नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — भारत का आयात बाजार इन दिनों एक बेहद दिलचस्प और जटिल दौर से गुजर रहा है। देश की अर्थव्यवस्था दुनिया के तमाम देशों से होने वाले व्यापार के नए समीकरण तय कर रही है। एक तरफ हमारे बाजार आज भी सस्ते चीनी सामान के जाल में गहराई तक फंसे हुए हैं, तो दूसरी तरफ कच्चे तेल की कीमतों के उतार-चढ़ाव ने भारत को नए विकल्प तलाशने पर मजबूर कर दिया है। पिछले कुछ महीनों में आयात के मोर्चे पर जो बड़े बदलाव आए हैं, उन्होंने नीति निर्माताओं और बाजार के जानकारों दोनों को ही चौंका दिया है।
बीबीसी की हालिया रिपोर्ट बताती है कि किस तरह दशकों से भारतीय बाजार में चीनी सामान ने अपनी जड़ें मजबूत की हैं। खिलौनों से लेकर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों तक, हमारी निर्भरता इस हद तक बढ़ चुकी है कि स्थानीय उद्योगों के लिए मुकाबला करना मुश्किल हो गया है। हालांकि, सरकार इस निर्भरता को कम करने के लिए लगातार कड़े कदम उठा रही है। लोकल मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए कई उत्पादों के आयात पर शुल्क बढ़ाए गए हैं, लेकिन यह राह इतनी आसान नहीं है। चीन से आने वाले सस्ते सामान की काट ढूंढना अभी भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
रूसी तेल के महंगे होने पर वेनेजुएला और दूसरे देशों की ओर रुख
ऊर्जा सुरक्षा के मोर्चे पर भारत ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। आज तक की रिपोर्ट के अनुसार, जब रूस से मिलने वाला कच्चा तेल महंगा होने लगा, तो भारत ने बिना देर किए दूसरे विकल्पों पर काम शुरू कर दिया। न केवल रूस के अलावा अन्य देशों से तेल की खरीद बढ़ाई गई, बल्कि नवभारत टाइम्स की एक हालिया रिपोर्ट ने तो सात साल का रिकॉर्ड टूटने का दावा किया है। भारत अब वेनेजुएला से भी रिकॉर्ड मात्रा में कच्चे तेल का आयात कर रहा है। यह कदम साफ दिखाता है कि भारत अब किसी एक देश पर अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पूरी तरह निर्भर रहना नहीं चाहता।
दूसरी ओर, खाद्य तेलों की बात करें तो भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा विदेशों से मंगवाता है। इन्वेस्टिंग डॉट कॉम की रिपोर्ट बताती है कि पाम तेल के आयात के लिए भी अब नए और भरोसेमंद स्रोतों की तलाश तेजी से जारी है। इंडोनेशिया और मलेशिया पर पारंपरिक निर्भरता को कम करने के लिए व्यापारिक साझेदारियों के नए दरवाजे खटखटाए जा रहे हैं। खाद्य तेल की कीमतों को देश के आम आदमी की पहुंच में रखने के लिए यह कूटनीतिक और आर्थिक संतुलन बहुत जरूरी हो गया है। सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव का सीधा असर भारतीय रसोई पर न पड़े।
सोने-चांदी के आयात पर टिकी नजरें और जीएसटी काउंसिल की तैयारी
आयात के इस पूरे परिदृश्य में कीमती धातुओं का बाजार भी पीछे नहीं है। दैनिक जागरण की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हाल ही में की गई अपील के बाद, अब जीएसटी काउंसिल की बैठकों में सोने और चांदी के आयात पर बड़ा फैसला हो सकता है। देश में सोने और चांदी का भारी आयात चालू खाते के घाटे को प्रभावित करता है। प्रधानमंत्री की अपील थी कि लोग सोच-समझकर खरीदारी करें और देश का पैसा बाहर जाने से रोकें। अब देखना यह है कि क्या सरकार इन धातुओं के आयात पर टैक्स के नियमों में कोई कड़ा बदलाव करती है या कोई नई छूट की समीक्षा करती है।
इन तमाम खबरों के बीच एक बात बिल्कुल साफ है कि भारत का आयात ढांचा इस समय एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। चाहे वह तकनीक और इलेक्ट्रॉनिक्स का मामला हो, या फिर ऊर्जा और खाद्य तेल का, देश अब आत्मनिर्भरता और विविधीकरण यानी डाइवर्सिफाइड सोर्सिंग के मंत्र पर काम कर रहा है। 'द फ्रीलान्स' की इस जमीनी पड़ताल से यह स्पष्ट होता है कि आने वाले दिनों में भारत की व्यापार नीति और अधिक सख्त और देशहित को प्राथमिकता देने वाली होगी। आयात के इन नए जालों और रास्तों के बीच आम जनता की जेब पर क्या असर पड़ेगा, इस पर हमारी पैनी नजर बनी रहेगी।






