गंगा नदी के आंचल में छिपी लापरवाही ने एक बार फिर कई हंसते-खेलते परिवारों को हमेशा के लिए उजाड़ दिया है। उत्तर प्रदेश के एक शांत इलाके में उस वक्त मातम पसर गया जब एक साथ 13 मासूम बच्चों के शव उनके घरों तक पहुंचे। यह कोई साधारण मौत नहीं थी, बल्कि प्रशासनिक अनदेखी और नाव चलाने वालों की बड़ी लापरवाही का नतीजा थी। जिस नाव पर ये बच्चे सवार थे, उसमें पहले से ही एक बड़ा छेद था और ऊपर से उसे तय क्षमता से कहीं ज्यादा लोगों से भर दिया गया था।
घटना के दिन सुबह का सूरज आम दिनों की तरह ही निकला था, लेकिन किसी को नहीं पता था कि शाम होते-होते यह दिन इतिहास का सबसे काला दिन बन जाएगा। बच्चे और ग्रामीण रोजाना की तरह नदी पार करने के लिए लकड़ी की उस पुरानी नाव पर चढ़े थे। नाविक ने लालच में आकर क्षमता से अधिक लोगों को बैठा लिया। नतीजा यह हुआ कि पानी का दबाव बढ़ते ही नाव में बने छेद से तेजी से पानी अंदर आने लगा। देखते ही देखते नाव नदी के गहरे पानी में समा गई और चीख-पुकार मच गई।
क्षमता से अधिक यात्री और सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं
नदी के घाटों पर सुरक्षा के दावों की पोल इस हादसे ने पूरी तरह खोलकर रख दी है। मौके पर मौजूद स्थानीय लोगों ने बताया कि नाव पर लाइफ जैकेट जैसी बुनियादी सुरक्षा का कोई नामोनिशान नहीं था। न तो नाविक के पास कोई लाइसेंस था और न ही प्रशासन की तरफ से कभी वहां कोई चेकिंग की जाती थी। ओवरलोडिंग रोकने की जिम्मेदारी जिन लोगों पर थी, वे या तो आंखें मूंद कर बैठे थे या फिर उन्हें इस बात की कोई परवाह नहीं थी कि इन छोटी नावों में कितने मासूमों की जिंदगियां दांव पर लगी हैं।
जब नाव डूब रही थी, तब बच्चों ने बचने के लिए बहुत संघर्ष किया, लेकिन गहरे पानी और तैरना न जानने के कारण वे खुद को बचा नहीं सके। आसपास के कुछ गोताखोरों ने अपनी जान पर खेलकर कुछ लोगों को बाहर निकाला, लेकिन 13 मासूमों की सांसें हमेशा के लिए थम चुकी थीं। पानी से एक-एक करके जब इन बच्चों के शव बाहर निकाले गए, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं। प्रशासन की राहत टीमें बहुत देर से मौके पर पहुंचीं, जिससे लोगों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया।
एक साथ उठीं 13 अर्थियां, रो पड़ा पूरा गांव
जब एक साथ 13 बच्चों के शव उनके गांवों में पहुंचे, तो वहां का मंजर शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है। माताओं की चीखें और पिताओं का रोना सुनकर पत्थर दिल इंसान भी पिघल जाए। एक ही मोहल्ले और एक ही गांव के इतने सारे घरों में एक साथ चूल्हे नहीं जले। हर तरफ बस एक ही सवाल गूंज रहा था कि आखिर इन मासूमों की मौत का असली गुनहगार कौन है? क्या कुछ रुपयों के लालच में इंसानी जिंदगी की कोई कीमत नहीं बची है?
गांव के लोग अपने बच्चों के शवों को सीने से लगाकर बेसुध हो रहे थे। स्कूल के बस्ते और किताबें वैसे ही रखी रह गईं, लेकिन उन बस्तों के मालिक अब इस दुनिया में नहीं रहे। स्थानीय प्रशासन ने घटना के बाद तुरंत औपचारिकताएं पूरी करते हुए कुछ मुआवजे का ऐलान जरूर किया है, लेकिन मुआवजे के इन कागजों से वे बच्चे वापस नहीं लौट सकते जो इस लापरवाही की भेंट चढ़ गए। लोग अब मांग कर रहे हैं कि इस हादसे के असली जिम्मेदार अधिकारियों और नाविक पर सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए।
प्रशासनिक सुस्ती और भविष्य के लिए गंभीर सबक
इस दिल दहला देने वाली घटना के बाद अब जाकर प्रशासन की नींद खुली है। घाटों पर पुलिस बल तैनात किया गया है और पुरानी व जर्जर नावों के संचालन पर रोक लगाने की बात कही जा रही है। सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन हमेशा किसी बड़े हादसे का इंतजार करता है? अगर समय रहते इन ओवरलोड नावों पर रोक लगा दी जाती और नावों की मरम्मत की जांच की जाती, तो शायद आज ये 13 घर वीरान न होते।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड टीम ने जब घाट का दौरा किया, तो पाया कि अभी भी कई जगहों पर नियमों को ताक पर रखकर नावें चलाई जा रही हैं। जब तक सख्त कानून लागू नहीं होंगे और नियमों को तोड़ने वालों को कड़ी सजा नहीं मिलेगी, तब तक ऐसे हादसों का सिलसिला थमता नजर नहीं आएगा। ये 13 मासूम सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, बल्कि यह हमारे पूरे तंत्र की नाकामी का एक जीता-जागता और खौफनाक सबूत हैं, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।





