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कर्नाटक सरकार को बड़ा झटका, हाई कोर्ट ने एससी-एसटी आरक्षण बढ़ाने का फैसला रद्द किया

कर्नाटक हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को तगड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने एससी और एसटी वर्ग का आरक्षण बढ़ाने के फैसले को असंवैधानिक करार दिया है। अदालत ने साफ कहा है कि सरकार पचास प्रतिशत की आरक्षण सीमा को पार नहीं कर सकती है।
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नेशनल डेस्क, द फ्रीलांस
राष्ट्रीय संपादकीय ब्यूरो•15 अक्टूबर 2026 • अपडेटेड•49
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कर्नाटक सरकार को बड़ा झटका, हाई कोर्ट ने एससी-एसटी आरक्षण बढ़ाने का फैसला रद्द किया
📷 कर्नाटक सरकार को बड़ा झटका, हाई कोर्ट ने एससी-एसटी आरक्षण बढ़ाने का फैसला रद्द किया — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • कर्नाटक हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को तगड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने एससी और एसटी वर्ग का आरक्षण बढ़ाने के फैसले को असंवैधानिक करार दिया है। अदालत ने साफ कहा है कि सरकार पचास प्रतिशत की आरक्षण सीमा को पार नहीं कर सकती है।
  • इस खबर से जुड़े सभी पहलुओं की जांच और निगरानी संबंधित विभागों द्वारा की जा रही है।
  • विशेषज्ञों के अनुसार इस घटनाक्रम का आम जनता पर सीधा असर पड़ सकता है।

बेंगलुरु/ग्राउंड ब्यूरो — कर्नाटक की राजनीति और कानून के गलियारों से एक बड़ी खबर सामने आ रही है। कर्नाटक हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के उस फैसले को पूरी तरह रद्द कर दिया है, जिसके तहत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति यानी एससी और एसटी वर्ग का आरक्षण बढ़ाया गया था। अदालत ने अपने सख्त फैसले में कहा है कि सरकार किसी भी हाल में पचास प्रतिशत की तय आरक्षण सीमा को नहीं तोड़ सकती है। इस फैसले के बाद राज्य सरकार की मुश्किलें काफी बढ़ गई हैं और राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है।

यह पूरा मामला पिछले कुछ समय से लगातार चर्चा में बना हुआ था। पिछली सरकार ने चुनावी और सामाजिक समीकरणों को साधते हुए एससी और एसटी समुदाय के कोटे में इजाफा करने का बड़ा कदम उठाया था। लेकिन इस फैसले को अदालत में चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यह फैसला कानून के नियमों के खिलाफ है और इससे सामान्य वर्ग के अधिकारों पर असर पड़ता है। लंबी कानूनी बहस और दलीलें सुनने के बाद आखिरकार हाई कोर्ट ने इस बढ़ोतरी को असंवैधानिक घोषित कर दिया है।

पचास प्रतिशत की कानूनी सीमा का हवाला

अदालत ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेशों और संविधान के नियमों का हवाला दिया है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि देश में आरक्षण की कुल सीमा पचास प्रतिशत तय की गई है। कोई भी राज्य सरकार विशेष परिस्थितियों का हवाला देकर भी इस तय सीमा से आगे नहीं जा सकती है। यदि ऐसा किया जाता है, तो वह कानून की नजर में वैध नहीं माना जाएगा। अदालत की इस टिप्पणी से साफ है कि कोटे की राजनीति करने वाले दलों को अब कानूनी रूप से बड़े झटकों का सामना करना पड़ सकता है।

इस कानूनी झटके के साथ ही कर्नाटक सरकार के सामने एक नई प्रशासनिक चुनौती भी खड़ी हो गई है। राज्य में कई सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में दाखिले की प्रक्रिया चल रही है। बढ़ा हुआ आरक्षण रद्द होने के बाद अब सरकार और संबंधित विभागों को अपने नियमों में फेरबदल करना होगा। अधिकारियों का कहना है कि वे अदालत के इस पूरे आदेश की कॉपी का बारीकी से अध्ययन कर रहे हैं। इसके बाद ही आगे की कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई पर अंतिम मुहर लगाई जाएगी।

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राजनीतिक दलों के बीच बढ़ी सरगर्मी

हाई कोर्ट के इस बड़े फैसले के बाद राज्य की राजनीति में भूचाल आ गया है। विपक्षी दल अब सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं और इसे कानूनी रूप से कमजोर फैसला बता रहे हैं। वहीं, सत्ता पक्ष के नेता इस मुद्दे पर आपस में मंथन कर रहे हैं कि आगे की क्या रणनीति अपनाई जाए। क्या सरकार इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख करेगी या फिर कोई दूसरा रास्ता निकालेगी, इस पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर सियासी बयानबाजी और तेज होने के आसार हैं।

दूसरी ओर, आरक्षित वर्गों के युवाओं और छात्र संगठनों में भी इस फैसले को लेकर असमंजस की स्थिति बन गई है। जो युवा बढ़े हुए कोटे के तहत अपने भविष्य के सपने देख रहे थे, वे अब असमंजस में हैं। सामाजिक संगठनों ने सरकार से मांग की है कि वह कमजोर वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी विकल्पों पर जल्द से जल्द विचार करे। द फ्रीलान्स की टीम इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए हुए है और जैसे ही कोई नया अपडेट आएगा, हम आप तक सबसे पहले पहुंचाएंगे।

भविष्य की कानूनी राह और प्रशासनिक कदम

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि कर्नाटक सरकार इस कानूनी लड़ाई में अगला कदम क्या उठाएगी। जानकारों का मानना है कि सरकार इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाखिल कर सकती है। हालांकि, वहां भी पचास प्रतिशत की सीमा को पार करना एक बड़ी चुनौती होगी क्योंकि देश की शीर्ष अदालत इस मामले में पहले से ही काफी सख्त रुख अपनाती रही है। प्रशासन फिलहाल हाई कोर्ट के निर्देशानुसार आगे की प्रक्रिया को दुरुस्त करने में जुट गया है ताकि छात्रों और नौकरी चाहने वालों को ज्यादा परेशानी का सामना न करना पड़े।

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