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देशपढ़ने में समय: 6 मिनट

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां की दो टूक: नागरिकता और वोटिंग अधिकार एक-दूसरे से जुड़े, छेड़छाड़ नामुमकिन

देशभर में वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर मचे घमासान के बीच सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि किसी भी नागरिक को मतदान के अधिकार से वंचित करना उसे दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने जैसा है। वहीं दूसरी ओर, इस टिप्पणी पर न्यायिक गलियारों में बहस भी तेज हो गई है।
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नेशनल डेस्क, द फ्रीलांस
राष्ट्रीय संपादकीय ब्यूरो•5 अक्टूबर 2026 • अपडेटेड•27
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सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां की दो टूक: नागरिकता और वोटिंग अधिकार एक-दूसरे से जुड़े, छेड़छाड़ नामुमकिन
📷 सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां की दो टूक: नागरिकता और वोटिंग अधिकार एक-दूसरे से जुड़े, छेड़छाड़ नामुमकिन — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • जस्टिस उज्जल भुइयां ने कहा कि भारतीय नागरिकता और वोटिंग अधिकार एक-दूसरे के पर्याय हैं और इनसे खिलवाड़ नहीं हो सकता।
  • नालसर यूनिवर्सिटी में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने अनुच्छेद 326 की महत्ता पर जोर देते हुए सख्त रुख अपनाया।
  • पूर्व सीजेआई बीआर गवई और अन्य सेवानिवृत्त जजों ने इस टिप्पणी को लेकर न्यायिक मर्यादा और विचाराधीन मामलों पर सवाल उठाए हैं।
  • अपने बयानों के चलते जस्टिस भुइयां लगातार पुलिस सुधार, पर्यावरण और लोकतांत्रिक असहमति जैसे मुद्दों पर मुखर रहे हैं।

वोटिंग अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट से आया बड़ा बयान

देश की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर (SIR) को लेकर इन दिनों भारी सरगर्मी देखने को मिल रही है। इस गर्माए हुए माहौल के बीच सर्वोच्च अदालत के न्यायाधीश जस्टिस उज्जल भुइयां ने एक ऐसा बयान दिया है जिसने बहस को एक बिल्कुल नए आयाम पर ला खड़ा किया है। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब देश के विभिन्न राज्यों में मतदाता सूचियों के संशोधन और उससे जुड़ी प्रक्रियाओं के खिलाफ कई याचिकाएं अदालत के विचाराधीन हैं। न्यायपालिका की भूमिका और संवैधानिक अधिकारों के दायरे को लेकर यह टिप्पणी बेहद अहम मानी जा रही है।

हाल ही में हैदराबाद स्थित प्रसिद्ध नालसर यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ में आयोजित एक विशेष शैक्षणिक और विधिक समारोह के दौरान जस्टिस भुइयां ने अपने संबोधन में साफ शब्दों में कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की रीढ़ उसका मतदान तंत्र है। उन्होंने स्पष्ट किया कि नागरिकों की नागरिकता और उनके मत डालने का अधिकार दो ऐसे पहलू हैं जो आपस में मजबूती से गुंथे हुए हैं। किसी भी स्थिति में इन दोनों को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता और न ही इनके बीच कोई कृत्रिम दीवार खड़ी की जा सकती है।

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संविधान के अनुच्छेद 326 और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा

अपने संबोधन को आगे बढ़ाते हुए जस्टिस उज्जल भुइयां ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 326 का विशेष तौर पर जिक्र किया। उन्होंने कहा कि हमारे संविधान निर्माताओं ने नागरिकों को जो मताधिकार सौंपा है, वह किसी भी सूरत में समझौते का विषय नहीं हो सकता। संविधान से ऊपर इस देश में कुछ भी नहीं है और इस बुनियादी ढांचे के साथ किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ लोकतांत्रिक मूल्यों के सीधे खिलाफ बैठती है।

उन्होंने बहुत ही मजबूत शब्दों का इस्तेमाल करते हुए समझाया कि यदि किसी वैध भारतीय नागरिक को उसकी इच्छा या प्रशासनिक खामियों के चलते मतदान प्रक्रिया से बाहर कर दिया जाता है, तो यह उसके साथ बहुत बड़ा अन्याय है। यह स्थिति ठीक वैसी ही है जैसे किसी शरीर से उसकी आत्मा को खींचकर बाहर निकाल लिया जाए। ऐसा कदम उठाने से व्यक्ति अपने ही देश की सरज़मीं पर एक दोयम दर्जे का नागरिक बनकर रह जाता है, जिसे किसी भी लोकतांत्रिक संविधान में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

न्यायिक टिप्पणियों पर कानूनी गलियारों में छिड़ी बहस

जस्टिस भुइयां के इस मुखर बयान के सामने आने के बाद से कानूनी जगत में मिली-जुली प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया है। एक तरफ जहां मानवाधिकार और नागरिक स्वतंत्रता के पैरोकार इस बयान को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जनहित का मजबूत पक्ष मान रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ न्यायिक अनुशासन को लेकर भी सवाल उठ खड़े हुए हैं। देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और कई अन्य वरिष्ठ सेवानिवृत्त न्यायविदों ने इस बात पर आपत्ति जताई है कि जब एसआईआर से जुड़ा मामला खुद सर्वोच्च न्यायालय के विचाराधीन है, तब इस तरह की टिप्पणियां सार्वजनिक मंचों से नहीं की जानी चाहिए थीं।

पूर्व सीजेआई गवई ने माना कि इस प्रकार के संवेदनशील मामलों पर न्यायाधीशों को बहुत अधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है। उनका मानना है कि विचाराधीन मुकदमों से जुड़े विषयों पर सार्वजनिक रूप से राय व्यक्त करने से न्यायिक मर्यादा और निष्पक्षता पर अनावश्यक सवाल उठने की गुंजाइश बन जाती है, जिससे न्यायपालिका की आंतरिक प्रक्रिया और संतुलन प्रभावित हो सकता है।

"किसी भी भारतीय नागरिक को उसके मतदान के अधिकार से वंचित करना उसे अपने ही देश में दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने जैसा है। संविधान के अनुच्छेद 326 के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ स्वीकार नहीं की जा सकती।" — जस्टिस उज्जल भुइयां, न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट

पुलिस कार्यप्रणाली और लोकतांत्रिक असहमतियों पर मुखर राय

यह कोई पहला अवसर नहीं है जब जस्टिस उज्जल भुइयां ने अपने बयानों से सुर्खियां बटोरी हों। पिछले कुछ महीनों के दौरान उन्होंने देश के कई प्रतिष्ठित मंचों से लोकतंत्र, पुलिस प्रशासन, पर्यावरण संरक्षण और अभिव्यक्ति की आजादी जैसे गंभीर विषयों पर बेहद बेबाक टिप्पणियां की हैं। कुछ समय पूर्व दिल्ली में आयोजित एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम के दौरान उन्होंने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे आम नागरिकों के साथ पुलिस बल के कुछ युवा अधिकारियों द्वारा कथित तौर पर सख्ती बरतने और मारपीट करने की घटना पर गहरी चिंता व्यक्त की थी।

उन्होंने उस दौरान यह भी सवाल उठाया था कि क्या कानून के तहत हिरासत में लिए जाते ही कोई नागरिक अपने सभी मौलिक अधिकार खो बैठता है? उनका कहना था कि सड़क पर तैनात एक सामान्य पुलिसकर्मी जनता के लिए राज्य की संपूर्ण शक्ति का प्रतीक होता है, इसलिए यह अनिवार्य है कि पुलिस अपनी विश्वसनीयता को हर हाल में बचा कर रखे और अपने आचरण में पूरी तरह संविधान सम्मत, निष्पक्ष तथा धर्मनिरपेक्ष नजर आए।

पर्यावरण संरक्षण और न्यायिक पारदर्शिता की वकालत

इसके अलावा, पिछले दिनों गुवाहाटी में आयोजित एक सेमिनार में बोलते हुए उन्होंने पर्यावरणीय क्षरण के मुद्दों को राजनीतिक दलों की प्राथमिकताओं से बाहर बताए जाने पर भी तंज कसा था। उनका तर्क था कि पर्यावरण जैसे मुद्दों से चूंकि कोई तात्कालिक बड़ा वोट बैंक या चुनावी लाभ नहीं जुड़ा होता, इसलिए राजनीतिक दल इस पर चुप्पी साध लेते हैं। ऐसी स्थिति में नागरिकों और अदालतों को ही आगे आकर प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा के लिए मजबूत आवाज उठानी होगी।

जस्टिस भुइयां ने न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाने की वकालत करते हुए भी महत्वपूर्ण टिप्पणियां की थीं। उन्होंने कहा था कि पारदर्शिता के अभाव में कई बार ऐसी प्रवृत्तियां अंदर आ जाती हैं जो समाज के कुछ वर्गों के प्रति अपमानजनक भाषा का प्रयोग करती हैं। कुल मिलाकर, उनके ये तमाम बयान इस बात की गवाही देते हैं कि वे देश के बुनियादी लोकतांत्रिक ताने-बाने को मजबूत बनाए रखने के लिए लगातार वैचारिक और विधिक स्तर पर सक्रिय बने हुए हैं।

द फ्रीलांस पत्रकारिता नीति (Editorial Commitment):हम निष्पक्ष, सटीक और तथ्यात्मक पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह समाचार रिपोर्ट विभिन्न प्रमाणित समाचार एजेंसियों, आधिकारिक बयानों और स्थानीय संवाददाताओं से प्राप्त इनपुट के आधार पर तैयार की गई है।
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