भारतीय शेयर बाजार के लिए कारोबारी हफ्ता बेहद निराशाजनक साबित हुआ, जहां चौतरफा बिकवाली के दबाव में बेंचमार्क सूचकांक धड़ाम हो गए। निवेशकों की संपत्ति में कुछ ही घंटों में खरबों रुपये का सफाया हो गया। बाजार की शुरुआत से ही बिकवाल हावी रहे और जैसे-जैसे कारोबार आगे बढ़ा, गिरावट का दायरा और भी ज्यादा चौड़ा होता चला गया। वित्तीय विश्लेषकों का मानना है कि घरेलू मोर्चे की तुलना में इस बार ग्लोबल फैक्टर भारतीय बाजारों पर भारी पड़े हैं।
सेंसेक्स और निफ्टी में ऐतिहासिक गोता, निवेशकों को भारी चपत
कारोबार के सत्र के अंत में प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स 1,247.71 अंकों की भारी-भरकम कमजोरी के साथ 73,580.54 के स्तर पर बंद हुआ। वहीं दूसरी ओर, व्यापक बाजार का प्रतीक माना जाने वाला निफ्टी भी 383.70 अंक यानी 1.64 प्रतिशत टूटकर 23,063.10 के स्तर पर सिमट गया। दिनभर के कारोबार में मंदी का आलम यह था कि तेजी के मुकाबले गिरावट वाले शेयरों की संख्या कई गुना ज्यादा रही। आंकड़े बताते हैं कि जहां महज 1,400 शेयरों में लिवाली देखी गई, वहीं लगभग 2,772 शेयरों में तेज बिकवाली का रुख रहा।
दिग्गज शेयरों की बात करें तो बजाज फाइनेंस, एचडीएफसी लाइफ, बजाज फिनसर्व, एक्सिस बैंक और इंटरग्लोब एविएशन जैसे बड़े नाम दिन के सबसे ज्यादा नुकसान उठाने वाले शेयरों में शामिल रहे। हालांकि, चुनिंदा शेयरों जैसे सिप्ला और एनटीपीसी ने इस मंदी के माहौल में भी मामूली बढ़त दर्ज करने में कामयाबी हासिल की, लेकिन यह बाजार के कुल नकारात्मक रुख को पलटने के लिए नाकाफी था।
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लगभग सभी सेक्टोरल इंडेक्स में मची खलबली
बाजार की इस सुनामी का असर किसी एक सेक्टर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र से जुड़े शेयर लाल निशान में बंद हुए। बिकवाली का दायरा इतना व्यापक था कि बैंकिंग, मेटल, ऑटो और फार्मा से लेकर हर मुख्य सूचकांक दबाव में नजर आया। निफ्टी प्राइवेट बैंक इंडेक्स में सबसे ज्यादा करीब 2.2 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इसके अलावा मेटल सेक्टर में 1.9 प्रतिशत और बैंकिंग सेक्टर में 1.7 प्रतिशत की कमजोरी देखने को मिली।
ऑटोमोबाइल और इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र के शेयरों में भी डेढ़ फीसदी तक की गिरावट दर्ज की गई, जबकि ऑयल एंड गैस सेक्टर 1.3 फीसदी नीचे आया। बड़े शेयरों के साथ-साथ मझोले और छोटे शेयरों यानी मिडकैप और स्मॉलकैप सेगमेंट में भी निवेशकों ने जमकर मुनाफा वसूली की या बिकवाली का रास्ता अपनाया। मिडकैप इंडेक्स करीब दो फीसदी और स्मॉलकैप इंडेक्स डेढ़ फीसदी की गिरावट के साथ बंद हुए, जिससे खुदरा निवेशकों की पोर्टफोलियो वैल्यू पर सीधा असर पड़ा है।
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में उछाल बना मंदी की मुख्य वजह
घरेलू बाजार में आई इस भारी गिरावट के पीछे अमेरिकी अर्थव्यवस्था से जुड़े आंकड़े और वहां के वित्तीय संकेतकों की अहम भूमिका रही। अमेरिका में 10 साल की ट्रेजरी यील्ड में जबरदस्त तेजी देखने को मिली और यह साल 2007 के बाद के अपने सबसे ऊंचे स्तर पर जा पहुंची। इसके साथ ही, दो साल की ट्रेजरी यील्ड भी 4.9 प्रतिशत के पार निकल गई। बॉन्ड यील्ड में इस तरह की बढ़ोतरी का मतलब है कि निवेशकों को सुरक्षित माने जाने वाले डेट मार्केट में बेहतर रिटर्न मिल रहा है।
"जब वैश्विक स्तर पर बॉन्ड यील्ड बढ़ती है, तो विदेशी संस्थागत निवेशक उभरते बाजारों जैसे भारत से अपना पैसा निकालकर सुरक्षित अमेरिकी बॉन्डों की ओर रुख करते हैं। यही कारण है कि स्थानीय बाजारों में अचानक से बिकवाली का दबाव बढ़ जाता है।" — वरिष्ठ बाजार विश्लेषक
इस परिस्थिति के कारण वैश्विक निवेशकों के लिए शेयर बाजार के मुकाबले बॉन्ड और अन्य सुरक्षित निवेश विकल्प ज्यादा आकर्षक बन जाते हैं। परिणामस्वरूप, उन्होंने इक्विटी मार्केट से भारी मात्रा में पूंजी निकालनी शुरू कर दी, जिसका सीधा खामियाजा भारतीय शेयर बाजार को भुगतना पड़ा।
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने बढ़ाई भारत की चिंता
भारतीय अर्थव्यवस्था कच्चे तेल के आयात पर बहुत अधिक निर्भर करती है, और ऐसे में क्रूड ऑयल के दाम बढ़ना हमेशा से भारतीय बाजारों के लिए एक नकारात्मक संकेत रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें एक बार फिर उछलकर 102 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गईं। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर पैदा हुई अनिश्चितताओं के कारण तेल आपूर्ति बाधित होने की आशंकाएं गहरा गई हैं।
कच्चे तेल के महंगे होने से देश का आयात बिल बढ़ता है, राजकोषीय घाटा प्रभावित होता है और घरेलू स्तर पर महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हो जाता है। जब-जब क्रूड ऑयल में इस प्रकार की तेजी आती है, तब-तब शेयर बाजार के ट्रेडर और निवेशक सतर्क हो जाते हैं और बिकवाली का दौर शुरू हो जाता है।
फेडरल रिजर्व की नीतियों और महंगाई का अनुमान
अमेरिकी आर्थिक गतिविधियों से जुड़े हालिया आंकड़े उम्मीद से ज्यादा मजबूत रहे हैं। इन मजबूत आंकड़ों के सामने आने के बाद निवेशकों के बीच यह आशंका तेजी से फैल गई है कि अमेरिकी केंद्रीय बैंक यानी फेडरल रिजर्व ब्याज दरों में कटौती को लेकर अपना रुख सख्त बनाए रख सकता है। यदि ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो दुनिया भर के शेयर बाजारों में तरलता यानी लिक्विडिटी कम हो जाती है।
इस वैश्विक वित्तीय परिदृश्य ने भारतीय इक्विटी बाजारों को भी अपनी चपेट में ले लिया। निवेशकों को अब आगे आने वाले कॉर्पोरेट नतीजों और वैश्विक केंद्रीय बैंकों की बैठकों पर अपनी पैनी नजर रखनी होगी, क्योंकि बाजार की आगामी दिशा इन्हीं बड़े कारकों पर निर्भर करेगी। खुदरा निवेशकों को सलाह दी जाती है कि वे इस तरह के उतार-चढ़ाव के समय पैनिक में आकर फैसले न लें और अपने पोर्टफोलियो को डायवर्सिफाइड रखें।





