नई दिल्ली के सियासी गलियारों में इन दिनों मुख्य चुनाव आयुक्त यानी सीईसी के इस्तीफे को लेकर घमासान मचा हुआ है। विपक्षी दलों ने सड़क से लेकर संसद तक इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की पूरी तैयारी कर ली है। कहने के लिए यह पूरा विरोध प्रदर्शन सीईसी के इस्तीफे और प्रशासनिक फैसलों के खिलाफ था। लेकिन जब इन प्रदर्शनों की तस्वीरें सामने आईं, तो राजनीतिक विश्लेषकों ने इसके दूसरे ही मायने निकाल लिए। तस्वीरों में दिख रहे नेताओं के चेहरे के भाव और उनकी आपसी सांठगांठ ने विरोध प्रदर्शन के असली मंसूबों पर से पर्दा उठा दिया है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच राहुल गांधी और क्षेत्रीय दलों के बीच के रिश्तों पर भी नए सिरे से सवाल उठने लगे हैं। डीएमके और अन्य विपक्षी दलों के नेताओं के बयानों ने यह साफ कर दिया है कि गठबंधन के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। जिन नेताओं ने कभी कांग्रेस पार्टी पर गंभीर आरोप लगाए थे, वे अब ज्ञानेश कुमार मामले में नए सिरे से आईना दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस तरह के विरोध प्रदर्शन असल मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने का एक राजनीतिक पैंतरा मात्र हैं।
तस्वीरों में छिपी सियासी हकीकत और दलों के बदले सुर
प्रदर्शन स्थलों से जो तस्वीरें वायरल हुईं, उनमें कई ऐसे नेता एक मंच पर नजर आए जो आमतौर पर एक-दूसरे देखना तक पसंद नहीं करते थे। इन तस्वीरों ने यह साबित कर दिया कि राजनीति में कोई किसी का स्थाई दुश्मन या दोस्त नहीं होता है। सीईसी के इस्तीफे का मुद्दा महज एक बहाना था जिसके जरिए सभी दल अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटे थे। आम जनता इन बयानों और तस्वीरों के खेल को अब बहुत अच्छी तरह समझने लगी है। सोशल मीडिया पर भी इन तस्वीरों को लेकर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं, जिससे राजनीतिक दलों की किरकिरी हो रही है।
दूसरी तरफ, देश की शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा प्रणाली को लेकर भी सियासी पारा सातवें आसमान पर है। बार-बार होने वाले पेपर लीक और परीक्षा की नाकामियों को लेकर मोदी सरकार लगातार विपक्ष के निशाने पर बनी हुई है। सरकार का यह दावा है कि विपक्ष इस नाकामी को सिर्फ मौजूदा सरकार की ही कमी बता रहा है, जबकि इसमें प्रशासनिक और व्यवस्थागत सुधारों की लंबी प्रक्रिया शामिल है। संसद से पेपर लीक रोकने वाला कड़ा कानून पास होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भरोसा जताया है कि इससे परीक्षा प्रणाली में छात्रों का विश्वास फिर से बहाल होगा।
शिक्षा मंत्री का इस्तीफा और युवाओं की सुलगती भावनाएं
इसी कड़ी में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का हालिया इस्तीफा और उनका दर्द भरा पत्र भी काफी चर्चा का विषय बना हुआ है। अपने त्यागपत्र में उन्होंने साफ लिखा है कि पिछले दस दिनों से उनका मन बेहद दुखी था और वे युवाओं की भावनाओं का पूरा सम्मान करते हैं। शिक्षा मंत्रालय के स्तर पर लिए गए इन बड़े फैसलों ने यह दिखा दिया है कि सरकार युवाओं के गुस्से को नजरअंदाज करने के मूड में बिल्कुल नहीं है। हालांकि विपक्षी दल इसे केवल एक राजनीतिक नाटक करार दे रहे हैं और कह रहे हैं कि स्थिति बहुत पहले ही हाथ से निकल चुकी थी।
जमीनी स्तर पर अगर बात करें तो आम छात्र और युवा वर्ग इस पूरे राजनीतिक ड्रामे से बेहद आहत नजर आता है। युवाओं का कहना है कि चाहे सीईसी का इस्तीफा हो या फिर परीक्षाओं का रद्द होना, इन सबका सीधा असर आम जनता के भविष्य पर पड़ता है। नेता लोग अपने फायदे के लिए इन मुद्दों को तूल देते हैं जबकि असली नुकसान युवाओं का होता है। 'द फ्रीलान्स' की ग्राउंड पड़ताल में यह बात सामने आई है कि जनता अब इन खोखले राजनीतिक आंदोलनों से ऊब चुकी है और उसे ठोस तथा स्थाई समाधान की दरकार है।
आगामी सियासी रणनीतियाँ और जनता का बदलता रुख
आने वाले दिनों में इन सभी मुद्दों पर राजनीति और अधिक गरमाने के पूरे आसार दिखाई दे रहे हैं। चुनाव आयोग से जुड़े मामलों और शैक्षणिक सुधारों को लेकर संसद से लेकर सड़क तक घमासान रुकने वाला नहीं है। सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी गोटियां फिट करने में लगे हैं ताकि आने वाले चुनावों में इसका फायदा उठाया जा सके। लेकिन जागरूक हो चुकी जनता अब इन तस्वीरों और बयानों के पीछे के असली चेहरों को पहचानने लगी है। आने वाला समय बताएगा कि जनता इन सियासी चालों का क्या जवाब देती है।







