सप्ताह के पहले कारोबारी दिन भारतीय शेयर बाजार में हाहाकार
भारतीय शेयर बाजार के निवेशकों के लिए सप्ताह की शुरुआत बेहद निराशाजनक और चिंताजनक रही। सोमवार को बाजार खुलते ही बिकवाली का ऐसा दबाव बना कि देखते ही देखते निवेशकों के अरमानों पर पानी फेर गया। शुरुआती घंटों में ही बाजार के दोनों प्रमुख सूचकांक धड़ाम हो गए, जिससे निवेशकों की संपत्ति का बड़ा हिस्सा चंद मिनटों में स्वाहा हो गया। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि वैश्विक मोर्चे पर मची उथल-पुथल का सीधा असर घरेलू बाजार पर देखने को मिल रहा है।
कारोबार के आखिर में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का संवेदी सूचकांक सेंसेक्स 1,124.02 अंकों की भारी गिरावट के साथ 72,771.72 के स्तर पर बंद हुआ। वहीं दूसरी ओर, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी 360.25 अंकों का गोता लगाकर 22,780.25 के स्तर पर आ गया। इस जोरदार गिरावट की वजह से निवेशकों को एक झटके में लगभग 8 लाख करोड़ रुपये का फौरी नुकसान उठाना पड़ा है। बाजार में इस समय डर का माहौल है और छोटे निवेशकों से लेकर बड़े फंड हाउस तक फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं।
जानकारों का कहना है कि घरेलू बाजार में यह गिरावट अचानक नहीं आई है, बल्कि इसके पीछे कई अंतरराष्ट्रीय और घरेलू आर्थिक कारक जिम्मेदार हैं। पिछले कुछ हफ्तों से ग्लोबल मार्केट्स में जो उठापटक चल रही थी, उसका असर अब भारतीय शेयर बाजार पर पूरी तरह से हावी होता दिख रहा है। आइए उन पांच प्रमुख कारणों को विस्तार से समझते हैं जिनके कारण निवेशकों को यह भारी नुकसान झेलना पड़ा है।
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ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का संकट
शेयर बाजार में इस भारी भूचाल के पीछे सबसे बड़ा और मुख्य कारण मिडिल ईस्ट में भड़का नया भू-राजनीतिक तनाव है। अमेरिका और ईरान के बीच रिश्तों में आई कड़वाहट और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर अनिश्चितता ने वैश्विक निवेशकों की नींद उड़ा दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान पर नए सैन्य हमलों की संभावना को खुला रखने वाले बयानों ने आग में घी का काम किया है। ट्रंप ने ईरान की तरफ से आए सात दिन के सीजफायर और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को दोबारा खोलने के प्रस्ताव को भी सिरे से खारिज कर दिया है।
इस पूरे घटनाक्रम की वजह से खाड़ी देशों में एक लंबे और भयानक संघर्ष की आशंका गहरा गई है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे संवेदनशील तेल मार्गों में से एक है, और यहां किसी भी तरह की रुकावट का सीधा असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ता है। दुनिया भर के शेयर बाजारों की तरह भारतीय बाजार के निवेशक भी इस बात से सहमे हुए हैं कि यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसका बेहद बुरा असर पड़ेगा।
"मध्य पूर्व में जारी तनाव और कच्चे तेल के मोर्चे पर बढ़ती अनिश्चितता ने वैश्विक वित्तीय बाजारों को अस्थिर कर दिया है। जब तक भू-राजनीतिक स्थिति साफ नहीं होती, निवेशकों का सतर्क रहना स्वाभाविक है।" — बाजार विशेषज्ञ
कच्चे तेल की कीमतों में बेकाबू उछाल और भारत पर दबाव
ईरान-अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव और युद्ध जैसे हालातों का सीधा असर कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर पड़ा है। तेल की सप्लाई प्रभावित होने की आशंका के चलते ब्रेंट क्रूड की कीमतें करीब 2 फीसदी उछलकर 107 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गईं, जबकि डब्ल्यूटीआई क्रूड भी 94 डॉलर प्रति बैरल के इर्द-गिर्द कारोबार करता दिखा। भारत जैसे विशाल अर्थव्यवस्था वाले देश के लिए, जो अपनी कुल जरूरत का अधिकांश हिस्सा आयात करता है, कच्चे तेल की यह महंगाई बहुत बड़ा सिरदर्द है।
कच्चे तेल के महंगे होने से देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने का खतरा पैदा हो जाता है, जिससे परिवहन महंगा होता है और हर चीज की लागत बढ़ जाती है। इसके अलावा देश का चालू खाता घाटा (CAD) भी बिगड़ सकता है। यही कारण है कि जैसे ही क्रूड ऑयल की कीमतें ऊपर गईं, भारतीय शेयर बाजार में बिकवाली का दौर शुरू हो गया और दिग्गज कंपनियों के शेयरों में जोरदार मुनाफावसूली देखने को मिली।
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में ऐतिहासिक तेजी और निवेशकों का रुख
बाजार पर दबाव बनाने वाला तीसरा सबसे बड़ा फैक्टर अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड में आई भारी तेजी है। अमेरिका में 10 साल की ट्रेजरी यील्ड बढ़कर 5.2 फीसदी से भी ऊपर निकल गई है, जिसे साल 2004 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है। वित्तीय बाजारों का यह बुनियादी नियम है कि जब सुरक्षित माने जाने वाले अमेरिकी बॉन्ड की यील्ड बढ़ती है, तो वैश्विक निवेशक शेयर बाजार जैसे जोखिम भरे एसेट्स से अपना पैसा निकालकर बॉन्ड मार्केट की तरफ रुख करने लगते हैं।
बॉन्ड मार्केट से मिलने वाला आकर्षक रिटर्न निवेशकों को अपनी ओर खींच रहा है, जिसके चलते दुनिया भर के इमर्जिंग मार्केट्स से बिकवाली का दबाव बढ़ गया है। भारत के शेयर बाजार में भी विदेशी संस्थागत निवेशकों ने इस वजह से भारी बिकवाली की है, जिससे सूचकांकों को संभालने में घरेलू निवेशकों को खासी मशक्कत करनी पड़ रही है।
कमजोर होता रुपया और विदेशी निवेशकों (FPI) की भारी बिकवाली
घरेलू मुद्रा रुपये की कमजोरी ने भी निवेशकों की मुश्किलों को दोगुना कर दिया है। सोमवार को शुरुआती कारोबार के दौरान भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 14 पैसे कमजोर होकर 95.89 के स्तर पर जा पहुंचा। विदेशी मुद्रा बाजार में अब इस बात की प्रबल आशंका जताई जा रही है कि रुपया जल्द ही 96 रुपये प्रति डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर को भी पार कर सकता है। रुपये में लगातार आ रही गिरावट से आयात और महंगा हो रहा है, जिसका सीधा असर देश की कंपनियों के मार्जिन पर पड़ रहा है।
इसके साथ ही, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) का रुख भी भारत को लेकर बदल गया है। जियोजित इन्वेस्टमेंट के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट वीके विजयकुमार के अनुसार, जुलाई और अगस्त के महीनों में बाजार में खरीदारी करने के बाद, सितंबर की शुरुआत से ही विदेशी निवेशकों ने फिर से बिकवाल की भूमिका अपना ली है। एफपीआई लगातार भारतीय शेयरों से पैसा निकाल रहे हैं, जिससे बाजार का कॉन्फिडेंस हिला हुआ है।
आगे क्या करें निवेशक और बाजार का भविष्य
शेयर बाजार में इस तरह की भारी गिरावट के बाद रिटेल निवेशकों के मन में यह सवाल सबसे बड़ा है कि उन्हें अब क्या करना चाहिए। विशेषज्ञों का सुझाव है कि मौजूदा समय में बाजार में काफी उतार-चढ़ाव बना रहेगा, इसलिए किसी भी तरह की घबराहट में आकर पैनिक सेलिंग करने से बचना चाहिए। लंबी अवधि के निवेशकों को चुनिंदा और मजबूत फंडामेंटल वाले शेयरों में ही पैसा लगाना चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे भू-राजनीतिक तनाव, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड की चाल और कच्चे तेल के दामों पर आने वाले दिनों में सभी की नजरें टिकी रहेंगी। जब तक इन वैश्विक मोर्चों पर कोई सकारात्मक संकेत नहीं मिलता, तब तक बाजार में अस्थिरता का यह दौर जारी रहने की पूरी उम्मीद है। निवेशकों को सलाह दी जाती है कि वे अपने पोर्टफोलियो को विविधतापूर्ण रखें और बाजार के जानकारों की सलाह के बाद ही कोई बड़ा वित्तीय निर्णय लें।







