नई दिल्ली और तिरुवनंतपुरम से ग्राउंड रिपोर्ट — भारत में इन दिनों 'विवाह' यानी शादी का विषय इंटरनेट पर सबसे ज्यादा तलाशा जा रहा है। गूगल ट्रेंड्स के आंकड़ों के मुताबिक, दक्षिण भारत से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक इस विषय से जुड़े कई पहलू एक साथ चर्चा का केंद्र बन गए हैं। एक तरफ जहां केरल के मंदिरों में हो रहे पारंपरिक विवाह समारोह स्थानीय मीडिया की सुर्खियां बटोर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ देश के कानूनी और सामाजिक दायरे में विवाह की न्यूनतम उम्र और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे गंभीर सवाल भी तेजी से उठ रहे हैं। पत्रकारिता की इस खास पड़ताल में हमने यह जानने की कोशिश की है कि आखिर इस एक शब्द के इर्द-गिर्द देश में फिलहाल क्या कुछ चल रहा है।
केरल की बात करें तो वहां हाल ही में मलयालम सिनेमा जगत और आम लोगों से जुड़ी कुछ शादियां काफी चर्चा में रहीं। प्रसिद्ध स्थल गुरुवायुर मंदिर में अभिनेता हरीकृष्णन और अन्य फिल्मी हस्तियों से जुड़े विवाह समारोहों की खबरों ने स्थानीय स्तर पर लोगों का खूब ध्यान खींचा। लोग इन आयोजनों की तस्वीरों और वीडियो को सोशल मीडिया पर बड़े पैमाने पर साझा कर रहे हैं। क्षेत्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इन पारंपरिक आयोजनों को लेकर केरल के युवाओं में खासा उत्साह देखा जा रहा है। शादी की रस्मों और परिवारों के जश्न से जुड़ी ये खबरें मनोरंजन जगत के पन्नों पर छाई हुई हैं।
संविधान का वह अनुच्छेद जो देता है अपनी पसंद से शादी का अधिकार
मनोरंजन और स्थानीय आयोजनों से इतर, इस विषय का एक बेहद मजबूत कानूनी और संवैधानिक पहलू भी इन दिनों चर्चा में है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं और कानून के जानकारों के बीच यह सवाल आम हो गया है कि भारतीय संविधान का कौन सा अनुच्छेद नागरिकों को अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह करने का अधिकार देता है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि देश का संविधान व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जीने के अधिकार के तहत बालिग नागरिकों को अपने जीवनसाथी के चुनाव की पूरी स्वतंत्रता प्रदान करता है। इस संबंध में अदालत के कई पुराने फैसले भी यह स्पष्ट करते हैं कि दो वयस्क आपसी सहमति से कानूनी रूप से विवाह करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं।
दूसरी ओर, इस विषय का एक बेहद संवेदनशील और सामाजिक पहलू बच्चों के अधिकारों से जुड़ा हुआ है। अंतरराष्ट्रीय संस्था यूनिसेफ ने देश और दुनिया भर में बाल विवाह की कुप्रथा को पूरी तरह समाप्त करने के लिए अपनी मुहिम को और तेज कर दिया है। यूनिसेफ की रिपोर्ट और अभियानों में बार-बार इस बात पर जोर दिया जाता है कि किशोरावस्था के दौरान बच्चों को सशक्त बनाया जाना चाहिए ताकि वे कम उम्र में विवाह के दबाव का विरोध कर सकें। शिक्षा की कमी और सामाजिक दबाव के कारण आज भी देश के कई दूरदराज के इलाकों में बाल विवाह जैसी गंभीर समस्याएं देखने को मिलती हैं, जिन पर रोक लगाने के लिए प्रशासन और समाज दोनों को मिलकर काम करने की जरूरत है।
पारंपरिक उत्सव और आधुनिक अधिकारों के बीच बदलती सोच
आज के समय में विवाह केवल दो परिवारों का मिलन मात्र नहीं रह गया है, बल्कि यह व्यक्तिगत अधिकारों, कानूनी सुरक्षा और सामाजिक बदलाव का एक बड़ा मंच बन चुका है। एक तरफ जहां लोग भव्य आयोजनों और सांस्कृतिक परंपराओं के जरिए अपने जीवन के इस नए सफर की शुरुआत कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ समाज सुधारक और कानूनी एजेंसियां बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए संघर्ष कर रही हैं। आम जनता के बीच इन सभी मुद्दों पर हो रही यह खुली बातचीत इस बात का संकेत है कि समाज अब विवाह जैसे पवित्र बंधन को आधुनिक और न्यायसंगत दृष्टिकोण से देखने लगा है। द फ्रीलान्स की टीम इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार अपनी पैनी नजर बनाए रखेगी।







