नई दिल्ली से हमारे राजनीतिक डेस्क की ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार इस महीने संसद का एक विशेष सत्र बुलाने पर गंभीरता से विचार कर रही है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा बहुत तेज हो गई है कि इस संभावित विशेष सत्र में देश की नई लोकसभा सीटों की संख्या और परिसीमन से जुड़े बिल को सदन में पेश किया जा सकता है। सरकार की कोशिश है कि साल 2029 के आम चुनावों से पहले इन सभी बड़े बदलावों को कानूनी रूप से जमीन पर उतार दिया जाए, ताकि आगे किसी प्रकार की प्रशासनिक देरी न हो।
सूत्रों से मिल रही जानकारी के मुताबिक, इस बड़े विधायी कदम के लिए सत्ता पक्ष ने अपनी तैयारियां पूरी कर ली हैं। हाल ही में मानसून सत्र से ठीक पहले बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में भी विभिन्न दलों के साथ कई अहम मुद्दों पर चर्चा की गई थी, जिसमें करीब चालीस पार्टियों ने हिस्सा लिया था। अब सरकार का पूरा ध्यान एक छोटे और बेहद खास विशेष सत्र के जरिए उन प्रस्तावों को आगे बढ़ाने पर है, जिनका इंतजार लंबे समय से किया जा रहा था। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस बार महिला आरक्षण और परिसीमन के गणित को साधने के लिए पचास प्रतिशत तक के बदलावों की योजना बनाई गई है।
परिसीमन और लोकसभा सीटों का नया गणित
भारत में नई लोकसभा सीटों के गठन और राज्यों के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है। अगर सरकार इस महीने विशेष सत्र बुलाकर बिल लाती है, तो इसका सीधा असर देश के चुनावी नक्शे पर पड़ेगा। दक्षिणी राज्यों और उत्तर भारत के राज्यों के बीच सीटों के संतुलन को लेकर राजनीतिक दलों में अलग-अलग राय देखने को मिल रही है। यही वजह है कि भारतीय जनता पार्टी अभी से ही क्षेत्रीय और छोटे दलों के साथ संवाद स्थापित करने में जुट गई है।
खास तौर पर तमिलनाडु की प्रमुख पार्टी डीएमके और अन्य क्षेत्रीय दलों को विश्वास में लेने के लिए पर्दे के पीछे लगातार बैठकें हो रही हैं। दक्षिण भारत के राज्यों की यह आशंका है कि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर काम करने के कारण उनकी लोकसभा सीटें कम न हो जाएं। सरकार इन सभी चिंताओं को दूर करते हुए एक ऐसा सर्वमान्य फॉर्मूला तैयार करना चाहती है जिससे किसी भी राज्य को राजनीतिक नुकसान न उठाना पड़े और देश का अगला आम चुनाव नए परिसीमन के आधार पर ही संपन्न हो सके।
साल 2029 के चुनावों से पहले क्यों जरूरी है यह कदम?
नियमों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के जानकारों का कहना है कि यदि परिसीमन की इस प्रक्रिया में और अधिक देरी हुई, तो साल 2029 के निर्धारित समय पर नए नियमों को लागू करना लगभग असंभव हो जाएगा। परिसीमन आयोग के गठन, बैठकों और राज्यों की आपत्तियों को सुनने में महीनों का वक्त लगता है। इसलिए सरकार कोई भी जोखिम मोल न लेते हुए इसी महीने संसद का विशेष सत्र बुलाकर इस प्रक्रिया को औपचारिक रूप से आगे बढ़ाना चाहती है ताकि तय समयसीमा के भीतर सभी काम पूरे किए जा सकें।
संसद के इस संभावित विशेष सत्र के दौरान देश के गृह मंत्री और अन्य वरिष्ठ नेता कुछ अन्य महत्वपूर्ण विधायी कार्य भी सदन के पटल पर रख सकते हैं। हालांकि मुख्य फोकस महिला आरक्षण के अगले चरणों और परिसीमन बिल पर ही रहने की उम्मीद है। आम जनता और राजनीतिक विश्लेषकों की निगाहें अब पूरी तरह से केंद्रीय मंत्रिमंडल की अगली बैठक और आधिकारिक घोषणा पर टिकी हुई हैं कि सत्र की तारीखें क्या तय होती हैं।
द फ्रीलान्स की अंतिम ग्राउंड पड़ताल और राजनीतिक नब्ज
हमारी फील्ड टीम ने जब संसद भवन के आसपास और विभिन्न राजनीतिक दलों के कार्यालयों से बात की, तो यह साफ हुआ कि क्षेत्रीय दलों को साधना इस बिल की सफलता की सबसे बड़ी कुंजी है। राजनीतिक मोर्चे पर विरोध और समर्थन का दौर शुरू हो चुका है, लेकिन सरकार के आक्रामक रुख को देखकर यह तय माना जा रहा है कि इस बार संसद में जोरदार बहस देखने को मिलेगी। द फ्रीलान्स इस पूरे घटनाक्रम पर अपनी पैनी नजर बनाए रखेगा और सत्र की हर एक अंदरूनी खबर आप तक सबसे पहले पहुंचाएगा।











