भारतीय शेयर बाजार में इन दिनों पैसों की ऐसी बरसात हो रही है जिसने पिछले तीन दशकों के सभी पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं। हाल ही में समाप्त हुआ सितंबर का महीना भारतीय प्राइमरी मार्केट यानी आईपीओ (IPO) के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय की तरह दर्ज हो गया है। शेयर बाजार के आंकड़ों पर नजर डालें तो इस एक महीने के भीतर निवेशकों का उत्साह सातवें आसमान पर रहा और कंपनियों ने रिकॉर्डतोड़ पूंजी जुटाई है। आर्थिक मोर्चे पर दुनिया भर में भले ही सुस्ती या अनिश्चितता की चर्चाएं चल रही हों, लेकिन भारत का शेयर बाजार और यहां का निवेश तंत्र पूरी तरह से बेपरवाह और मजबूत नजर आ रहा है।
सितंबर में आईपीओ बाजार का ऐतिहासिक धमाका और आंकड़े
सितंबर महीने के दौरान भारतीय शेयर बाजार में मेनबोर्ड श्रेणी के कुल 30 आईपीओ लॉन्च किए गए। इन सभी आईपीओ को निवेशकों की तरफ से बंपर प्रतिक्रिया मिली। कंपनियों ने इन 30 पब्लिक इश्यू के जरिए कुल 38,785 करोड़ रुपये की विशाल धनराशि जुटाई है। यह आंकड़ा केवल एक महीने के लिहाज से पिछले 30 सालों में सबसे अधिक है। बाजार के जानकारों का कहना है कि इतने कम समय में इतनी बड़ी संख्या में कंपनियों का उतरना और निवेशकों द्वारा खुले दिल से पैसा लगाना इस बात का सबूत है कि भारतीय पूंजी बाजार की नींव बेहद मजबूत हो चुकी है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर भले ही आर्थिक अस्थिरता का माहौल रहा हो, लेकिन घरेलू निवेशकों की ताकत ने भारतीय बाजार को संभाले रखा है। म्यूचुअल फंड्स में लगातार आ रहे एसआईपी (SIP) के पैसों और खुदरा निवेशकों की बढ़ती जागरूकता ने इन आईपीओ को कामयाब बनाने में सबसे अहम भूमिका निभाई है। यही वजह है कि बड़ी से बड़ी कंपनियों को अपने आईपीओ लाने के लिए सितंबर का महीना सबसे मुफीद लगा और उन्हें उम्मीद से कहीं ज्यादा गुना सब्सक्रिप्शन हासिल हुआ।
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क्यों सहमा हुआ है दुनिया भर का पैसा और भारत में क्यों है बहार?
एक तरफ जहां दुनिया के कई विकसित देशों के शेयर बाजारों में सुस्ती छाई हुई है और निवेशक अपने पैसे को सुरक्षित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहीं भारत इसके ठीक विपरीत एक सुरक्षित और आकर्षक ठिकाना बनकर उभरा है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव और कई देशों में मंदी की आशंकाओं के चलते 'दुनिया भर में पैसा घबराया हुआ है'। इसके बावजूद भारत की मजबूत जीडीपी ग्रोथ, स्थिर राजनीतिक माहौल और कॉरपोरेट जगत के शानदार प्रदर्शन ने ग्लोबल और घरेलू निवेशकों दोनों का भरोसा जीता है।
आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि भारत में खुदरा निवेशकों की भागीदारी तेजी से बढ़ रही है। डीमैट खातों की संख्या रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुकी है। जब भी कोई अच्छी कंपनी अपना आईपीओ लेकर आती है, तो उसे सब्सक्राइब करने के लिए निवेशकों की लंबी कतार लग जाती है। यही कारण है कि सितंबर के महीने में बाजार में लिक्विडिटी की कोई कमी नहीं खली और कंपनियों को अपनी विस्तार योजनाओं के लिए आसानी से मनचाहा फंड मिल गया।
"भारतीय प्राइमरी मार्केट में जो अभूतपूर्व तेजी इस बार देखने को मिली है, वह देश की मजबूत अर्थव्यवस्था और घरेलू निवेशकों के बढ़ते आत्मविश्वास का प्रत्यक्ष परिणाम है। वैश्विक उथल-पुथल के बीच भी भारत में資本 की कमी नहीं है।" — बाजार विश्लेषक, द फ्रीलांस बिजनेस डेस्क
किन सेक्टरों के आईपीओ ने खींचा सबसे ज्यादा निवेशकों का ध्यान?
सितंबर के महीने में जिन 30 मेनबोर्ड आईपीओ ने बाजार में हलचल मचाई, उनमें मैन्युफैक्चरिंग, टेक्नोलॉजी, इंफ्रास्ट्रक्चर, स्पेशियलिटी केमिकल्स और फाइनेंशियल सर्विसेज से जुड़ी कंपनियां प्रमुख थीं। निवेशकों ने सिर्फ बड़ी कंपनियों पर ही दांव नहीं लगाया, बल्कि मिड-कैप और स्मॉल-कैप सेगमेंट के आईपीओ को भी हाथों-हाथ लिया। कई कंपनियों के शेयरों ने तो बाजार में लिस्टिंग के पहले ही दिन निवेशकों का पैसा दोगुना या उससे अधिक कर दिया, जिससे बाजार में और अधिक उत्साह फैल गया।
विश्लेषकों का यह भी मानना है कि इस तरह के रिकॉर्डतोड़ इश्यू आने से न सिर्फ कंपनियों को अपने कारोबार को बढ़ाने के लिए पूंजी मिलती है, बल्कि देश में रोजगार के नए अवसर भी पैदा होते हैं। जब कंपनियां शेयर बाजार के जरिए पैसा जुटाकर नई फैक्ट्रियां लगाती हैं या अपने बिजनेस का विस्तार करती हैं, तो इसका सीधा फायदा देश की अर्थव्यवस्था को मिलता है।
आगे कैसा रहेगा प्राइमरी मार्केट का रुख और निवेशकों के लिए सीख
सितंबर के इस ऐतिहासिक रिकॉर्ड के बाद अब निवेशकों और बाजार के दिग्गजों की नजरें आगे के महीनों पर टिकी हैं। क्या आने वाले त्योहारी सीजन में भी यह रफ्तार बरकरार रहेगी? विशेषज्ञों का मानना है कि अगर वैश्विक परिस्थितियां बहुत ज्यादा नहीं बिगड़ीं, तो अक्टूबर और नवंबर के महीनों में भी कई बड़े आईपीओ कतार में हैं। हालांकि, जानकारों की यह भी सलाह है कि निवेशकों को किसी भी आईपीओ में पैसा लगाने से पहले कंपनी के फंडामेंटल, वैल्यूएशन और प्रमोटर्स की साख की अच्छी तरह से जांच-परख जरूर कर लेनी चाहिए, ताकि वे किसी भी संभावित जोखिम से बच सकें।
कुल मिलाकर, सितंबर का महीना भारतीय शेयर बाजार के लिए मील का पत्थर साबित हुआ है। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारतीय पूंजी बाजार अब आत्मनिर्भर हो चुका है और वैश्विक झटकों को झेलते हुए भी अपने दम पर नए रिकॉर्ड बनाने की क्षमता रखता है।






