बस्ती जिले से ग्राउंड जीरो पर मिली रिपोर्ट के मुताबिक, मनोरमा नदी का जलस्तर अचानक बढ़ने से किसानों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। कप्तानगंज इलाके में नदी का पानी सीधे खेतों के अंदर घुस गया है, जिससे धान, तिल और हरी सब्जियों की फसलें पूरी तरह डूब चुकी हैं। किसानों का कहना है कि उनकी मेहनत पर पानी फिर गया है और प्रशासन की ओर से अब तक कोई ठोस मदद या मुआवजा मिलने का भरोसा नहीं दिया गया है। पानी के तेज बहाव से उपजाऊ मिट्टी का कटाव भी तेजी से हो रहा है, जिससे आने वाले दिनों में खेती की जमीन को और बड़ा नुकसान होने का खतरा मंडरा रहा है। स्थानीय लोग लंबे समय से नदी के किनारों को मजबूत करने की मांग कर रहे थे, लेकिन अधिकारियों ने समय रहते कोई ध्यान नहीं दिया।
खेती को तबाह करने के अलावा मनोरमा नदी और उससे जुड़े इलाकों में बदहाली की दूसरी तस्वीरें भी सामने आ रही हैं। कप्तानगंज के पास बने मनोरमा पुल की पैदल चलने वाली पट्टी की रेलिंग पिछले सात महीनों से पूरी तरह गायब है। रेलिंग न होने के कारण यहां से गुजरने वाले स्कूली बच्चों और बुजुर्गों के लिए हर वक्त बड़े हादसे का खतरा बना रहता है। रात के अंधेरे में अनजान लोग कई बार इस खुले हिस्से से बाल-बाल बचे हैं, लेकिन लोक निर्माण विभाग और स्थानीय प्रशासन इस गंभीर खतरे पर आंखें मूंदकर बैठा है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि कई बार लिखित शिकायत देने के बाद भी सिर्फ आश्वासन ही मिले हैं, जमीन पर सुरक्षा के लिए एक इंच काम नहीं हुआ है।
सोनारी में नई सड़क का धंसना और चेक डैम पर सवाल
बस्ती के ही सोनारी इलाके में विकास कार्यों की पोल खोलती एक और बड़ी घटना सामने आई है। यहां हाल ही में बनाई गई नई सड़क अचानक बीच में ही धंस गई, जिससे यातायात बुरी तरह प्रभावित हुआ है। इस सड़क के निर्माण में भारी भ्रष्टाचार और घटिया सामग्री के इस्तेमाल के आरोप लगाए जा रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि ठेकेदारों और इंजीनियरों की मिलीभगत से सड़क निर्माण में मानकों की अनदेखी की गई, जिसकी कीमत अब आम जनता को चुकानी पड़ रही है। सड़क धंसने के साथ-साथ मनोरमा नदी पर बनाए गए नए चेक डैम की गुणवत्ता पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। पहली ही बारिश और पानी के दबाव में चेक डैम के आसपास का हिस्सा कमजोर पड़ने लगा है, जिससे ग्रामीणों में बाढ़ का डर और गहरा गया है।
प्रशासनिक उदासीनता के खिलाफ अब स्थानीय लोग खुद सड़कों पर उतरने लगे हैं। हाल ही में चन्द्रमणि पाण्डेय के नेतृत्व में मनोरमा घाट पर एक बड़ा सफाई अभियान चलाया गया, जिसमें आसपास के तमाम नागरिकों ने खुद श्रमदान किया। सफाई के बाद स्थानीय लोगों ने साफ शब्दों में चेतावनी दी कि यदि जिम्मेदार विभागों ने समय रहते नदी की सफाई और सुरक्षा के इंतजाम नहीं किए, तो जनता बड़ा आंदोलन करने के लिए मजबूर होगी। चन्द्रमणि पाण्डेय ने मीडिया से बातचीत में कहा कि अधिकारी कुंभकर्णी नींद सो रहे हैं और जनता अपने हाल पर जीने को मजबूर है, लेकिन अब ग्रामीण अपनी सुरक्षा और अधिकारों के लिए चुप नहीं बैठेंगे।
ग्रामीण इलाकों में प्रशासनिक लापरवाही और बाढ़ का खतरा
मनोरमा नदी से जुड़े इन तमाम मामलों ने एक बार फिर ग्रामीण विकास योजनाओं की जमीनी हकीकत को बेनकाब कर दिया है। करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी न तो किसानों की फसलों को बाढ़ से बचाने के पुख्ता इंतजाम हैं और न ही पुलों और सड़कों की सुरक्षा के लिए कोई मॉनिटरिंग सिस्टम काम कर रहा है। सोनारी और कप्तानगंज के बीच फैले इस इलाके में हर साल बारिश के मौसम में पानी का भराव आम बात हो गई है, लेकिन इस बार हालात ज्यादा खराब हैं। चेक डैम के निर्माण में हुई कथित धांधली की अगर निष्पक्ष जांच हो, तो कई बड़े नाम बेनकाब हो सकते हैं। फिलहाल ग्रामीण अपने स्तर पर नुकसान का आकलन कर रहे हैं और प्रशासन से तुरंत मुआवजे की मांग पर अड़े हुए हैं।
दूसरी तरफ, केरल के कोच्चि से एक अलग संदर्भ में मनोरमा न्यूज कॉन्क्लेव 2025 का आयोजन भी चर्चा में रहा, जहां देश के गृह मंत्री अमित शाह ने शिरकत की और राष्ट्र के नाम अहम संदेश दिया। लेकिन राष्ट्रीय सुर्खियों से कोसों दूर उत्तर प्रदेश के गांवों में बहने वाली मनोरमा नदी का यह स्थानीय संकट आज वहां के आम आदमी के जीवन का सबसे बड़ा सच है। चाहे फसलों का डूबना हो, पुलों से रेलिंग का गायब होना हो या नई सड़कों का धंसना हो—हर जगह आम नागरिक बुनियादी सुविधाओं के अभाव में पिस रहा है। द फ्रीलान्स की टीम इस पूरे मामले पर अपनी पैनी नजर बनाए रखेगी और प्रशासन पर जवाबदेही तय होने तक ग्राउंड रिपोर्टिंग जारी रखेगी।











