NSE का मेगा आईपीओ सब्सक्रिप्शन के अंतिम दौर में
देश के सबसे बड़े स्टॉक एक्सचेंज नेशनल स्टॉक एक्सचेंज यानी एनएसई (NSE) का बहुप्रतीक्षित आईपीओ अब बंद होने की कगार पर पहुंच गया है। पिछले कुछ दिनों से निवेशकों के बीच चर्चा का केंद्र बने इस मेगा इश्यू में निवेश करने के लिए अब केवल कुछ ही घंटे बचे हैं। जिन निवेशकों ने अब तक इस आईपीओ में दांव नहीं लगाया है, उन्हें बहुत ही कम समय में अपना अंतिम फैसला लेना होगा। इस आईपीओ का कुल साइज 22,561.57 करोड़ रुपये का है, जो भारतीय शेयर बाजार के इतिहास के सबसे बड़े इश्यू में से एक माना जा रहा है।
यह पूरा का पूरा इश्यू ऑफर फॉर सेल (OFS) के रूप में आया है। इसका सीधा मतलब यह है कि आईपीओ के जरिए जुटाए जाने वाले सारे पैसे सीधे तौर पर मौजूदा शेयरधारकों के पास जाएंगे, और कंपनी के पास विस्तार के लिए कोई नया फंड नहीं पहुंचेगा। हालांकि, कंपनी की वित्तीय स्थिति और बाजार में इसकी मजबूत पकड़ को देखते हुए निवेशकों में उत्साह तो है, लेकिन ओएफएस होने की वजह से कई लोग सतर्क रुख अपनाते हुए भी नजर आ रहे हैं।
एनएसई द्वारा निवेशकों के लिए प्राइस बैंड 1,700 रुपये से लेकर 1,785 रुपये प्रति शेयर के बीच तय किया गया है। खुदरा निवेशकों (Retail Investors) के लिहाज से बात करें तो एक लॉट में 8 शेयर रखे गए हैं, जिसके लिए कम से कम 14,280 रुपये का निवेश करना जरूरी है। कंपनी ने बाजार में उतरने से पहले ही एंकर निवेशकों के जरिए 6,746.18 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि पहले ही जुटा ली थी, जो इस बात का प्रमाण है कि बड़े संस्थान इस पर कितना भरोसा करते हैं।
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बाजार में कैसी रही निवेशकों की प्रतिक्रिया और सब्सक्रिप्शन का हाल
शेयर बाजार के जानकारों के अनुसार, आखिरी दिन दोपहर तक एनएसई का यह आईपीओ कुल मिलाकर लगभग 4 गुना से अधिक सब्सक्राइब हो चुका था। हालांकि, विभिन्न श्रेणियों में निवेशकों की प्रतिक्रिया अलग-अलग देखने को मिली है। क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल बायर्स (QIB) यानी बड़े संस्थागत निवेशकों ने इस आईपीओ में जबरदस्त दिलचस्पी दिखाई और उनका कोटा सबसे आगे रहा। वहीं, नॉन-इन्स्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (NII) का कोटा भी ठीक-ठाक भरा है, लेकिन खुदरा निवेशकों (Retail Category) की तरफ से शुरुआती दौर में वैसा भारी उत्साह नहीं दिखा, जैसा अमूल्य और दिग्गज कंपनियों के आईपीओ में अमूमन देखने को मिलता है।
वित्तीय विश्लेषकों का मानना है कि चूंकि यह इश्यू पूरी तरह से ऑफर फॉर सेल है, इसलिए कई सामान्य निवेशक इसमें आवेदन करने से बच रहे हैं। इसके अलावा, ग्रे मार्केट प्रीमियम (GMP) भी बहुत ज्यादा मजबूत नहीं है, जिसके कारण शॉर्ट-टर्म लिस्टिंग गेन यानी तुरंत बड़ा मुनाफा कमाने की उम्मीद रखने वाले निवेशक थोड़ा निराश दिख रहे हैं। बाजार जानकारों का कहना है कि जिन लोगों का मकसद केवल दो-चार दिनों में पैसा दोगुना करना है, उनके लिए शायद यह आईपीओ उस पैमाने पर खरा न उतरे।
"एनएसई भारत का वित्तीय इंजन है, और कैश मार्केट से लेकर डेरिवेटिव्स तक इसकी मोनोपोली जैसी स्थिति है। हालांकि ओएफएस होने से कंपनी को नया फंड नहीं मिलेगा, लेकिन इसकी मजबूत बैलेंस शीट और कंसिस्टेंट प्रॉफिटेबिलिटी इसे लॉन्ग-टर्म निवेशकों के लिए एक बेहतरीन विकल्प बनाती है।"— वरिष्ठ बाजार विश्लेषक
क्यों मजबूत स्थिति में है नेशनल स्टॉक एक्सचेंज?
एनएसई के बिजनेस मॉडल और मार्केट शेयर की बात करें तो यह देश का सबसे बड़ा और वैश्विक स्तर पर भी अपनी एक खास पहचान रखने वाला मल्टी-एसेट एक्सचेंज है। वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, भारतीय कैश मार्केट में एनएसई की हिस्सेदारी लगभग 99.79% है, जो इसे लगभग एकाधिकार वाली स्थिति में रखती है। इसके अलावा, इक्विटी ऑप्शंस के मोर्चे पर भी इसकी हिस्सेदारी 99.48% के आसपास बनी हुई है। इतनी बड़ी हिस्सेदारी का मतलब है कि भारतीय शेयर बाजार में होने वाले कुल कारोबार का लगभग पूरा हिस्सा इसी प्लेटफॉर्म के जरिए संचालित होता है।
कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन पर नजर डालें तो हालिया वित्त वर्ष में एनएसई ने अपनी मजबूत क्षमता का लोहा मनवाया है। इस दौरान कंपनी की कुल आय 18,713.37 करोड़ रुपये दर्ज की गई, जबकि टैक्स चुकाने के बाद शुद्ध लाभ (PAT) 10,302.06 करोड़ रुपये के शानदार आंकड़े को पार कर गया। इतना ही नहीं, चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भी कंपनी ने 3,120.08 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा अर्जित करके यह साबित कर दिया है कि उसका बिजनेस मॉडल लगातार और स्थिर रूप से मुनाफा कमाने में पूरी तरह सक्षम है।
बड़े निवेशकों और एलआईसी का भरोसा
आमतौर पर जब भी कोई कंपनी ऑफर फॉर सेल (OFS) के जरिए बाजार में आती है, तो शुरुआती और बड़े निवेशक भारी मुनाफावसूली करके अपनी पूरी हिस्सेदारी बेचकर बाहर निकलने की कोशिश करते हैं। लेकिन एनएसई के इस आईपीओ में एक बहुत ही दिलचस्प और सकारात्मक पहलू देखने को मिला है, जिसने बाजार का ध्यान अपनी ओर खींचा है। एनएसई की सबसे बड़ी संस्थागत शेयरधारक भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC), जिसके पास कंपनी की 10.72% हिस्सेदारी है, उसने इस आईपीओ में अपने एक भी शेयर की बिक्री नहीं की है। एलआईसी का इस तरह अपने शेयर होल्डिंग को बरकरार रखना निवेशकों के लिए एक बहुत बड़ा कॉन्फिडेंस बूस्टर है।
इसके अलावा, अन्य प्रमुख शेयरधारकों जैसे अरंडा इन्वेस्टमेंट्स, स्टेट बैंक कैपिटल्स और क्रिसकैपिटल (ChrysCapital) ने भी अपनी कुल हिस्सेदारी का एक बहुत ही छोटा हिस्सा यानी औसतन केवल 7% हिस्सा ही बेचने का निर्णय लिया है। दिग्गज निवेशकों का कंपनी में अपनी बड़ी हिस्सेदारी बनाए रखना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि वे भविष्य में एनएसई के विकास और ग्रोथ को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हैं।
अंतिम दिन निवेशकों को क्या करना चाहिए?
यदि आप एक ऐसे निवेशक हैं जो शेयर बाजार में रातों-रात अमीर बनने या लिस्टिंग के दिन ही 50-100% का बंपर मुनाफा कमाने की फिराक में हैं, तो यह आईपीओ शायद आपकी उम्मीदों पर पूरी तरह खरा न उतरे। कम ग्रे मार्केट प्रीमियम और इश्यू के ओएफएस होने की वजह से शॉर्ट-टर्म ट्रेडर्स को थोड़ी मायूसई हाथ लग सकती है। हालांकि, यदि आपका नजरिया लंबा है और आप अपने पोर्टफोलियो में एक मजबूत, बाजार पर राज करने वाली और वित्तीय रूप से बेहद सुरक्षित कंपनी को जगह देना चाहते हैं, तो यह स्टॉक आपके लिए एक बेहतरीन कोर होल्डिंग साबित हो सकता है।
भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था, डिजिटल ट्रांजैक्शन में तेजी और वित्तीय बाजारों में लगातार बढ़ रही खुदरा निवेशकों की भागीदारी का सबसे बड़ा फायदा सीधे तौर पर एनएसई को मिलने वाला है। देश के वित्तीय ढांचे की रीढ़ बन चुके इस एक्सचेंज में लंबी अवधि के लिए निवेश करना समझदारी भरा कदम हो सकता है। फिर भी, किसी भी प्रकार के वित्तीय निर्णय लेने से पहले अपने सर्टिफाइड वित्तीय सलाहकार से चर्चा अवश्य करें और अपने जोखिम उठाने की क्षमता का आकलन जरूर कर लें।






