बिहार में विकास के दावों की अब जमीन पर होगी जमीनी परख
देश के सबसे बड़े राज्यों में शुमार बिहार में अब विकास की रूपरेखा को पूरी तरह से बदलने की कवायद शुरू हो चुकी है। अब तक विकास और योजनाओं की सफलता के आंकड़े राज्य या फिर जिला मुख्यालयों की फाइलों तक सीमित रहते थे, लेकिन अब व्यवस्था में बड़ा बदलाव किया जा रहा है। सरकार ने यह तय किया है कि विकास के दावों और वास्तविक स्थिति की असली तस्वीर अब सीधे ग्राम पंचायतों और प्रखंडों के स्तर पर जांची जाएगी। इसके लिए एक व्यापक कार्ययोजना तैयार की जा रही है, जिससे यह साफ तौर पर पता चल सके कि किस गांव या पंचायत में कौन-सी बुनियादी सुविधा पिछड़ रही है।
इस नई व्यवस्था के तहत संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों यानी एसडीजी (SDG) की निगरानी स्थानीय स्तर पर करने का निर्णय लिया गया है। योजना एवं विकास विभाग ने इस पूरी प्रक्रिया की रूपरेखा तैयार करनी शुरू कर दी है। अधिकारियों का मानना है कि जब तक जमीनी स्तर की वास्तविक कमजोरियों का डेटा हाथ नहीं लगेगा, तब तक किसी भी योजना का सही और प्रभावी क्रियान्वयन संभव नहीं है। यही वजह है कि अब ब्लॉक और पंचायत स्तर पर हर एक मानक की गहराई से मॉनिटरिंग की जाएगी ताकि विकास की गाड़ी हर अंतिम व्यक्ति तक पहुंच सके।
पारंपरिक रूप से सरकारी नीतियां और बजट का आवंटन बड़े स्तर के आंकड़ों के आधार पर होता रहा है, जिससे कई बार दूर-दराज के गांवों की विशिष्ट समस्याएं पीछे छूट जाती थीं। नई व्यवस्था लागू होने के बाद योजनाकारों के पास हर पंचायत का डिजिटल और तथ्यात्मक ब्योरा होगा। इससे स्थानीय स्तर की प्राथमिकताओं के अनुसार बजट और परियोजनाओं को आकार दिया जा सकेगा।
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किन-किन पैमानों पर परखी जाएगी आपके गांव और पंचायत की तरक्की?
सवाल यह उठता है कि आखिर पंचायत स्तर पर विकास का आकलन किन प्रमुख पैमानों के आधार पर किया जाएगा? प्रशासनिक सूत्रों के मुताबिक, इस निगरानी तंत्र में कुल नौ प्रमुख सतत विकास लक्ष्यों को शामिल किया गया है। इसमें सबसे ऊपर गरीबी उन्मूलन, स्वास्थ्य सेवाएं और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की उपलब्धता को रखा गया है। इसके अलावा ग्रामीण इलाकों में पेयजल की उपलब्धता, स्वच्छता अभियान की जमीनी हकीकत और युवाओं के लिए रोजगार के अवसरों की भी बारीकी से समीक्षा की जाएगी।
इन बुनियादी चीजों के साथ-साथ लैंगिक समानता और पर्यावरण संरक्षण जैसे बेहद संवेदनशील मुद्दों को भी इस निगरानी सूची में जगह दी गई है। इसका मतलब यह है कि पंचायत स्तर पर यह देखा जाएगा कि महिलाओं को कितने अधिकार और सुरक्षा मिल रही है, साथ ही गांवों में हरियाली, कचरा प्रबंधन और जलवायु परिवर्तन के खिलाफ स्थानीय स्तर पर क्या कदम उठाए जा रहे हैं। इन सभी मानकों के आधार पर एक समग्र रिपोर्ट कार्ड तैयार किया जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब इन सभी बिंदुओं पर एक साथ डेटा जुटाया जाएगा, तो यह पता लगाना बेहद आसान हो जाएगा कि राज्य का कौन-सा जिला या प्रखंड किस मोर्चे पर सबसे आगे है और कौन-सा इलाका अभी भी विकास की दौड़ में पीछे छूट रहा है। इस पारदर्शी व्यवस्था से प्रशासनिक कसावट भी आएगी और जवाबदेही तय होगी।
नीति आयोग के आंकड़ों में लगातार सुधर रही है बिहार की स्थिति
बिहार में विकास की इस नई पहल से पहले यदि नीति आयोग की रिपोर्ट पर नजर डालें, तो राज्य ने पिछले कुछ वर्षों में सतत विकास लक्ष्यों (SDG) के मामले में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। नीति आयोग द्वारा जारी किए गए नवीनतम 'एसडीजी इंडिया इंडेक्स 2023-24' के मुताबिक, बिहार का कुल संयुक्त स्कोर 57 दर्ज किया गया है। यदि इसकी तुलना पिछले वर्षों से की जाए तो यह सुधार काफी संतोषजनक माना जा रहा है।
साल 2018 में जब यह इंडेक्स पहली बार बड़े पैमाने पर चर्चा में आया था, तब बिहार का संयुक्त स्कोर महज 48 अंक था। इस प्रकार देखा जाए तो पिछले छह वर्षों के अंतराल में बिहार ने अपने स्कोर में पूरे 9 अंकों का इजाफा किया है। हालांकि, देश के अन्य विकसित राज्यों की तुलना में यह स्कोर अभी भी थोड़ा पीछे है, लेकिन जिस गति से राज्य ने अंकों में सुधार किया है, उससे नीति निर्माताओं में यह उम्मीद जगी है कि जमीनी स्तर पर निगरानी बढ़ने से इस रफ्तार को और तेज किया जा सकता है।
राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि जब तक हम राष्ट्रीय औसत के बराबर नहीं पहुंच जाते, तब तक चैन से बैठने का कोई सवाल नहीं है। जिला स्तर पर जो सुधार अब तक देखे गए हैं, उन्हें अब पंचायत स्तर की इस नई नीति के जरिए और अधिक गति मिलने की पूरी संभावना है।
योजनाओं के क्रियान्वयन में आएगी पारदर्शिता, स्थानीय जरूरतें बनेंगी आधार
किसी भी कल्याणकारी योजना की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह लक्षित समूह तक कितनी प्रभावी ढंग से पहुंचती है। अब तक कई बार ऐसा देखने को मिलता था कि सरकार योजनाएं तो बड़े पैमाने पर बना देती थी, लेकिन स्थानीय जरूरतों के हिसाब से उनका असर फीका पड़ जाता था। उदाहरण के लिए, किसी पंचायत में शिक्षा की बुनियादी जरूरत सबसे बड़ी हो सकती है, जबकि दूसरी पंचायत में पेयजल संकट मुख्य समस्या हो सकती है।
पंचायत स्तर पर गरीबी और स्वास्थ्य के आंकड़ों का संकलन होने से योजनाओं की प्राथमिकताओं को सही दिशा मिलेगी। स्थानीय स्तर पर चुने गए प्रतिनिधियों और प्रशासनिक अमले को यह सटीक जानकारी होगी कि उनके क्षेत्र में किस सेक्टर में फंड की सबसे ज्यादा जरूरत है। इससे संसाधनों की बर्बादी रुकेगी और विकास कार्यों में पूर्ण पारदर्शिता आएगी।
"बिहार में विकास के दावों को अब केवल कागजों पर नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत के तराजू पर तोला जाएगा। पंचायत स्तर पर हर मानक की मॉनिटरिंग होने से योजनाओं का लाभ सीधे और सही व्यक्ति तक पहुंचेगा।" — योजना एवं विकास विभाग, बिहार सरकार
भविष्य की रणनीति और चुनौतियों से पार पाने की तैयारी
भले ही सरकार की यह पहल बेहद दूरदर्शी और सराहनीय है, लेकिन जमीनी स्तर पर इस तरह के वृहद डेटाबेस को तैयार करना और उसे नियमित रूप से अपडेट रखना एक बड़ी चुनौती भी है। इसके लिए जमीनी स्तर के कर्मचारियों, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, पंचायत सचिवों और सांख्यिकी कर्मियों को विशेष रूप से प्रशिक्षित करना होगा। डेटा संकलन में पारदर्शिता और शुद्धता बनाए रखना इस पूरी प्रक्रिया की सबसे बड़ी सफलता की कुंजी होगी।
आने वाले दिनों में योजना एवं विकास विभाग इस दिशा में तकनीकी सहायता का भी पूरा उपयोग करने की योजना बना रहा है, ताकि डिजिटल माध्यमों से रियल-टाइम डेटा जुटाया जा सके। यदि यह प्रणाली सफलतापूर्वक धरातल पर उतर जाती है, तो बिहार देश के उन अग्रणी राज्यों में शामिल हो जाएगा जहां पंचायत स्तर के विकास सूचकांक के आधार पर नीतियां तय होती हैं। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी एक नई मजबूती मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।








