दशकों के राजनीतिक सफर के बीच पारिवारिक गलियारों में लौटा सुकून
बिहार की सियासत में हमेशा चर्चा का केंद्र रहने वाले लालू परिवार में आखिरकार रिश्तों की जमी बर्फ पिघलती नजर आ रही है। राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव की पुत्री रोहिणी आचार्य लंबी खामोशी और दूरियों को दरकिनार करते हुए गुरुवार को सीधे सिंगापुर से पटना की सरजमीं पर उतर चुकी हैं। उनके आगमन की खबर मिलते ही समर्थकों में हलचल तेज हो गई, लेकिन सबसे खास बात यह रही कि हवाई अड्डे पर खुद लालू परिवार के मुखिया अपनी लाडली बेटी का इस्तकबाल करने के लिए मौजूद थे।
बीते साल नवंबर महीने में हुए बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद उपजे पारिवारिक गतिरोध के बाद से ही रोहिणी आचार्य अपने मायके से दूर सिंगापुर में रह रही थीं। उस वक्त अचानक हुए घटनाक्रम ने राजनीतिक गलियारों में भूचाल ला दिया था, जिसके बाद से उन्होंने परिवार से एक निश्चित दूरी बना ली थी। हालांकि, वक्त के साथ रिश्तों की दूरियां कम होती दिखीं और खुद पिता के बुलावे पर उन्होंने एक बेटी का फर्ज निभाने के लिए पटना लौटने का फैसला किया।
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एयरपोर्ट पर उमड़ी भीड़ और आंखों में आए आंसुओं का सैलाब
पटना एयरपोर्ट के भीतर का नजारा बेहद भावुक और मार्मिक था। जब रोहिणी आचार्य बाहर आईं तो वहां मौजूद उनके माता-पिता और बड़ी बहन को देखकर वह अपने जज्बातों पर काबू नहीं रख पाईं। कार में बैठे अपने पिता लालू प्रसाद यादव के पास पहुंचते ही उन्होंने सबसे पहले उनके चरण स्पर्श किए और फफककर रो पड़ीं। इसके बाद उन्होंने पिछली सीट पर बैठी अपनी मां राबड़ी देवी को गले लगाया।
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान लालू यादव भी अपनी भावनाओं को छिपा नहीं सके और रुमाल से अपनी आंखें साफ करते नजर आए। बड़ी बहन मीसा भारती भी इस दौरान काफी भावुक दिखाई दीं। परिवार के सदस्यों का यह मिलन इस बात की गवाही दे रहा था कि भले ही सियासी मैदान में लड़ाइयां बड़ी हों, लेकिन अपनों का खून और स्नेह हमेशा हर कड़वाहट पर भारी पड़ता है।
"मेरे लिए मेरे पापा, उनकी खुशी और उनके आशीर्वाद से बढ़कर कुछ भी नहीं है। उनके बुलावे से बढ़कर कोई आदेश नहीं है, इसलिए एक बेटी होने का फर्ज निभाने के लिए अपने पापा के पास आ रही हूं।" — रोहिणी आचार्य, राजद सुप्रीमो लालू यादव की पुत्री
राजनीतिक रंग से इनकार, रोहिणी ने बताई विशुद्ध निजी यात्रा
हवाई अड्डे पर पत्रकारों से संक्षिप्त बातचीत करते हुए रोहिणी आचार्य ने साफ शब्दों में स्पष्ट किया कि उनकी इस वापसी को किसी भी राजनीतिक चश्मे से न देखा जाए। उन्होंने दो टूक कहा कि यह उनका पूरी तरह से निजी पारिवारिक दौरा है और वह सिर्फ अपने बुजुर्ग माता-पिता से मिलने आई हैं। उन्होंने कहा कि पिता के बुलावे पर आना हर संतान का कर्तव्य होता है, और वह इसी पारिवारिक भावना के तहत पटना आई हैं।
हालांकि, जब मीडियाकर्मियों ने उनके भाई और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के साथ चल रहे पुराने मतभेदों और नाराजगी को लेकर सवाल दागे, तो रोहिणी ने इस पर कोई भी प्रतिक्रिया देने से परहेज किया। उन्होंने इस मुद्दे पर चुप्पी साधते हुए केवल अपने माता-पिता के साथ समय बिताने की इच्छा जताई।
विधानसभा चुनाव 2025 के बाद पैदा हुई थीं दूरियां
याद दिला दें कि पिछले साल नवंबर 2025 में जब बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम आरजेडी की उम्मीदों के मुताबिक नहीं आए थे, तब पार्टी और परिवार के भीतर भारी कलह सामने आई थी। चुनाव परिणामों के ठीक बाद रोहिणी आचार्य अचानक 10 सर्कुलर रोड स्थित राबड़ी आवास से सीधे एयरपोर्ट के लिए रवाना हो गईं थीं। उस दौरान उन्होंने कैमरों के सामने अपने भाई तेजस्वी यादव और उनके कुछ सहयोगियों पर बदसलूकी के गंभीर आरोप लगाए थे और राजनीति से संन्यास लेने का ऐलान कर दिया था।
उस घटना के बाद से रोहिणी ने लगातार मायके से दूरी बनाए रखी थी। यहां तक कि इस साल मई महीने में गाजियाबाद में हुए तेजस्वी यादव के बेटे के पहले जन्मदिन समारोह और रक्षाबंधन जैसे बड़े पारिवारिक पर्वों पर भी वह दिल्ली नहीं पहुंची थीं। ऐसे में उनका अचानक पटना लौटना लालू परिवार के भीतर एक नए और सकारात्मक बदलाव का संकेत माना जा रहा है।
लालू परिवार के लिए राहत की सांस और आगे की उम्मीदें
रोहिणी आचार्य की इस घर वापसी ने राजनीतिक विश्लेषकों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। जहां एक तरफ विपक्षी दल इस पारिवारिक मेल-मिलाप पर अपनी नजरें गड़ाए हुए हैं, वहीं आरजेडी समर्थकों और लालू परिवार के करीबी लोगों के बीच इस बात की खुशी है कि परिवार के तमाम बिखरे तार फिर से जुड़ने की राह पर हैं।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि रोहिणी के इस पटना प्रवास के दौरान क्या परिवार के बाकी सदस्यों के साथ भी बर्फ पूरी तरह पिघल पाती है या नहीं। फिलहाल, लालू-राबड़ी के आंगन में बेटी के लौटने से जो रौनक और खुशी लौटी है, उसने एक बार फिर साबित कर दिया है कि पारिवारिक रिश्तों की डोर कितनी भी कमजोर लगे, लेकिन प्रेम और अपनापन उसे हमेशा जोड़े रखता है।








