दशकों पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त, ट्रेन यात्रियों का इंतजार हुआ लंबा
भारतीय रेलवे को देश की जीवन रेखा कहा जाता है, जहां रोजाना करोड़ों लोग अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिए सफर करते हैं। लेकिन जब यही ट्रेनें घंटों देरी से चलना शुरू कर दें, तो यात्रियों की पूरी दिनचर्या और योजनाएं बिगड़ जाती हैं। हाल ही में सामने आए एक आरटीआई खुलासे ने रेलवे के परिचालन तंत्र पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। आंकड़े बताते हैं कि दक्षिण पूर्व रेलवे जोन में ट्रेनों की लेटलतीफी अब एक गंभीर समस्या बन चुकी है, जिससे सफर करने वाले आम नागरिक बुरी तरह परेशान हैं।
रेलवे बोर्ड के कोचिंग निदेशालय की तरफ से दिए गए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, ट्रेनों के समय पर चलने यानी पंक्चुअलिटी के मामले में हालात लगातार बद से बदतर होते जा रहे हैं। एक समय ऐसा भी था जब इस क्षेत्र में ट्रेनें बेहद पाबंद हुआ करती थीं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में स्थिति तेजी से पलटी है। आलम यह है कि देश भर के प्रमुख रेल जोनों में यह क्षेत्र समयबद्धता के मामले में काफी पिछड़ चुका है और यात्रियों को रेलवे स्टेशनों पर घंटों इंतजार करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
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दस साल में आधा हुआ समय पर ट्रेन चलाने का रिकॉर्ड
आरटीआई के जरिए मिले दस्तावेजों के मुताबिक, दक्षिण पूर्व रेलवे की समयबद्धता का ग्राफ पिछले दस सालों में लगातार नीचे की ओर लुढ़का है। साल 2017-18 के दौरान इस जोन की पंक्चुअलिटी 90.72 प्रतिशत दर्ज की गई थी, जो अपने आप में एक बेहतर प्रदर्शन माना जाता था। इसके बाद कोविड-19 महामारी के दौरान जब ट्रेनों की संख्या बेहद सीमित थी, तब वर्ष 2020-21 में यह आंकड़ा बढ़कर 95.55 प्रतिशत तक पहुंच गया था।
महामारी का दौर गुजरने और ट्रेनों का संचालन पूरी क्षमता से शुरू होने के बाद स्थिति तेजी से बिगड़ने लगी। साल 2022-23 में गिरकर यह 86.35 प्रतिशत पर आई, जो अगले साल 2023-24 में और लुढ़कते हुए 72.08 प्रतिशत पर सिमट गई। इसके बाद के वर्षों में गिरावट का यह सिलसिला थमा नहीं और वित्तीय वर्ष 2024-25 में यह 61.97 प्रतिशत तथा 2025-26 में घटकर महज 56.26 प्रतिशत रह गई। मौजूदा वित्त वर्ष में स्थिति और भी ज्यादा चिंताजनक हो चुकी है।
चालू वित्त वर्ष में महज 54 प्रतिशत पर पहुंची पंक्चुअलिटी
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चालू वित्त वर्ष में अगस्त तक के आंकड़ों के अनुसार, दक्षिण पूर्व रेलवे की समयबद्धता गिरकर केवल 54.18 प्रतिशत पर आ गई है। देश भर के कुल 18 रेलवे जोनों की सूची में यह जोन निचले पायदान यानी 17वें स्थान पर खड़ा है। देश के दूसरे हिस्सों में जहां रेलवे ने अपनी रफ्तार और समय का बेहतर प्रबंधन किया है, वहीं इस क्षेत्र में हालात सुधरने का नाम नहीं ले रहे हैं।
दूसरी तरफ, उत्तर पश्चिमी रेलवे ने 94.80 प्रतिशत की शानदार समयबद्धता के साथ पहला स्थान हासिल किया है, जबकि पश्चिम रेलवे 94.10 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर बना हुआ है। इसके विपरीत, दक्षिण पूर्व रेलवे के अंतर्गत आने वाले विभिन्न रेल मंडलों में यात्री ट्रेनों का परिचालन पटरी से उतरा हुआ नजर आ रहा है, जिससे रोजाना सफर करने वाले नौकरीपेशा, व्यापारी और आम लोग बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं।
कनेक्टिंग ट्रेनें छूटने और सफर बिगड़ने का बढ़ा संकट
ट्रेनों की इस भारी लेटलतीफी का खामियाजा सबसे ज्यादा उन मुसाफिरों को भुगतना पड़ रहा है जो लंबी दूरी की यात्रा करते हैं। ट्रेन के अपने निर्धारित समय से घंटों विलंब से पहुंचने के कारण यात्रियों की आगे की कनेक्टिंग ट्रेनें छूट जाती हैं। कई बार स्थिति इतनी खराब हो जाती है कि लोगों को अपनी फ्लाइट या अन्य परिवहन माध्यम भी रद्द करने पड़ते हैं। बुजुर्गों, छोटे बच्चों और मरीजों के लिए रेलवे स्टेशनों पर प्लेटफार्म पर बैठकर लंबा इंतजार करना किसी बड़ी सजा से कम नहीं होता।
विशेषकर रात के वक्त या तड़के आने वाली गाड़ियों के लेट होने से मुसाफिरों को भारी असुरक्षा और असुविधा का सामना करना पड़ता है। लोगों का कहना है कि वे अपनी यात्रा का शेड्यूल पूरी प्लानिंग के साथ तय करते हैं, लेकिन रेलवे की खराब टाइमिंग उनके सारे अरमानों पर पानी फेर देती है। रेलवे बोर्ड की तरफ से भले ही समय-समय पर जोनल अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए जाते हों, लेकिन मैदानी स्तर पर इसका असर दिखाई नहीं दे रहा है।
मालगाड़ियों का भारी दबाव और ट्रैक मेंटेनेंस बन रही बड़ी वजह
विशेषज्ञों और रेलवे से जुड़े सूत्रों का मानना है कि इस जोन के अंतर्गत आने वाले कई प्रमुख मंडलों में भारी माल ढुलाई का अत्यधिक दबाव रहता है। कोयला और अन्य खनिज संपदा से जुड़े इन इलाकों में मालगाड़ियों की आवाजाही बहुत ज्यादा होती है, जिसकी वजह से पटरियों पर ट्रैफिक का दबाव बढ़ जाता है। इसके अलावा, पटरियों के आधुनिकीकरण और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए लगातार किए जाने वाले मेंटेनेंस ब्लॉक भी यात्री गाड़ियों की रफ्तार पर ब्रेक लगा देते हैं।
हालांकि, तकनीकी और ढांचागत कारणों का हवाला देकर यात्रियों की परेशानियों को लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। आम जनता के लिए सबसे बड़ा पैमाना यही होता है कि उनकी ट्रेन समय पर अपने गंतव्य तक पहुंचे। बुनियादी ढांचे के विकास के साथ-साथ यात्री ट्रेनों के परिचालन समय को बेहतर बनाने के लिए रेलवे प्रशासन को अब कुछ ठोस और कड़े कदम उठाने होंगे, ताकि जनता को इस अंतहीन इंतजार से मुक्ति मिल सके।
"ट्रेनों की लेटलतीफी ने आम आदमी के सफर को थकाऊ बना दिया है। रेलवे बोर्ड को इस पर तुरंत गंभीर कदम उठाने चाहिए ताकि समयबद्धता में सुधार हो सके।" — एक वरिष्ठ रेल यात्री और उपभोक्ता अधिकार कार्यकर्ता








