भारतीय इतिहास के पन्नों में कई ऐसी तारीखें दर्ज हैं, जिन्होंने देश की तकदीर और तस्वीर हमेशा के लिए बदल दी। ऐसी ही एक ऐतिहासिक तारीख 20 सितंबर है, जो उस दिन की याद दिलाती है जब भारत में करीब तीन सदियों से चली आ रही मुगल सत्ता का सूरज हमेशा के लिए ढल गया था। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस मुगल सल्तनत का आखिरी अध्याय इस दिन लिखा गया, उसकी असल शुरुआत कहां से हुई थी? एक महत्वाकांक्षी शासक से शुरू हुई यह कहानी कैसे दिल्ली की सत्ता तक पहुंची, फिर धीरे-धीरे कमजोर हुई और आखिरकार 1857 में इसका खात्मा कैसे हुआ, यह अपने आप में एक दिलचस्प और लंबी दास्तान है।
कौन था जहीरुद्दीन बाबर और कहां से हुई थी मुगलों की शुरुआत?
मुगल साम्राज्य की नींव रखने वाला जहीरुद्दीन बाबर (1483-1530) अपने समय का एक साहसी और दूरदर्शी शासक था। इतिहास के जानकारों के अनुसार, मुगल असल में मध्य एशिया में विजय हासिल करने वाले तुर्क शासक तैमूर लंग और मंगोल शासक चंगेज खान के वंशज थे। मुगलों का उद्गम मुख्य रूप से आज के उज्बेकिस्तान और अफगानिस्तान के इलाकों में माना जाता है। उस दौर में इन शासकों की असली पहचान 'गुरकानियां वंश' के तौर पर होती थी। हालांकि, बाद में ब्रिटिश इतिहासकारों और शासकों ने इन्हें सामूहिक रूप से 'मुगल' नाम दिया, जो इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज हो गया।
बाबर की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। बताया जाता है कि मुगलकाल की स्थापना करने वाला बाबर महज 12 साल की उम्र में ही उज्बेकिस्तान के एक छोटे से शहर फेरगाना का शासक बन गया था। कम उम्र में ही उसे सत्ता के दांव-पेंच और लड़ाइयों का सामना करना पड़ा। अपने शुरुआती दिनों में उसे कई बार हार का सामना करना पड़ा और अपना राज्य तक छोड़ना पड़ा, लेकिन उसने कभी हार नहीं मानी और लगातार नए इलाकों को जीतने की कोशिश जारी रखी।
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भारत में प्रवेश और पानीपत का ऐतिहासिक युद्ध
अपनी किस्मत आजमाने और एक बड़े साम्राज्य की तलाश में बाबर ने आखिरकार भारतीय उपमहाद्वीप की ओर रुख किया। बाबर साल 1526 में भारत की सीमा में दाखिल हुआ। भारत पहुंचने के साथ ही उसका सीधा मुकाबला दिल्ली सल्तनत के तत्कालीन सुल्तान इब्राहिम लोधी से हुआ। दोनों सेनाओं के बीच हरियाणा के पानीपत के मैदान में भीषण संग्राम हुआ, जिसे इतिहास में 'पानीपत का पहला युद्ध' कहा जाता है।
इस युद्ध में बाबर ने अपनी बेहतरीन सैन्य रणनीति और तोपखाने का पहली बार बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया। बाबर की अनुशासित सेना के सामने इब्राहिम लोधी टिक नहीं सका और युद्ध में मारा गया। इस तरह बाबर ने दिल्ली और आगरा पर कब्जा जमा लिया। इसे ही भारत में मुगलकाल की औपचारिक शुरुआत और दिल्ली सल्तनत के अंत के रूप में याद किया जाता है। इस जीत के बाद उत्तर भारत में मुगल एक बेहद ताकतवर राजनीतिक शक्ति बनकर उभरे।
बाबर का छोटा शासन और हुमायूं का संघर्ष
हालांकि, भारत में मुगल साम्राज्य की नींव रखने वाले बाबर का शासन बहुत लंबा नहीं चल सका। वह महज चार साल तक ही भारत की गद्दी पर राज कर पाया और 1530 में उसका निधन हो गया। बाबर की मौत के बाद मुगल शासन की कमान उसके बेटे हुमायूं के हाथों में आई। इतिहासकारों का मानना है कि हुमायूं अपने पिता की तरह एक आक्रामक और कुशल सैन्य रणनीतिकार नहीं था। उसकी रुचि युद्ध की बजाय कला, ज्योतिष और काव्य-कविताओं में अधिक थी।
हुमायूं की इसी कमजोरी का फायदा उठाकर एक अन्य अफगान शासक शेरशाह सूरी ने उसे करारी शिकस्त दी और भारत की सत्ता पर कब्जा कर लिया। स्थिति इतनी खराब हो गई कि हुमायूं को अपनी जान बचाकर देश छोड़कर भागना पड़ा। साल 1540 से 1555 तक का लंबा समय हुमायूं ने निर्वासन में बिताया। हालांकि, बाद में शेरशाह सूरी की मृत्यु के बाद उपजे राजनीतिक हालातों का फायदा उठाकर हुमायूं ने एक बार फिर दिल्ली की गद्दी हासिल की, लेकिन उनका यह दूसरा कार्यकाल भी बहुत छोटा साबित हुआ।
अकबर से लेकर औरंगजेब तक विस्तार और स्वर्ण युग
हुमायूं के बाद गद्दी पर बैठा उसका बेटा जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर, जिसे इतिहास में 'अकबर महान' कहा जाता है। अकबर ने ही भारत में मुगल साम्राज्य का सबसे अधिक विस्तार किया और उसे एक सुदृढ़ प्रशासनिक ढांचा दिया। अकबर की नीतियों, राजपूतों के साथ उसके वैवाहिक और राजनीतिक संबंधों ने मुगल सल्तनत को भारत की सबसे मजबूत ताकत बना दिया। अकबर के बाद जहांगीर, शाहजहां और औरंगजेब के शासनकाल में इस साम्राज्य ने अपने चरम को छुआ।
शाहजहां के काल को मुगल वास्तुकला का स्वर्ण युग कहा जाता है, जिसने ताजमहल जैसी भव्य इमारतों को जन्म दिया। वहीं, औरंगजेब के लंबे शासनकाल के दौरान मुगल साम्राज्य का विस्तार तो सबसे ज्यादा दक्षिण भारत तक हुआ, लेकिन इसी दौर में आंतरिक विद्रोह, धार्मिक नीतियों और आर्थिक संकटों ने इस विशालकाय साम्राज्य की नींव को अंदर से खोखला करना शुरू कर दिया था।
"मुगल सल्तनत का इतिहास केवल राजाओं और युद्धों की कहानी नहीं है, बल्कि यह मध्यकालीन भारत की राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रवृत्तियों का एक ऐसा दस्तावेज है जिसने देश के सामाजिक ताने-बाने को गहरे तक प्रभावित किया।" — इतिहासकार
1857 की क्रांति और मुगलिया सल्तनत का अंत
औरंगजेब की मृत्यु (1707) के बाद मुगल साम्राज्य का पतन तेजी से शुरू हो गया। कमजोर उत्तराधिकारियों, आपसी गुटबाजी और नादिर शाह व अहमद शाह अब्दाली जैसे विदेशी आक्रमणकारियों ने दिल्ली को बुरी तरह लूटा। मराठों और बाद में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के उभार ने मुगलों की ताकत को केवल दिल्ली के लाल किले तक सीमित कर दिया।
साल 1857 में जब अंग्रेजों के खिलाफ देश का पहला स्वतंत्रता संग्राम भड़का, तो देश के असंतुष्ट राजाओं और सैनिकों ने प्रतीकात्मक रूप से वृद्ध मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को अपना नेता घोषित कर दिया। लेकिन अंग्रेजों ने इस विद्रोह को क्रूरता से कुचल दिया। ब्रिटिश सेना ने 20 सितंबर 1857 को दिल्ली पर पूरी तरह कब्जा कर लिया और अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें बाद में रंगून (अब म्यांमार) निर्वासित कर दिया गया, जहां उनकी मौत हो गई। इस प्रकार, एक ऐतिहासिक गिरफ्तारी के साथ भारत में सदियों पुरानी मुगल सल्तनत का सूरज हमेशा के लिए अस्त हो गया।




