कुछ फिल्मों की हाइप सिर्फ एक स्टार और उसके 'ऑरा' से कितनी ज्यादा बढ़ सकती है, इसके कई उदाहरण हाल ही में देखे गए हैं। साउथ फिल्मों का क्रेज अब नॉर्थ में भी तगड़ा है, जिसके चलते बड़ी फिल्मों को पैन-इंडिया लेवल पर पहले हफ्ते तगड़ी कमाई मिल जाती है। हालांकि, जब पिक्चर के रिव्यू बाहर आते हैं, तो उसकी असलियत सामने आ जाती है। अब साउथ सिनेमा से एक और स्टार नानी अपनी पैन-इंडिया फिल्म 'द पैराडाइज' लेकर आए हैं, जिसे लेकर दर्शकों के बीच काफी चर्चा थी।
पैराडाइज की दुनिया और बिखरी हुई कहानी
फिल्म की कहानी 1980 के दशक के दौरान आंध्र प्रदेश के सिकंदराबाद की एक बस्ती पर आधारित है, जहां एक पिछड़ा समुदाय अपनी पहचान के लिए संघर्ष कर रहा है। उनके ऊपर मलिक (मोहन बाबू) नाम का शख्स अत्याचार करता है। इसी बस्ती में जादल (नानी) और उसकी मां शमक्का (सोनाली कुलकर्णी) रहते हैं। जादल बड़ा होकर अपनी बस्ती के लोगों को पहचान दिलाने की कोशिशों में लग जाता है और मलिक तथा उसके बेटे विक्रम (राघव जुयाल) से दुश्मनी मोल लेता है।
फिल्म की कहानी को चैप्टर्स में बांटने की कोशिश की गई है, लेकिन निर्देशक श्रीकांथ ओडेला की यह कोशिश नाकामयाब साबित होती है। कहानी बिखरी-बिखरी और गोल-घुमक्कड़ सी लगती है। जरूरत से ज्यादा स्लो मोशन, लाउड एक्शन सीक्वेंस और ओवर-ड्रामैटिक सीन्स पिक्चर को काफी भारी और थकाऊ बना देते हैं। अनिरुद्ध रविचंद्र का शानदार संगीत और बैकग्राउंड स्कोर भी इस बार फिल्म को डूबने से नहीं बचा पाया।
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पिक्चर में कहानी और स्क्रीनप्ले के अलावा केवल एक्टर्स की एक्टिंग ही सराहनीय है। 'नेचुरल स्टार' कहे जाने वाले नानी ने अपने कंधों पर पूरी फिल्म को उठाया है और उनका साथ सोनाली कुलकर्णी ने भी बखूबी दिया है। हालांकि, राघव जुयाल के किरदार के पास करने के लिए ज्यादा कुछ नहीं था, और उनकी बेहद आसान मौत फैंस को निराश करती है। मोहन बाबू ने शुरुआत में अच्छा प्रभाव छोड़ा, लेकिन कमजोर लेखन के चलते वह भी यादगार नहीं रह पाए।
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