फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी को जोड़ने वाला होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) दुनिया की ऊर्जा धमनियों का सबसे संवेदनशील हिस्सा है। पिछले कुछ हफ्तों से अंतरराष्ट्रीय मीडिया से लेकर कूटनीतिक गलियारों तक एक ही सवाल गूंज रहा है—क्या ईरान ने इस सामरिक जलडमरूमध्य पर अपना पारंपरिक नियंत्रण खो दिया है? 'द फ्रीलान्स' के इनपुट और विभिन्न वैश्विक रक्षा रिपोर्टों के विश्लेषण से जो तस्वीर उभरती है, वह बेहद पेचीदा और भू-राजनीतिक उथल-पुथल से भरी हुई है।
रणनीतिक मुहाने पर अमेरिकी 'स्टील की दीवार'
अमेरिकी नेतृत्व और पश्चिमी देशों की ओर से हालिया बयानों ने इस क्षेत्र के तापमान को और बढ़ा दिया है। अमेरिकी बयानों में होर्मुज स्ट्रेट के मुहाने पर एक मजबूत 'स्टील की दीवार' खड़ी करने का दावा किया गया है। इसका सामरिक अर्थ यह है कि अमेरिकी नौसेना और उसके सहयोगी देश अब ईरान के कथित एकाधिकार को तोड़ने के लिए आक्रामक गश्त और फॉरवर्ड डिप्लॉयमेंट (Forward Deployment) की नीति पर पूरी तरह अमल कर रहे हैं। पश्चिमी नौसेनाओं की यह उपस्थिति ईरान के उस रणनीतिक दबाव को कम करने की कोशिश है, जिसके तहत तेहरान अक्सर इस रास्ते को बंद करने या तेल टैंकरों को रोकने की धमकी देता रहा है।
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अंडमान-निकोबार जैसी भू-राजनीतिक चाबी: रणनीतिक द्वीपों पर तनातनी
खुफिया और रक्षा विश्लेषकों के अनुसार, अमेरिका और उसके सहयोगियों ने सिर्फ समुद्र के रास्ते ही नहीं, बल्कि सामरिक द्वीपों पर भी अपनी पकड़ मजबूत करनी शुरू कर दी है। जिस प्रकार भारत के लिए अंडमान और निकोबार द्वीप समूह हिंद महासागर की सुरक्षा की 'चाबी' हैं, ठीक उसी तरह होर्मुज के मुहाने पर स्थित कुछ प्रमुख द्वीप और रणनीतिक ठिकाने इस पूरे जलमार्ग को नियंत्रित करते हैं। अमेरिका द्वारा इन इलाकों के आसपास हालिया सैन्य कार्रवाइयों ने ईरान की सामरिक बढ़त को तगड़ा झटका दिया है। यही वजह है कि अब जहाजों के आवागमन के लिए वैकल्पिक या संरक्षित समुद्री रास्तों पर विचार किया जा रहा है, जिससे ईरान का नियंत्रण स्वतः कमजोर पड़ता दिख रहा है।
ईरान का पलटवार: सत्ता परिवर्तन तक जंग का ऐलान
दूसरी ओर, तेहरान पीछे हटने को तैयार नहीं है। ईरानी नेतृत्व ने दो टूक शब्दों में स्पष्ट कर दिया है कि जब तक उनकी संप्रभुता और शासन व्यवस्था को सीधा निशाना बनाने की साजिशें बंद नहीं होतीं, तब तक यह जंग और प्रतिरोध जारी रहेगा। ईरानी रक्षा प्रतिष्ठानों का मानना है कि पश्चिमी देश मनोवैज्ञानिक युद्ध के जरिए उनके नियंत्रण को कमजोर दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि जमीनी हकीकत में रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) अभी भी इस समुद्री मार्ग पर कड़ी नजर बनाए हुए हैं। हालांकि, आर्थिक प्रतिबंधों और सैन्य दबाव के कारण ईरान की क्षमता पर भारी असर जरूर पड़ा है।
जहाजों का बदलता रास्ता और वैश्विक ऊर्जा बाजार की चिंता
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा असर वैश्विक शिपिंग और ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ रहा है। दुनिया का एक तिहाई एलएनजी (LNG) और कच्चे तेल का एक बड़ा हिस्सा इसी स्ट्रेट से होकर गुजरता है। अनिश्चितता के इस माहौल में कई कमर्शियल शिपिंग कंपनियों ने अपने जहाजों के आवागमन के लिए सुरक्षित कॉरिडोर और वैकल्पिक मार्गों की तलाश शुरू कर दी है। यदि होर्मुज स्ट्रेट से ईरान का पारंपरिक नियंत्रण पूरी तरह से टूटता है, तो वैश्विक तेल बाजार में भारी अस्थिरता आ सकती है, जिसका सीधा असर भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के आयात बिल पर पड़ेगा।
निष्कर्ष और आगे की राह
फिलहाल, स्थिति एक 'प्रॉक्सी वॉर' और मनोवैज्ञानिक जंग जैसी बनी हुई है। ईरान पूरी तरह से अपनी पकड़ खो चुका है, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि अमेरिकी नौसेना की आक्रामक रणनीतियों और 'स्टील की दीवार' ने तेहरान के रणनीतिक एकाधिकार को भारी चुनौती दी है। 'द फ्रीलान्स' की इस पड़ताल से साफ है कि फारस की खाड़ी का यह पानी कभी भी किसी बड़े सैन्य संघर्ष की आग में सुलग सकता है, जिस पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हुई हैं।








