नई दिल्ली से ग्राउंड रिपोर्ट — भारतीय सेना और सुरक्षा बलों में अनुशासनहीनता और देश की सुरक्षा से जुड़े मामलों पर सैन्य अदालत यानी कोर्ट मार्शल की प्रक्रिया तेज हो गई है। हाल ही में सामने आए मामलों से साफ है कि सेना अपने आंतरिक अनुशासन और देश की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं कर रही है। ताजा मामलों में एक सूबेदार और एक लेफ्टिनेंट कर्नल पर गंभीर आरोप लगे हैं, जिनके खिलाफ सेना अधिनियम के तहत कानूनी और अनुशासनात्मक प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। सेना के भीतर इस तरह की सख्त कार्रवाई यह संदेश देती है कि खाकी और वर्दी की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले किसी भी शख्स को बख्शा नहीं जाएगा।
देश की सुरक्षा से जुड़े एक बड़े मामले में भारतीय सेना के एक लेफ्टिनेंट कर्नल को कोर्ट मार्शल की प्रक्रिया का सामना करना पड़ रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस अधिकारी पर पाकिस्तानी खुफिया एजेंटों के संपर्क में रहने और संवेदनशील सामरिक जानकारियां साझा करने का गंभीर आरोप है। सेना ने इस मामले में बेहद गोपनीय और कड़ी आंतरिक जांच के बाद यह कदम उठाया है। इसके अलावा एक अन्य मामले में सेना के ही एक सूबेदार का भी कोर्ट मार्शल किया जा रहा है, जिन पर आर्मी एक्ट की धारा 69 के तहत मामला दर्ज किया गया है। सेना के इन कड़े कदमों से साफ है कि बल के भीतर सुरक्षा नियमों को लेकर जीरो टॉलरेंस की नीति पर काम किया जा रहा है।
कानूनी पेचीदगियों के बीच केरल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
सैन्य अदालतों और कोर्ट मार्शल की कार्यप्रणाली को लेकर अदालतों में भी लगातार सुनवाई हो रही है। हाल ही में केरल हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि कोर्ट-मार्शल की कार्यवाही के दौरान जांच अधिकारी भी अभियोजक यानी प्रॉसिक्यूटर की भूमिका निभा सकता है। अदालत ने इस संबंध में दाखिल की गई एक नौसैनिक की याचिका को खारिज कर दिया है। इस फैसले से सैन्य अदालतों के कामकाज और कानूनी प्रक्रियाओं को लेकर स्थिति और स्पष्ट हो गई है। कानूनी जानकारों का मानना है कि यह फैसला सैन्य न्याय प्रणाली के आंतरिक नियमों और प्रशासनिक दक्षता के लिहाज से बहुत अहम है।
भारतीय सेना में कोर्ट मार्शल की यह पूरी प्रक्रिया आम अदालतों की तरह नहीं होती है, बल्कि इसके अपने कड़े सैन्य कानून और नियम होते हैं। आर्मी एक्ट के तहत देशद्रोह, जासूसी, दुश्मन देश के एजेंटों से संपर्क या कर्तव्य में गंभीर लापरवाही जैसे मामलों से निपटने के लिए समरी कोर्ट मार्शल, जनरल कोर्ट मार्शल या डिस्ट्रिक्ट कोर्ट मार्शल का प्रावधान है। इन अदालतों में सबूतों की बारीकी से जांच होती है और दोषी पाए जाने पर सेवा से बर्खास्तगी से लेकर कठोर कारावास तक की सजा सुनाई जाती है। मौजूदा मामलों में भी सेना के कानूनी विशेषज्ञों की टीम सभी पहलुओं की गहराई से पड़ताल कर रही है ताकि तय समयसीमा के भीतर निष्पक्ष और कड़ा फैसला लिया जा सके।
वर्दी की गरिमा और आंतरिक सुरक्षा का कड़ा संदेश
सेना के जानकारों का कहना है कि सैन्य बलों में अनुशासन ही सबसे बड़ी ताकत होती है। जब कोई अधिकारी या जवान इस अनुशासन को तोड़ता है या देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करता है, तो उसका सीधा असर देश की रक्षा तैयारियों पर पड़ता है। यही वजह है कि सेना ऐसे मामलों में किसी भी तरह की ढिलाई बरतने के पक्ष में नहीं होती है। लेफ्टिनेंट कर्नल और सूबेदार के खिलाफ चल रही ये मौजूदा कार्यवाहियां इस बात का प्रमाण हैं कि आंतरिक निगरानी तंत्र बेहद मजबूत है। खुफिया एजेंसियां और सेना का अपनी सुरक्षा इकाई किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर तुरंत और कड़ी नजर रखती है।
मैदानी स्तर पर इन खबरों के सामने आने के बाद देश भर में सुरक्षा और अनुशासन को लेकर बहस तेज हो गई है। आम नागरिक भी यह मान रहे हैं कि वर्दी पहनने वाले हर शख्स की जिम्मेदारी देश के प्रति सबसे पहले होनी चाहिए। 'द फ्रीलान्स' की ग्राउंड पड़ताल बताती है कि सेना मुख्यालय इन सभी मामलों पर बेहद करीब से नजर रख रहा है। आने वाले दिनों में इन अदालती कार्यवाहियों के पूरे होने के बाद सेना की तरफ से विस्तृत आधिकारिक बयान भी सामने आ सकते हैं। फिलहाल सैन्य बलों का पूरा फोकस अपनी आंतरिक व्यवस्था को पूरी तरह साफ-सुथरा रखने और देश की सीमाओं की सुरक्षा के साथ देश के भीतर भी पूरी चौकस नजर बनाए रखने पर है।







