कच्चे तेल में भारी उबाल, 100 डॉलर के पार पहुंचे भाव
वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक बार फिर भूचाल आ गया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तीसरे सत्र में जोरदार तेजी दर्ज की गई है। इस अचानक आए भूचाल के पीछे मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव और चीन की एक बड़ी नीतिगत चाल को मुख्य वजह माना जा रहा है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड उछलकर 102.61 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया है, जबकि अमेरिकी डब्ल्यूटीआई (WTI) क्रूड भी मजबूती के साथ 93.12 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है। पिछले कुछ दिनों में आई इस तूफानी तेजी ने दुनिया भर के अर्थशास्त्रियों और आम जनता की नींद उड़ा दी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक इसी ऊंचे दायरे में बनी रहीं, तो इसका सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भारत के घरेलू बाजार पर भी पड़ना तय है। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है, ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाला हर एक उतार-चढ़ाव सीधे तौर पर देश की अर्थव्यवस्था और आम आदमी की जेब को प्रभावित करता है।
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अमेरिका और ईरान के बीच गहराता सैन्य टकराव
मध्य पूर्व में हालात लगातार विस्फोटक होते जा रहे हैं। ईरान के साथ चल रहे कड़े टकराव के बीच अमेरिका ने क्षेत्र में अपनी सैन्य ताकत को और अधिक बढ़ाने का फैसला किया है। पेंटागन की योजनाओं के मुताबिक, फारस की खाड़ी में एक और शक्तिशाली एयरक्राफ्ट कैरियर ग्रुप के साथ करीब 10,000 नौसैनिकों और मरीन कमांडो को तैनात किया जा रहा है। अमेरिकी प्रशासन का यह कदम तेहरान पर दबाव बनाने के लिए उठाया गया है, लेकिन इसके गंभीर परिणाम वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ते दिख रहे हैं।
रक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि इस भारी सैन्य तैनाती से अमेरिकी राष्ट्रपति के पास विकल्प तो बढ़ गए हैं, परंतु इसके साथ ही संघर्ष के और अधिक फैलने का खतरा भी कई गुना बढ़ गया है। बाजार को सबसे बड़ा डर इस बात का सता रहा है कि यदि ईरान ने किसी भी प्रकार की जवाबी कार्रवाई करते हुए खाड़ी देशों के ऊर्जा बुनियादी ढांचे या तेल कुओं को निशाना बनाया, तो वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की सप्लाई पूरी तरह बाधित हो सकती है।
रणनीतिक होर्मुज स्ट्रेट पर मंडराता बड़ा खतरा
दुनियाभर के तेल परिवहन के लिए सबसे अहम माने जाने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य (Storm of Hormuz) पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं। हाल ही में यूनाइटेड किंगडम मैरिटाइम ट्रेड ऑपरेशंस को यह सूचना मिली थी कि इस अहम समुद्री रास्ते से गुजर रहे एक तेल टैंकर को अज्ञात प्रोजेक्टाइल से निशाना बनाया गया है। इस घटना के बाद से समुद्री मार्ग से तेल ढोने वाली कंपनियों में भारी दहशत का माहौल है।
आंकड़े बताते हैं कि सितंबर महीने के दौरान ईरान ने अपने बंदरगाहों से टैंकरों पर लगभग न के बराबर कच्चा तेल लोड किया है। इसे अमेरिकी नौसेना द्वारा लगाई गई अघोषित नाकाबंदी और सख्त पाबंदियों का परिणाम माना जा रहा है। वैश्विक ऊर्जा बाजार में सप्लाई चेन के इस तरह प्रभावित होने से कीमतों पर ऊपर की ओर दबाव लगातार बना हुआ है, जिससे राहत की कोई उम्मीद फिलहाल नजर नहीं आ रही है।
चीन का बड़ा दांव और ईंधन निर्यात पर रोक
इस पूरे घटनाक्रम के बीच ड्रैगन यानी चीन की एक बड़ी नीति ने आग में घी का काम किया है। चीन ने अपने घरेलू बाजार में ईंधन की कमी और बढ़ती मांग को संतुलित करने के लिए फ्यूल के निर्यात पर कड़ी रोक लगा दी है। बीजिंग के इस अप्रत्याशित कदम से एशियाई और वैश्विक बाजारों में ईंधन की उपलब्धता को लेकर गहरी चिंता फैल गई है। जब दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अपने यहां से ईंधन बाहर भेजना बंद कर देती है, तो बाकी देशों पर इसका दबाव स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है।
ऊर्जा बाजार के विश्लेषकों का मानना है कि चीन का यह कदम वैश्विक बाजार में उथल-पुथल को और हवा दे रहा है। यूरोपीय देशों और अमेरिका के बीच भी इस बात को लेकर मंथन चल रहा है कि बढ़ती किल्लत से कैसे निपटा जाए। अमेरिकी प्रशासन यूरोपीय संघ से अपने रणनीतिक ईंधन भंडारों को जारी करने की अपील कर रहा है ताकि वैश्विक आपूर्ति को कुछ हद तक संभाला जा सके।
क्या भारत में महंगे हो जाएंगे पेट्रोल और डीजल?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम 100 डॉलर के पार निकलने के बाद देश के आम नागरिकों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत में पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ेंगे? फिलहाल राहत की बात यह है कि देश की सरकारी तेल विपणन कंपनियों (OMCs) ने ईंधन के खुदरा मूल्यों में कोई फेरबदल नहीं किया है। देश की राजधानी दिल्ली में पेट्रोल और डीजल अपने पुराने तय स्तर पर ही बिक रहे हैं। आखिरी बार देश में ईंधन की कीमतों में बड़ा बदलाव मई 2026 में देखा गया था।
हालांकि, आर्थिक विशेषज्ञों की चेतावनी है कि यदि कच्चे तेल की यह तेजी कुछ हफ्तों तक और जारी रहती है, तो भारत की तेल कंपनियों के लिए लंबे समय तक पुराने दामों पर ईंधन बेचना मुश्किल हो जाएगा। घरेलू खुदरा कीमतें इस बात पर पूरी तरह निर्भर करेंगी कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में यह उछाल कब तक टिकता है और सरकार इस पर क्या नीतिगत कदम उठाती है।
राजकोषीय घाटे पर पड़ सकता है भारी असर
महंगा कच्चा तेल केवल आम आदमी की जेब ही ढीली नहीं करता, बल्कि यह देश के राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) का पूरा गणित बिगाड़ देता है। हाल ही में ब्रोकरेज फर्म एमके की एक रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि यदि ब्रेंट क्रूड चालू वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में लगातार 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना रहता है, तो सरकार के बजट पर भारी वित्तीय दबाव पड़ सकता है। इससे सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के करीब 0.2 प्रतिशत तक अतिरिक्त फिसलन का जोखिम पैदा हो सकता है।
"यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें उच्च स्तर पर बनी रहीं, तो सरकार को फर्टिलाइजर सब्सिडी बढ़ाने और पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में कटौती करने की मजबूरी हो सकती है, जिससे राजकोषीय गणित प्रभावित होना तय है।" — वरिष्ठ आर्थिक विश्लेषक
सरकार इस संभावित वित्तीय दबाव से निपटने के लिए कई विकल्पों पर विचार कर सकती है, जिसमें आर्थिक स्थिरीकरण कोष से राशि निकालना और गैर-जरूरी पूंजीगत खर्चों में कटौती करना शामिल है। बहरहाल, भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में हो रहा यह उतार-चढ़ाव आने वाले दिनों में नीति निर्माताओं के लिए एक बड़ी चुनौती साबित होने वाला है।








