अजरबैजान के स्कूलों में नया ड्रेस कोड और हिजाब पर छिड़ा विवाद
मध्य एशिया और काकेशस क्षेत्र के प्रमुख देश अजरबैजान में इन दिनों स्कूली शिक्षा प्रणाली और धार्मिक पहचान को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। देश के प्राथमिक और उच्च विद्यालयों में सरकार द्वारा नए ड्रेस कोड लागू किए जाने के बाद से माहौल गरमाया हुआ है। इन नए नियमों के तहत स्कूलों में ऐसे किसी भी परिधान को पहनने पर पाबंदी लगा दी गई है जो देश की आधिकारिक शिक्षा व्यवस्था के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के अनुकूल नहीं माने जाते हैं। हालांकि आधिकारिक दस्तावेजों में सीधे तौर पर 'हिजाब' शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया है, लेकिन इसका जमीनी असर यह हुआ है कि इस्लामी लिबास या हिजाब पहनकर स्कूल पहुंचने वाली छात्राओं और महिला शिक्षकों को परिसरों में प्रवेश से रोका जा रहा है।
इस अप्रत्याशित पाबंदी के सामने आने के बाद कई शिक्षण संस्थानों के बाहर छात्राओं और अभिभावकों ने कक्षाओं का बहिष्कार कर अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया है। स्थानीय प्रशासन और प्रदर्शनकारी छात्राओं के बीच उपजे इस गतिरोध ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भूचाल ला दिया है। विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला केवल ड्रेस कोड तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आधुनिक शिक्षा व्यवस्था और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच की बारीक रेखा को लेकर छिड़ी एक बड़ी बहस का रूप ले चुका है.
अजरबैजान की कुल आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा इस्लाम धर्म का अनुयायी है, ऐसे में इस प्रकार के प्रतिबंध का लागू होना आम जनता को हैरान करने वाला साबित हुआ है। देश के विभिन्न हिस्सों से मिल रही ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, कई परिवारों ने इसे अपनी धार्मिक मान्यताओं पर सीधा हमला करार दिया है, जबकि दूसरी ओर सरकारी अमला देश के सेकुलर ढांचे को हर हाल में बनाए रखने के अपने रुख पर पूरी तरह कायम नजर आ रहा है.
96 प्रतिशत मुस्लिम आबादी और देश का धर्मनिरपेक्ष संविधान
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प और पेचीदा पहलू यह है कि अजरबैजान की लगभग 96 प्रतिशत आबादी खुद को मुस्लिम मानती है। इनमें शिया और सुन्नी दोनों ही समुदायों के लोग बड़ी संख्या में शामिल हैं। इसके बावजूद, देश का संवैधानिक ढांचा पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष है। सोवियत संघ के विघटन के बाद स्वतंत्र हुए इस राष्ट्र ने अपने संविधान में धर्म को राज्य की राजनीति और शासन प्रणाली से पूरी तरह अलग रखा है, साथ ही प्रत्येक नागरिक को अपने धार्मिक विश्वासों का पालन करने की स्वतंत्रता भी दी है।
सरकार का तर्क है कि देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को बनाए रखने के लिए सभी सरकारी संस्थानों, विशेषकर शैक्षणिक संस्थानों में एकरूपता और अनुशासन होना बेहद जरूरी है। शिक्षा मंत्रालय का मानना है कि स्कूलों में सभी छात्र एक समान पोशाक में नजर आने चाहिए, जिससे किसी भी प्रकार के वैचारिक या धार्मिक भेदभाव के लिए कोई गुंजाइश न बचे। सरकार की इसी दलील के सहारे प्रशासनिक अधिकारी स्कूलों में सख्त नियमों को लागू करवाने में जुटे हुए हैं, जिसके चलते हिजाब पहनने वाली छात्राओं को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
दूसरी तरफ, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और धार्मिक संगठनों का कहना है कि धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देने वाले संविधान के दायरे में रहकर अपनी पसंद के कपड़े पहनना नागरिकों का बुनियादी अधिकार होना चाहिए। शिक्षा संस्थानों के भीतर इस प्रकार की सख्ती से छात्रों के मानसिक विकास पर भी बुरा असर पड़ रहा है। देश के भीतर लगातार बढ़ते इस विरोध प्रदर्शन ने नीति निर्माताओं की नींद उड़ा दी है और आने वाले दिनों में यह विवाद और अधिक तूल पकड़ सकता है.
पड़ोसी देशों तुर्की और ईरान की तीखी प्रतिक्रिया
अजरबैजान के भीतर चल रहा यह आंतरिक विवाद अब क्षेत्रीय कूटनीति का एक बड़ा मुद्दा बन गया है। इस फैसले की आंच पड़ोसी देशों तक पहुंच चुकी है। तुर्की, जो कि अजरबैजान का एक बेहद करीबी और रणनीतिक सहयोगी देश माना जाता है, वहां के राजनीतिक और धार्मिक हलकों से इस पर कड़ी नाराजगी जताई गई है। तुर्की के कई नेताओं और संगठनों ने अजरबैजान के स्कूलों में हिजाब बैन को अनुचित करार दिया है।
स्थिति तब और अधिक तनावपूर्ण हो गई जब ईरान के कट्टरपंथी धार्मिक समूहों ने इस कदम को सीधे तौर पर 'शैतानी कदम' और इस्लाम विरोधी कार्रवाई करार दे दिया। ईरान के प्रभावशाली धार्मिक हलकों ने अजरबैजान सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए चेतावनी दी है कि इस तरह के फैसलों से क्षेत्रीय सद्भाव बिगड़ सकता है। ईरानी मीडिया और धार्मिक वक्ताओं ने भी इस मुद्दे पर मुखर होकर अजरबैजान सरकार की नीतियों की आलोचना की है, जिससे दोनों पड़ोसी देशों के बीच कूटनीतिक हलकों में खलबली मच गई है.
"देश के आंतरिक मामलों में किसी भी बाहरी देश या ताकत को दखल देने का कोई अधिकार नहीं है। अजरबैजान एक संप्रभु राष्ट्र है और अपने संविधान के अनुसार फैसले लेने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है। दोनों देशों के बीच कृत्रिम तनाव पैदा करने के प्रयासों को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।" — अजरबैजान सत्तारूढ़ दल के प्रवक्ता
अजरबैजान सरकार का कड़ा रुख और द्विपक्षीय संबंधों में तनाव
विदेशी मंचों और पड़ोसी देशों से मिल रही तीखी आलोचना के बाद अजरबैजान की सरकार ने बेहद सख्त और स्पष्ट रुख अपनाया है। देश की सत्तारूढ़ पार्टी ने आधिकारिक तौर पर कड़े शब्दों में बयान जारी कर तुर्की और अन्य बाहरी ताकतों को साफ चेतावनी दी है कि वे उसके आंतरिक मामलों से दूर रहें। सरकार ने स्पष्ट आरोप लगाया है कि कुछ ताकतें दोनों देशों के बीच अनावश्यक रूप से कृत्रिम तनाव पैदा करने की कोशिश कर रही हैं, जिसे सफल नहीं होने दिया जाएगा।
इस कूटनीतिक बयानबाजी के बाद अजरबैजान और तुर्की के पारंपरिक रूप से बेहद मजबूत माने जाने वाले रिश्तों में भी हल्की दरारें आती हुई दिखाई दे रही हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यदि इस विवाद को समय रहते बातचीत के जरिए नहीं सुलझाया गया, तो यह मध्य एशिया और काकेशस क्षेत्र के भू-राजनीतिक समीकरणों को गहराई से प्रभावित कर सकता है। कूटनीतिक जानकारों के अनुसार, क्षेत्रीय स्तर पर अपनी मजबूत पैठ रखने वाले तुर्की और अजरबैजान के बीच उपजा यह मतभेद ईरान जैसे देशों के लिए एक नया कूटनीतिक अवसर प्रदान कर सकता है.
वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए यह स्पष्ट है कि अजरबैजान सरकार अपने धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों से पीछे हटने के मूड में बिल्कुल नहीं है, जबकि दूसरी ओर छात्रों और विदेशी धार्मिक संगठनों का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। स्कूल के कमरों से शुरू हुआ यह विवाद अब अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की एक बड़ी पहेली बन चुका है, जिस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं।











