राज्यभर में नगरीय निकाय चुनावों की समाप्ति के बाद बड़ा प्रशासनिक फैसला
राजस्थान की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों से एक बेहद अहम और राहत भरी खबर सामने आई है। प्रदेश में नगरीय निकाय चुनावों की पूरी प्रक्रिया सफलतापूर्वक संपन्न हो जाने के बाद राज्य निर्वाचन आयोग ने बड़ा कदम उठाया है। आयोग ने पूरे राज्य में प्रभावी रही आदर्श आचार संहिता को तत्काल प्रभाव से समाप्त करने की औपचारिक घोषणा कर दी है। इस संबंध में राज्य निर्वाचन आयोग के मुख्य निर्वाचन अधिकारी एवं सचिव की ओर से मुख्य सचिव को आधिकारिक पत्र भेजकर स्थिति स्पष्ट कर दी गई है।
बता दें कि इन चुनावों के दौरान कई चरणों में मतदान और मतगणना की प्रक्रिया पूरी की गई। शुरुआती दौर में कुछ चुनिंदा बड़े नगर निगमों और नगर पालिकाओं को छोड़कर शेष 304 नगरीय निकायों में चुनाव संपन्न होने के बाद ही आचार संहिता हटा ली गई थी। हालांकि, बाकी बचे हुए इलाकों में प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार किया जा रहा था। अब जब उन शेष निकायों में भी चुनावी प्रक्रिया का अंतिम चरण पूरा हो चुका है, तो पूरे प्रदेश से आदर्श आचार संहिता का साया पूरी तरह से हट चुका है।
इस फैसले के बाद अब राज्य सरकार, विभिन्न प्रशासनिक विभागों और स्थानीय निकायों के लिए सामान्य कामकाज, नीतिगत निर्णय लेने और रुके हुए विकास कार्यों को दोबारा पटरी पर लाने का रास्ता साफ हो गया है। जानकारों का मानना है कि आचार संहिता हटने से जनता से जुड़े अटके हुए पेंडिंग काम अब तेजी से पूरे हो सकेंगे।
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कर्मचारियों और अधिकारियों के ट्रांसफर पर लगी पाबंदी हुई शिथिल
आदर्श आचार संहिता हटने का सबसे बड़ा फायदा प्रशासनिक अमले और सरकारी कर्मचारियों को मिला है। चुनाव आयोग के निर्देशों के अनुसार, जब तक पंचायतीराज संस्थाओं के आगामी आम चुनाव पूरी तरह से संपन्न नहीं हो जाते, तब तक अधिकारियों और कर्मचारियों के कार्यमुक्त होने और नया कार्यग्रहण करने पर कड़ा प्रतिबंध लगाया गया था। इस नियम के चलते कई ऐसे अधिकारी और कर्मचारी असमंजस की स्थिति में थे जिनके तबादले चुनाव से पहले या उसके दौरान किए गए थे।
लेकिन अब राज्य निर्वाचन आयोग ने पंचायतीराज संस्थाओं के आगामी चुनावों की घोषणा से पहले इस व्यवस्था में बड़ी राहत और शिथिलता प्रदान की है। इसका सीधा मतलब यह है कि जिन भी अधिकारियों या कर्मचारियों के तबादले पूर्व में हो चुके थे और वे आचार संहिता के कारण अपने नए कार्यस्थल पर ज्वॉइन नहीं कर पा रहे थे, वे अब बिना किसी रुकावट के अपने नए स्थानों पर जाकर कार्यभार संभाल सकते हैं। इस निर्देश से प्रशासनिक महकमे में लंबे समय से अटकी पड़ी नियुक्तियों और पदस्थापनाओं की उलझनें दूर हो गई हैं।
"नगरीय निकायों में निर्वाचन प्रक्रिया पूरी होने के बाद लागू आचार संहिता को तत्काल प्रभाव से हटा लिया गया है। इसके साथ ही प्रशासनिक कामकाज और कर्मचारियों के तबादले संबंधी मामलों में नियमों के तहत आवश्यक छूट प्रदान कर दी गई है ताकि सरकारी कार्यों में कोई बाधा न आए।" — राज्य निर्वाचन आयोग, राजस्थान सरकार
विकास कार्यों और नीतिगत फैसलों को मिलेगी नई गति
किसी भी राज्य में आचार संहिता लागू होना यानी प्रशासनिक और विकास गतिविधियों पर एक प्रकार का अस्थायी विराम लगना होता है। नए बजट आवंटन, नई योजनाओं की शुरुआत और पुराने प्रोजेक्ट्स के टेंडर जैसी तमाम महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं आचार संहिता के दायरे में आने के कारण ठप पड़ जाती हैं। राजस्थान में भी पिछले कुछ हफ्तों से यही स्थिति बनी हुई थी।
अब जबकि नगरीय चुनावों का अध्याय पूरी तरह समाप्त हो चुका है, स्थानीय स्तर पर विकास कार्यों को गति देने के लिए जनप्रतिनिधि और अधिकारी सीधे तौर पर मैदान में उतर सकेंगे। सड़क निर्माण, पेयजल योजनाएं, सफाई व्यवस्था और रोशनी जैसी बुनियादी नागरिक सुविधाओं से जुड़े प्रस्तावों को अब त्वरित प्रशासनिक और वित्तीय स्वीकृतियां मिल सकेंगी। शहरी इलाकों के विकास में जो ठहराव आ गया था, वह अब दूर होता नजर आ रहा है।
अब राजनीतिक दलों और प्रशासन की निगाहें पंचायतीराज चुनावों पर
नगरीय निकाय चुनावों का यह दौर खत्म होने के साथ ही राजस्थान का राजनीतिक तापमान एक बार फिर बढ़ने लगा है। अब सभी दलों और प्रशासनिक तंत्र का पूरा ध्यान आगामी पंचायतीराज संस्थाओं के चुनावों पर केंद्रित हो गया है। ग्रामीण इलाकों में जिला परिषद, पंचायत समिति और ग्राम पंचायत स्तर के चुनावों को लेकर तैयारियां अंदरखाने पहले से ही चल रही थीं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शहरी क्षेत्रों के चुनाव निपटने के बाद सरकार जल्द ही ग्रामीण क्षेत्रों के लिए चुनावी बिगुल फूंक सकती है। अक्टूबर के पहले सप्ताह में ही पंचायतीराज चुनावों की आधिकारिक घोषणा होने की प्रबल संभावना जताई जा रही है। यही वजह है कि राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं से लेकर प्रशासनिक अमले तक ने अपनी कमर कस ली है और बैठकों का दौर शुरू हो चुका है।
निष्कर्ष और आगे की स्थिति
कुल मिलाकर देखा जाए तो राजस्थान में निकाय चुनावों की आचार संहिता का हटना आम नागरिकों, सरकारी कर्मचारियों और शासन व्यवस्था तीनों के लिए एक बड़ी राहत लेकर आया है। जहां एक तरफ अटके हुए तबादलों और प्रशासनिक कार्यों के रास्ते खुल गए हैं, वहीं दूसरी तरफ ग्रामीण इलाकों में लोकतंत्र के अगले महापर्व यानी पंचायत चुनावों की सरगर्मी तेज हो गई है। आने वाले दिनों में प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर चुनावई माहौल पूरी तरह से हावी रहने की उम्मीद है।




