यूरोप में तेजी से बदलता मौसम और पिघलती प्राकृतिक संपदा
पूरी दुनिया में जलवायु परिवर्तन का असर अब बेहद खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है। यूरोपीय देश स्लोवेनिया से एक ऐसी पर्यावरणीय चेतावनी सामने आई है, जिसने वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों की नींद उड़ा दी है। देश में बढ़ते तापमान और सर्दियों के मौसम में नाममात्र की बर्फबारी के कारण प्राचीन ग्लेशियरों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि देश के सबसे ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र माउंट ट्रिग्लाव पर मौजूद विशाल ग्लेशियर अब इतिहास बन चुका है और उसकी बर्फ पूरी तरह गायब हो गई है।
वैज्ञानिक समुदाय लंबे समय से इस बात की चेतावनी देता रहा है कि यदि ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार पर लगाम नहीं लगाई गई, तो पृथ्वी के कई खूबसूरत और महत्वपूर्ण प्राकृतिक स्थल नक्शे से हमेशा के लिए मिट जाएंगे। स्लोवेनिया में हुई यह घटना उसी खतरे की एक ताजा और डरावनी बानगी है। आम नागरिकों के लिए भी यह समझना जरूरी है कि पर्वतों पर जमी बर्फ का पिघलना केवल एक दूर की घटना नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर हमारे भविष्य के जल संसाधनों और पर्यावरणीय संतुलन पर पड़ने वाला है।
स्कूटा ग्लेशियर बचा देश का आखिरी सहारा, लेकिन वो भी संकट में
माउंट ट्रिग्लाव के ग्लेशियर के पूरी तरह समाप्त होने के बाद अब केवल स्कूटा ग्लेशियर ही स्लोवेनिया की आखिरी उम्मीद बचा है। हालांकि, यह अंतिम ग्लेशियर भी विनाशकारी पिघलाव के दौर से गुजर रहा है। विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं की मानें तो इस ग्लेशियर को बचाने के लिए तमाम मानवीय प्रयास किए जा चुके हैं, लेकिन किसी भी उपाय का असर नजर नहीं आ रहा है। स्थानीय वैज्ञानिकों ने बर्फ के ऊपर कंकर और छोटे पत्थर तक बिछाए ताकि सूर्य की सीधी धूप और गर्मी से बर्फ को बचाया जा सके, लेकिन इसके बावजूद पिघलने की रफ्तार कम होने का नाम नहीं ले रही है।
राजधानी ल्युब्लियाना के वैज्ञानिक लगातार इस बात पर नजर बनाए हुए हैं कि कैसे इस आखिरी बचे प्राकृतिक भंडार को सुरक्षित रखा जाए। लेकिन प्रकृति के प्रकोप के आगे इंसानी कोशिशें फिलहाल नाकाम साबित हो रही हैं। ग्लेशियर के सिकुड़ने की गति इतनी तेज है कि आने वाले कुछ ही वर्षों में स्कूटा ग्लेशियर का नामोनिशान भी मिट सकता है, जिससे पूरे क्षेत्र का पारिस्थितिकी तंत्र बुरी तरह प्रभावित होगा।
पिछले 80 वर्षों के आंकड़ों ने बढ़ाई वैज्ञानिकों की चिंता
स्लोवेनिया के इन ग्लेशियरों पर वैज्ञानिक पिछले आठ दशकों यानी 80 साल से भी अधिक समय से नजर रख रहे हैं। उपलब्ध ऐतिहासिक आंकड़ों के मुताबिक, साल 1946 में जब माउंट ट्रिग्लाव ग्लेशियर की नियमित निगरानी शुरू की गई थी, तब इसका दायरा 14 हेक्टेयर से भी अधिक क्षेत्र में फैला हुआ था। लेकिन आज की तारीख में वहां बर्फ का एक टुकड़ा तक नजर नहीं आता है। ठीक इसी तरह, स्कूटा ग्लेशियर का क्षेत्रफल भी कभी ढाई से तीन हेक्टेयर हुआ करता था, जो अब घटकर केवल 1.5 हेक्टेयर के आसपास सिमट कर रह गया है।
इस विषय पर बात करते हुए प्रमुख वैज्ञानिक मिहा पावशेक ने बताया कि पहले के दशकों में इन पर्वतों पर बर्फ की मोटाई कई-कई मीटर हुआ करती थी। पर्वतों की चोटियां हमेशा सफेद चादर से ढकी रहती थीं। लेकिन आज स्थिति यह है कि बर्फ की मोटाई घटकर केवल कुछ ही मीटर रह गई है। ग्लेशियर न केवल क्षेत्रफल में छोटे हो रहे हैं, बल्कि उनकी गहराई और घनत्व में भी भारी कमी दर्ज की जा रही है, जो कि पर्यावरण के लिहाज से बेहद चिंताजनक संकेत है।
"ग्लेशियरों का इस तरह तेजी से पिघलना केवल एक मौसम का बदलाव नहीं है, बल्कि यह हमारी पूरी पृथ्वी के जीवन चक्र पर मंडराता हुआ एक बड़ा संकट है। यदि हमने समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए शुद्ध पानी और संतुलित पर्यावरण मिलना लगभग असंभव हो जाएगा।"— मिहा पावशेक, वरिष्ठ पर्यावरण वैज्ञानिक एवं ग्लेशियर विशेषज्ञ
कम बर्फबारी और भीषण गर्मी बनी बर्बादी की मुख्य वजह
वैज्ञानिकों और मौसम विशेषज्ञों की रिसर्च में यह बात सामने आई है कि इन ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के पीछे मुख्य रूप से दो बड़ी वजहें जिम्मेदार हैं। पहली बड़ी वजह है सर्दियों के मौसम में सामान्य से बहुत कम बर्फबारी होना। जब पहाड़ों पर सर्दियों में पर्याप्त बर्फ ही जमा नहीं होगी, तो गर्मियों के मौसम में प्राकृतिक रूप से उसका टिक पाना नामुमकिन हो जाता है। दूसरी अहम वजह गर्मियों के दौरान तापमान में लगातार हो रही बेतहाशा बढ़ोतरी है।
इस साल पूरे यूरोप महाद्वीप में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी और सूखे जैसे हालात देखने को मिले हैं। इस भीषण गर्मी ने पर्वतीय क्षेत्रों में जमी हुई प्राचीन बर्फ पर अतिरिक्त दबाव बना दिया है। परिणामस्वरूप, पहाड़ों की चोटियों पर जो बर्फ सदियों से जमी हुई थी, वह पानी बनकर तेजी से बह रही है। इस पर्यावरणीय असंतुलन का असर केवल पर्वतों तक ही सीमित नहीं रहने वाला है, बल्कि इसका सीधा असर मैदानी इलाकों की नदियों, वहां रहने वाले जीव-जंतुओं और इंसानों के लिए पीने के पानी की उपलब्धता पर भी पड़ेगा।












