टाटा समूह के शीर्ष नेतृत्व में क्यों छिड़ा विवाद
देश के सबसे प्रतिष्ठित और बड़े औद्योगिक घरानों में शुमार टाटा समूह के भीतर कुछ ठीक नहीं चल रहा है। टाटा संस के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन को अगले पांच साल के लिए दोबारा इस पद पर नियुक्त किए जाने के फैसले ने समूह के भीतर छिपे असंतोष को सतह पर ला दिया है। इस फैसले के बाद टाटा संस के बोर्ड और समूह की होल्डिंग कंपनी में बहुमत हिस्सेदारी रखने वाले टाटा ट्रस्ट्स के बीच दूरियां काफी बढ़ गई हैं।
बता दें कि 63 वर्षीय एन चंद्रशेखरन ने पिछले महीने ही घोषणा की थी कि वह फरवरी 2027 में अपना कार्यकाल पूरा होने पर पद छोड़ देंगे। लेकिन, अचानक 17 सितंबर को हुई टाटा संस की बोर्ड बैठक में बहुमत से उनके कार्यकाल को बढ़ाने का फैसला लिया गया। इस अचानक आए मोड़ ने कॉर्पोरेट जगत में हलचल मचा दी है और हर कोई इस अंदरूनी उठापटक पर नजर बनाए हुए है।
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नोएल टाटा ने किया कड़ा विरोध, बताया कानूनी रूप से अवैध
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन और टाटा परिवार के सदस्य नोएल टाटा ने इस प्रस्ताव के खिलाफ खुलकर वोट किया। बोर्ड के अन्य सदस्यों के विपरीत नोएल टाटा ने इस नियुक्ति का विरोध किया और बाद में एक बयान जारी कर इस पूरे प्रस्ताव को 'कानूनी रूप से शून्य' (legal nullity) करार दिया। उनका तर्क है कि यह फैसला नियमों के विरुद्ध है।
नोएल टाटा का कहना है कि टाटा संस के चेयरमैन की नियुक्ति से जुड़े किसी भी फैसले के लिए ट्रस्ट्स के दोनों नामित सदस्यों—नोएल टाटा और वेणु श्रीनिवासन—की सहमति जरूरी होती है। जबकि इस मामले में नोएल टाटा ने इसके खिलाफ वोट डाला, हालांकि वेणु श्रीनिवासन ने इसका विरोध नहीं किया। इसी तकनीकी और नियम आधारित मतभेद को आधार बनाकर इस नियुक्ति को चुनौती दी जा रही है।
एयर इंडिया का प्रदर्शन और बिजनेस के दूसरे मोर्चों पर तनाव
चन्द्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति का यह विवाद केवल एक पद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई बड़े व्यावसायिक मतभेद भी जुड़े हुए हैं। पिछले कुछ समय से टाटा ट्रस्ट्स और एन चंद्रशेखरन के बीच एयर इंडिया के कामकाज और उसके भारी-भरकम वित्तीय घाटे को लेकर भी असंतोष रहा है। जनवरी 2022 में टाटा समूह ने एयर इंडिया का अधिग्रहण किया था, लेकिन उसके बाद से एयरलाइंस और उससे जुड़े कारोबार को लगातार घाटे का सामना करना पड़ रहा है।
इसके अलावा, टाटा संस को शेयर बाजार में लिस्ट करने की संभावना और एक अल्पसंख्यक शेयरधारक द्वारा 2.6 अरब डॉलर की हिस्सेदारी बेचने के प्रस्ताव पर भी दोनों पक्षों में वैचारिक मतभेद रहे हैं। टाटा ट्रस्ट्स हमेशा से टाटा संस को शेयर बाजार में लाने के खिलाफ रहा है, क्योंकि उसका मानना है कि इससे चैरिटेबल संस्थानों द्वारा नियंत्रित इस समूह का मूल चरित्र और उद्देश्य प्रभावित हो सकता है।
अंदरूनी कलह से पार पाने की चुनौती
टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस की 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जो इसे सबसे ताकतवर और प्रभावशाली हिस्सेदार बनाती है। हालांकि, चैरिटी नियामक से जुड़ी कुछ कानूनी अड़चनों और आंतरिक विवादों के कारण ट्रस्ट्स के लिए इस नियंत्रण का पूरी तरह उपयोग करना थोड़ा जटिल हो गया है। इसके बावजूद, समूह के भीतर इस तरह का खुला मतभेद टाटा इतिहास में एक बड़ा वाकया बन गया है।
"चन्द्रशेखरन अपने बाकी सभी व्यावसायिक फैसलों और रणनीतियों के लिए सही लोगों को जिम्मेदारी दे सकते हैं, लेकिन इस विवाद को उन्हें खुद ही सुलझाना होगा।" — टाटा समूह का एक वरिष्ठ कार्यकारी अधिकारी (रॉयटर्स से बातचीत में)
एन चंद्रशेखरन ने अपने पूरे कॉर्पोरेट करियर में टाटा समूह की ही सेवा की है। साल 1987 में टीसीएस (TCS) से अपना सफर शुरू करने वाले चंद्रशेखरन जनवरी 2017 में टाटा संस के चेयरमैन बने थे। अब देखना यह होगा कि देश के इस सबसे बड़े कारोबारी साम्राज्य में मची इस अंदरूनी खींचतान को कंपनी कैसे संभालती है और आने वाले दिनों में इसका क्या असर समूह की आगामी परियोजनाओं पर पड़ता है।





