राजस्थान के सबसे बड़े और प्रमुख सवाई मानसिंह (SMS) अस्पताल प्रशासन ने एक बार फिर चिकित्सा व्यवस्था को लेकर बड़ा और कड़ा फैसला लिया है। अस्पताल में आने वाले मरीजों के लिए विटामिन-डी और विटामिन-बी-12 जैसी बुनियादी और बेहद जरूरी जांचों के नियमों में बड़ा बदलाव किया गया है। नए दिशा-निर्देशों के मुताबिक, अब ओपीडी और आईपीडी में आने वाले किसी भी मरीज का विटामिन-डी और बी-12 का टेस्ट तब तक नहीं हो पाएगा, जब तक कि संबंधित विभाग के अध्यक्ष यानी यूनिट हेड इस पर अपनी मुहर न लगा दें। अस्पताल प्रशासन का यह नया नियम एक तरफ जहां अस्पताल के बढ़ते वित्तीय और तकनीकी बोझ को कम करने के लिए उठाया गया कदम बताया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ इससे आम मरीजों की परेशानियां कई गुना बढ़ने की पूरी आशंका जताई जा रही है।
अस्पताल प्रशासन के नए आदेश और जांच की पेचीदगियां
अस्पताल की हालिया उच्चस्तरीय बैठक में यह निर्णय लिया गया है कि इन दोनों विटामिनों की जांच को लेकर सख्ती बरती जाए। नए नियमों के दायरे में सभी फैकल्टी मेंबर्स और रेजिडेंट डॉक्टरों को यह स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि वे किसी भी मरीज के रूटीन चेकअप के तौर पर इन जांचों को बिल्कुल न लिखें। यदि किसी विशेष परिस्थिति में डॉक्टर को लगता है कि मरीज के लिए यह टेस्ट करवाना बेहद जरूरी है, तो उन्हें पर्ची पर अपना नाम लिखने के साथ-साथ अपनी विभागीय मुहर भी अनिवार्य रूप से लगानी होगी। इसके अलावा सेंट्रल लैब और अस्पताल के जांच प्रभारियों को भी सख्त हिदायत दी गई है कि वे यूनिट हेड के लिखित अनुमोदन के बिना किसी भी मरीज का सैंपल स्वीकार न करें।
इस बैठक के मिनिट्स पर अस्पताल अधीक्षक, मेडिसिन विभाग के एचओडी, एंडोक्राइनोलॉजी के एचओडी, अस्थि रोग विभाग के एचओडी, बायोकेमिस्ट्री विभाग के एचओडी और उपाधीक्षक डॉ. जगदीश मोदी सहित कई बड़े अधिकारियों के हस्ताक्षर हैं। प्रशासन का मानना है कि इससे फिजूलखर्च रुकेगा और जरूरतमंदों को ही सही लाभ मिल सकेगा। लेकिन जमीनी हकीकत पर इसका असर क्या होगा, यह आने वाले दिनों में ही साफ हो पाएगा।
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मरीजों को उठानी होगी दोहरी परेशानी, ग्रामीण इलाकों से आने वालों की बढ़ी मुश्किलें
एसएमएस अस्पताल में इलाज के लिए आने वाले अधिकांश मरीज जयपुर शहर के नहीं होते, बल्कि वे राजस्थान के दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों, गांवों और ढाणियों से आते हैं। इन मरीजों के लिए अस्पताल की लंबी लाइनों में खड़े होकर पहले पर्ची बनवाना, फिर डॉक्टर से मिलना और इसके बाद घंटों अपनी बारी का इंतजार करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती होता है। अब इस नई व्यवस्था के जुड़ जाने से मरीजों की मुसीबतें और अधिक बढ़ गई हैं। डॉक्टर को दिखाने के बाद अब मरीजों को अपनी जांच करवाने के लिए संबंधित विभाग के यूनिट हेड के कक्ष के बाहर लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ेगा।
एक ही दिन में डॉक्टर से मिलना, यूनिट हेड से अप्रूवल के लिए साइन कराना और फिर सेंट्रल लैब तक दौड़ लगाना एक आम और कमजोर मरीज के लिए बहुत कठिन काम साबित हो रहा है। कई बार ऐसा भी देखने को मिलता है कि मरीजों को एक दिन में यूनिट हेड का अप्रूवल नहीं मिल पाता है, जिसके चलते उन्हें अगले दिन फिर से अस्पताल के चक्कर काटने पड़ते हैं। इससे उनका समय और पैसा दोनों बर्बाद होता है, जो कि चिकित्सा के बुनियादी सिद्धांतों के विपरीत नजर आता है।
अस्पताल प्रशासन का तर्क और फिजूलखर्च रोकने की कवायद
इस पूरे मामले पर सफाई देते हुए एसएमएस अस्पताल के अतिरिक्त अधीक्षक डॉ. प्रदीप शर्मा ने मीडिया से बातचीत में कहा कि कई मरीज अपने स्तर पर ही इन जांचों की मांग लेकर डॉक्टरों के पास आते हैं। उन्होंने बताया कि इस तरह की अनावश्यक मांग के कारण इन जांचों की संख्या में भारी बढ़ोतरी हो गई है, जिससे लैब पर भारी दबाव बनता है।
"कई मरीज अपनी मर्जी से इन टेस्ट्स की मांग करते हैं, जिससे इनकी संख्या बहुत ज्यादा बढ़ गई है। नए नियमों से किसी भी वास्तविक (जेन्युइन) मरीज को किसी प्रकार की दिक्कत नहीं होगी। जांचों के दुरुपयोग को रोकने के लिए ही ये राइडर लगाए गए हैं ताकि सरकारी संसाधनों का सही उपयोग हो सके।" — डॉ. प्रदीप शर्मा, अतिरिक्त अधीक्षक, SMS अस्पताल
अधिकारियों का यह भी तर्क है कि कई बार बाहर के दलाल या अवैध एजेंट पैसे लेकर अस्पताल में महंगी और गैर-जरूरी जांचें करवा देते हैं। ये दलाल पर्ची कटवाने से लेकर ओपीडी में जाकर डॉक्टर की फर्जी मुहर तक खुद ही लगवाकर जांच करवा लेते हैं। हालांकि, सवाल यह खड़ा होता है कि यदि दलाल सक्रिय हैं और योजनाओं का दुरुपयोग हो रहा है, तो ऐसे आपराधिक तत्वों के खिलाफ सीधे और सख्त कानूनी कार्रवाई करने के बजाय आम और गरीब मरीजों की राह को इतना कठिन क्यों बनाया जा रहा है?
लाखों जांचों का बोझ और बढ़ते आंकड़े
राजस्थान के सबसे बड़े एसएमएस अस्पताल में आने वाले मरीजों की संख्या रोजाना हजारों में होती है। यहां हर महीने अलग-अलग तरह की नौ लाख से ज्यादा जांचें की जाती हैं। यदि सालाना आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो साल 2023 में इस अस्पताल में कुल 1.12 करोड़ जांचें हुईं थीं। वहीं, इससे पहले साल 2022 में भी जांचों का यह आंकड़ा लगभग 1.11 करोड़ के आसपास दर्ज किया गया था। इतने भारी-भरकम आंकड़ों और काम के दबाव को संभालना निश्चित रूप से अस्पताल प्रशासन और डॉक्टरों के लिए एक बड़ी चुनौती रहता है। लेकिन इन सब के बीच जब नियम कड़े किए जाते हैं, तो उसका सबसे पहला और सीधा असर आम जनता की जेब और सेहत पर पड़ता है।
विटामिन डी और बी-12 की जरूरत किसे होती है और 40 की उम्र के बाद क्यों है जरूरी?
चिकित्सकीय रूप से विटामिन डी और बी-12 हमारे शरीर के लिए बेहद आवश्यक पोषक तत्व हैं। डॉक्टर हमेशा लक्षणों या विशेष परिस्थितियों वाले मरीजों को ही यह टेस्ट कराने की सलाह देते हैं। जो लोग लगातार और बिना किसी स्पष्ट कारण के अत्यधिक थकान, कमजोरी, सुस्ती महसूस करते हैं, या जिनके हाथ-पैरों में लगातार सुन्नपन या दर्द बना रहता है, उनके लिए ये जांचें जरूरी होती हैं। इसके अलावा बार-बार जोड़ों में दर्द, मांसपेशियों में ऐंठन या हड्डियों की कमजोरी से पीड़ित लोगों को भी डॉक्टर ये टेस्ट लिखते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, 40 वर्ष की आयु पार करने के बाद शरीर में कई तरह के शारीरिक बदलाव आने शुरू हो जाते हैं। खासकर महिलाओं में इस उम्र के बाद शरीर से कैल्शियम बहुत तेजी से घटने लगता है, जिससे हड्डियां अंदर से कमजोर होने लगती हैं। इस उम्र में विटामिन डी की नियमित जांच यह तय करने में मदद करती है कि हड्डियां मजबूत बनी रहें और ऑस्टियोपोरोसिस जैसी गंभीर बीमारी से समय रहते बचाव किया जा सके। इसी तरह, 40 की उम्र के बाद शरीर में एक खास प्रोटीन का बनना कम हो जाता है, जो भोजन से विटामिन बी-12 को सोखने का काम करता है। यही कारण है कि इस उम्र के बाद लोग अक्सर बिना किसी बड़ी बीमारी के भी जोड़ों के दर्द, अत्यधिक थकान और भूलने की समस्याओं से परेशान रहने लगते हैं। ऐसे में यदि समय रहते सही जांच करवा ली जाए, तो इन तमाम स्वास्थ्य समस्याओं को आसानी से रोका जा सकता है।





