सिनेमा की दुनिया में चमकती चकाचौंध और बड़े महानगरों की दौड़भाग के बीच अक्सर यह मान लिया जाता है कि बेहतरीन कहानियां केवल हाई-फाई स्टूडियो या बड़े बजट के बीच ही तैयार हो सकती हैं। लेकिन झारखंड की हरी-भरी वादियों और एक साधारण ग्रामीण परिवेश से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी धाक जमाने वाले युवा फिल्ममेकर रवि राज मुर्मू ने इस मिथक को पूरी तरह तोड़ दिया है। अपनी कला, मेहनत और जड़ों से जुड़े रहने के जज्बे के बल पर उन्होंने यह साबित कर दिया है कि सच्ची कहानियां किसी तामझाम की मोहताज नहीं होतीं, बल्कि वे हमारे आसपास के जीवन और लोककथाओं में गहराई से रची-बसी होती हैं।
गांव की मिट्टी से पुणे के FTII तक का कठिन और प्रेरणादायक सफर
रवि राज मुर्मू का यह सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। उनकी शुरुआती पढ़ाई-लिखाई पूर्वी सिंहभूम के एक छोटे से गांव कुमीरमुड़ी के साधारण स्कूल से हुई। बचपन से ही उनके मन में फिल्मों को लेकर एक अजीब सी जिज्ञासा थी। वे सिर्फ मनोरंजन के लिए फिल्में नहीं देखते थे, बल्कि उनके भीतर यह जानने की तीव्र इच्छा होती थी कि आखिर पर्दे के पीछे यह जादू कैसे रचा जाता है। यही जिज्ञासा उन्हें आगे की पढ़ाई के लिए जमशेदपुर के करीम सिटी कॉलेज ले आई, जहां उन्होंने मास कम्युनिकेशन की विधा को चुना।
मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई के दौरान रवि राज का यह जुनून और अधिक गहरा होता चला गया। उन्हें यह समझ आ गया कि अगर इस क्षेत्र में कुछ मौलिक करना है, तो सिनेमा की तकनीकी बारीकियों को गहराई से सीखना होगा। इसी सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने देश के सबसे प्रतिष्ठित फिल्म संस्थानों में शुमार पुणे स्थित 'फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया' (FTII) की कठिन प्रवेश परीक्षा पास की। साल 2016 से 2019 के बीच उन्होंने वहां रहकर फिल्म एडिटिंग की विधिवत शिक्षा ली, जिसने उनके विजन को एक नया और पेशेवर आयाम दिया।
संबंधित खबरें
बचपन की लोककथाओं और संताली संस्कृति से उपजी लघु फिल्म 'आंगेन'
संस्थान से पढ़ाई पूरी करने के बाद रवि राज ने मुंबई का रुख किया, जहां उन्होंने कई डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के प्रोजेक्ट्स के साथ काम किया और फिल्म एडिटिंग की दुनिया में अपने हाथ आजमाए। बड़े शहरों की चकाचौंध में काम करते हुए भी उनकी आत्मीयता हमेशा अपनी जड़ों और मातृभाषा के साथ बनी रही। बचपन में अपने गांव के बुजुर्गों के मुख से सुनी हुई आदिवासी लोककथाएं और वहां की संस्कृति उनके अवचेतन मन में गहराई से बैठी हुई थीं। यही कहानियां आखिरकार उनके भीतर के रचनाकार को झकझोरने लगीं।
इसी जुड़ाव का परिणाम थी उनकी संताली लघु फिल्म ‘आंगेन’। इस फिल्म को बनाते समय संसाधनों की भारी कमी थी, लेकिन रवि राज के पास एक मजबूत दृष्टिकोण और अपनी संस्कृति को पर्दे पर जीवंत करने का अटूट संकल्प था। फिल्म की हर एक फ्रेम में झारखंड की मिट्टी की सोंधी खुशबू और वहां के जनजीवन का सच्चा अहसास झलकता है। स्थानीय परिवेश और संताली संस्कृति को कलात्मक तरीके से दुनिया के सामने लाने के उनके इस अनूठे प्रयास ने धीरे-धीरे लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचना शुरू कर दिया।
"रवि राज मुर्मू को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिलना न सिर्फ उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि यह हमारे कॉलेज और जन संचार विभाग के लिए भी अत्यंत गौरव का क्षण है। यह सम्मान हमारे अन्य विद्यार्थियों को बड़े सपने देखने और अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा देगा।"— नेहा तिवारी, एचओडी, जन संचार विभाग, करीम सिटी कॉलेज
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार: संताली भाषा और संस्कृति के लिए ऐतिहासिक मील का पत्थर
रवि राज की इस कड़ी मेहनत और कला साधना को आखिरकार साल 2026 में वह मुकाम मिला, जिसकी हकदार उनकी फिल्म थी। उन्हें प्रतिष्ठित 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ नवोदित निर्देशक के सम्मान से नवाजा गया। जब एक साधारण ग्रामीण पृष्ठभूमि से निकला युवा देश के सबसे बड़े मंच पर सम्मानित हुआ, तो यह सिर्फ रविराज की व्यक्तिगत जीत नहीं थी, बल्कि यह पूरे संताली समुदाय और क्षेत्रीय सिनेमा के लिए एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित हुई।
इस सफलता ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि सिनेमा में सफलता पाने के लिए यह कतई जरूरी नहीं है कि आपकी शुरुआत किसी महानगर से हो। सबसे मजबूत और सच्ची कहानियों की जमीन वही होती है, जहां आपका बचपन बीता हो, जहां की आबोहवा में आप बड़े हुए हों और जहां बुजुर्गों के किस्से आज भी हवाओं में तैरते हैं। रवि राज की यह कहानी आज के दौर के उन तमाम युवाओं के लिए एक मशाल है जो संसाधनों के अभाव के बावजूद अपने सपनों को सच करना चाहते हैं।
शैक्षणिक संस्थानों और स्थानीय संस्कृति के लिए गर्व का विषय
रवि राज की इस शानदार उपलब्धि से उनके पूर्व अध्ययन संस्थान करीम सिटी कॉलेज में भी जश्न का माहौल है। कॉलेज के शिक्षकों और विद्यार्थियों का मानना है कि रवि राज की यह सफलता आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाएगी कि वे अपनी क्षेत्रीय भाषाओं और संस्कृति को कमतर न आंकें। आज के दौर में जब पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है, ऐसे समय में अपनी स्थानीय बोलियों और लोककथाओं को वैश्विक मंच तक पहुंचाना बहुत बड़ी बात है।
यह सफलता इस बात का भी प्रमाण है कि यदि सही मार्गदर्शन और लगन मिल जाए, तो झारखंड जैसे राज्यों के युवा भी अपनी प्रतिभा के दम पर दुनिया के नक्शे पर अपनी एक अलग पहचान बना सकते हैं। रवि राज मुर्मू का यह सफर यहीं नहीं रुकता है, बल्कि यह तो उनकी कलात्मक यात्रा की सिर्फ एक शानदार शुरुआत है। आने वाले समय में उनसे और भी कई ऐसी बेहतरीन कहानियों की उम्मीद की जा रही है जो हमारी संस्कृति को और अधिक समृद्ध करेंगी।



