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने जल्द ही इस दिशा में कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया, तो इस आंदोलन को और अधिक तीव्र किया जाएगा। जरूरत पड़ने पर इस प्रदर्शन को ओडिशा के अन्य जिलों और ग्रामीण इलाकों तक भी विस्तार दिया जा सकता है, जिससे प्रशासनिक मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।
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मुख्यमंत्री की मंजूरी के बाद भी क्यों अटका है नियमितीकरण?
इस पूरे विवाद की जड़ में सरकारी प्रक्रियाओं की सुस्ती और कानूनी पेंच फंसे हुए हैं। कुछ समय पहले राज्य के मुख्यमंत्री मोहन चरण मांझी ने राज्य में स्कीम आधारित जूनियर शिक्षकों के नियमितीकरण की फाइल को हरी झंडी दिखाई थी। मुख्यमंत्री की इस मंजूरी के बाद शिक्षा जगत में एक उम्मीद की किरण जागी थी कि अब इन शिक्षकों के दिन बहुरेंगे। इसके तुरंत बाद, स्कूल एवं जन शिक्षा विभाग ने 2 अप्रैल को एक आधिकारिक अधिसूचना जारी कर नियमितीकरण की प्रक्रिया शुरू करने के संकेत दिए थे।
योजना के मुताबिक, इन शिक्षकों की नियुक्ति 2023-24 के शिक्षक सत्र में हुई थी और सरकार की यह मंशा थी कि इन्हें इनकी शुरुआती नियुक्ति की तारीख से ही नियमित कर दिया जाए। हालांकि, ज़मीनी हकीकत कागजी घोषणाओं से बिल्कुल उलट साबित हुई। विभाग की ओर से प्रक्रिया तो आगे बढ़ाई गई, लेकिन अभी तक धरातल पर एक भी स्कीम आधारित जूनियर टीचर को नियमित नहीं किया जा सका है। यही कारण है कि शिक्षकों का प्रशासनिक व्यवस्था से मोहभंग हो चुका है और वे सड़कों पर उतरने को मजबूर हुए हैं।
ओडिशा हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश और कानूनी विवाद
नियमितीकरण की यह राह इतनी आसान नहीं थी जितनी कि शिक्षकों को उम्मीद थी। प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही यह पूरा मामला कानूनी विवादों के दलदल में फंस गया। राज्य के कुछ संविदा शिक्षकों ने ही नियमितीकरण की इस प्रक्रिया के खिलाफ ओडिशा हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिकार्ताओं की मुख्य आपत्ति वरिष्ठता यानी सिनियरिटी के मुद्दे को लेकर थी। उनकी दलील थी कि यदि 2023-24 के नए शिक्षकों को उनकी प्रारंभिक नियुक्ति की तिथि से ही नियमित कर दिया जाता है, तो वे वरिष्ठता सूची में उन शिक्षकों से ऊपर आ जाएंगे जिनकी भर्ती उनसे काफी पहले हुई थी।
इस कानूनी याचिका पर सुनवाई करते हुए गत 14 अप्रैल को ओडिशा हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के नियमितीकरण के फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी थी। अदालत ने सरकार से इस पूरी प्रक्रिया के लिए तय किए गए नियमों और मानदंडों का पूरा ब्योरा मांगा था और इस संबंध में एक विस्तृत हलफनामा दाखिल करने के निर्देश दिए थे। कोर्ट के इस आदेश के बाद से ही नियमितीकरण की पूरी प्रक्रिया पर कानूनी ताला लग गया है, जो अब तक खुला नहीं है।
सरकार पर हलफनामा दाखिल न करने का गंभीर आरोप
आंदोलन कर रहे जूनियर शिक्षकों का सबसे बड़ा गुस्सा इस बात को लेकर है कि हाईकोर्ट के सख्त निर्देशों के इतने महीने बीत जाने के बावजूद राज्य सरकार की ओर से अभी तक अदालत में जवाब या हलफनामा दाखिल नहीं किया गया है। शिक्षकों का आरोप है कि सरकार की इस उदासीनता और ढुलमुल रवैये के कारण ही मामला लगातार खिंच रहा है और कोर्ट की रोक हटने का नाम नहीं ले रही है। यदि सरकार ने समय रहते अदालत में अपना पक्ष मजबूती से रखा होता, तो आज यह स्थिति पैदा नहीं होती।
"हम लंबे समय से शिक्षा विभाग और सरकार के चक्कर काट रहे हैं। हमने अपनी जवानी और मेहनत इन स्कूलों को दी है, लेकिन आज भी हमें संविदा के दर्जे पर ही काम करना पड़ रहा है। सरकार जल्द से जल्द हाईकोर्ट में अपना हलफनामा दाखिल करे और हमारी नौकरी को नियमित करने का रास्ता साफ करे।" — ओडिशा जूनियर टीचर्स एसोसिएशन के प्रतिनिधि
शिक्षकों का कहना है कि वे केवल अपनी हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। उनकी मांग है कि सरकार अदालत में अटके इस मामले की पैरवी तेजी से करे और कानूनी अड़चनों को दूर करे ताकि हजारों परिवारों का भविष्य सुरक्षित हो सके। संविदा जैसी शोषणकारी व्यवस्था से मुक्ति पाना उनका मूल अधिकार बन चुका है।
भविष्य की रणनीति और शिक्षकों की दो टूक मांगें
वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए ओडिशा जूनियर टीचर्स एसोसिएशन ने अपनी भविष्य की रणनीति स्पष्ट कर दी है। उनकी सबसे प्रमुख और पहली मांग यही है कि उनकी नौकरियों को संविदा या किसी भी अन्य अस्थाई व्यवस्था से पूरी तरह बाहर किया जाए और उन्हें एक नियमित और पूर्ण सरकारी शिक्षक का दर्जा दिया जाए। इसके अलावा, वे चाहते हैं कि सरकार बिना किसी और देरी के अदालत में आवश्यक दस्तावेज पेश करे।
यदि आने वाले दिनों में सरकार इस पर कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाती है, तो शिक्षकों का यह रोष एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन का रूप ले सकता है। आगामी दिनों में विपक्षी दल भी इस मुद्दे को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी कर सकते हैं। फिलहाल, सबकी निगाहें ओडिशा सरकार के अगले कदम और हाईकोर्ट के रुख पर टिकी हुई हैं कि कब इन 13,000 शिक्षकों के जीवन में नियमितता का उजाला आ पाएगा।





