कड़ी सुरक्षा के बीच शुरू हुआ जम्मू-कश्मीर विधानसभा का सत्र
जम्मू-कश्मीर विधानसभा का सात बैठकों वाला महत्वपूर्ण शरद सत्र सोमवार से कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच शुरू हो रहा है। इस सत्र के बेहद हंगामेदार रहने के पूरे आसार हैं, क्योंकि सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच कई अहम मुद्दों पर तीखी भिड़ंत देखने को मिल सकती है। पिछले कुछ महीनों में राज्य के राजनीतिक समीकरणों में आए बदलाव के बाद यह सत्र कई मायनों में बेहद खास माना जा रहा है। विधानसभा अध्यक्ष अब्दुल रहीम राथर द्वारा जारी आधिकारिक कैलेंडर के अनुसार, सत्र की शुरुआत शोक प्रस्तावों के साथ होगी और इसके तुरंत बाद विधायी कामकाज को गति दी जाएगी।
प्रशासन ने सत्र के दौरान किसी भी अप्रिय घटना से निपटने के लिए विधानसभा कांप्लेक्स और उसकी ओर जाने वाले सभी प्रमुख मार्गों पर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं। पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी खुद सुरक्षा व्यवस्था की लगातार निगरानी कर रहे हैं। प्रवेश द्वारों पर अत्याधुनिक उपकरणों के जरिए जांच की जा रही है और संदिग्ध गतिविधियों पर पैनी नजर रखी जा रही है ताकि सदन की कार्यवाही शांतिपूर्ण ढंग से संचालित हो सके।
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विपक्षी दलों की घेराबंदी: रोजगार और भ्रष्टाचार मुख्य मुद्दे
सत्र के आगाज से पहले ही मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (BJP) और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) ने उमर अब्दुल्ला सरकार को घेरने के लिए अपनी रणनीति को अंतिम रूप दे दिया है। विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार अपने चुनावी वादों को पूरा करने में पूरी तरह विफल रही है और आम जनता से जुड़े बुनियादी मुद्दों पर उसका रवैया उदासीन रहा है। भाजपा ने विशेष रूप से सरकारी नौकरियों की आउटसोर्सिंग, सरकारी कार्यालयों में बढ़ते भ्रष्टाचार, और पंचायत तथा शहरी स्थानीय निकायों के चुनावों में हो रही देरी को बड़ा मुद्दा बनाया है।
इसके साथ ही बिजली दरों में बेतहाशा बढ़ोतरी और आम आदमी की जेब पर पड़ने वाले अतिरिक्त बोझ को लेकर भी सदन में जोरदार हंगामा होने के पूरे आसार हैं। विपक्षी नेताओं का कहना है कि सरकार जनता के हितों की रक्षा करने में नाकाम साबित हो रही है और वे इन तमाम मुद्दों पर सदन के भीतर और बाहर सरकार से तीखे सवाल पूछेंगे।
पीडीपी और अन्य दलों का रुख, बेरोजगारी और आरक्षण पर टिकी नजरें
मुख्य विपक्षी दलों में शामिल पीडीपी ने स्पष्ट किया है कि वह विधानसभा के इस सत्र के दौरान बेरोजगारी के गंभीर संकट, सरकारी नौकरियों की आउटसोर्सिंग, नई आरक्षण नीति और सरकारी विभागों में कार्यरत दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के नियमितीकरण जैसे ज्वलंत मुद्दों को प्रमुखता से उठाएगी। पार्टी नेताओं का मानना है कि युवाओं का भविष्य अधर में लटका हुआ है और सरकार को इस पर स्थिति स्पष्ट करनी होगी।
"विधानसभा का यह सत्र जनता की उम्मीदों और उनके बुनियादी अधिकारों की रक्षा करने का सबसे बड़ा मंच है। हम बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार जैसे तमाम गंभीर मुद्दों पर सरकार को कटघरे में खड़ा करेंगे। जनता ने जिन उम्मीदों के साथ जनादेश दिया था, सरकार उन पर खरी नहीं उतर रही है।" — प्रमुख विपक्षी नेता
इसके अतिरिक्त, सरकार को बाहर से समर्थन दे रही कांग्रेस पार्टी भी कई नीतिगत मामलों पर अपनी ही सहयोगी सरकार से सवाल पूछने की तैयारी में है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि जनहित के मुद्दों पर किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा और पार्टी सदन के भीतर अपनी स्वतंत्र आवाज बुलंद करेगी।
सत्र की कम अवधि पर छिड़ा सियासी संग्राम
इस विधानसभा सत्र को लेकर एक बड़ा विवाद इसकी कम अवधि को लेकर भी खड़ा हो गया है। मात्र सात दिनों के इस छोटे सत्र को लेकर भाजपा, पीडीपी और कांग्रेस तीनों ने ही सवाल उठाए हैं। विपक्षी दलों का तर्क है कि जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील और लंबे समय से प्रशासनिक बदलावों से गुजर रहे केंद्रशासित प्रदेश के लिए सात दिन का समय बेहद कम है, जिसमें जनता से जुड़े सभी महत्वपूर्ण मुद्दों और विकास योजनाओं पर विस्तार से चर्चा किया जाना असंभव है।
विपक्ष का आरोप है कि सरकार विस्तृत चर्चा से बचने के लिए सत्र की अवधि को छोटा रख रही है ताकि उसे कठिन सवालों का सामना न करना पड़े। वहीं दूसरी ओर, सरकार से जुड़े सूत्रों का कहना है कि तय किए गए एजेंडे के अनुसार सभी महत्वपूर्ण विषयों पर पर्याप्त चर्चा कराई जाएगी और किसी भी जनहित के मुद्दे को अनसुना नहीं छोड़ा जाएगा।
सत्ता पक्ष की जवाबी रणनीति और फारूक अब्दुल्ला की भूमिका
विपक्षी दलों के तीखे तेवर और आक्रामक तेवरों को देखते हुए सत्तारूढ़ नेशनल कांफ्रेंस (NC) भी पूरी तरह सतर्क हो गई है। पार्टी ने विपक्ष के हर हमले का तथ्यों के साथ करारा जवाब देने की ठोस रणनीति तैयार की है। इस पूरी राजनीतिक कसरत की कमान खुद पार्टी अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने संभाल रखी है। हालांकि वे विधानसभा के सीधे सदस्य नहीं हैं, लेकिन पार्टी के शीर्ष नेता के रूप में वे लगातार आंतरिक बैठकें कर रहे हैं और विधायकों को सदन में प्रभावी ढंग से अपनी बात रखने के निर्देश दे रहे हैं।
सत्र के दौरान विभिन्न दिनों में सरकारी कामकाज, प्राइवेट मेंबर बिल और प्रस्तावों पर चर्चा की जाएगी। 24 सितंबर को प्राइवेट मेंबर बिलों पर चर्चा का दिन तय किया गया है, जिसके बाद के दिनों में भी विधायी कार्यों को आगे बढ़ाया जाएगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले सात दिन जम्मू-कश्मीर की राजनीति में भारी उथल-पुथल और तीखी बहसों से भरे रहने वाले हैं, जहाँ जनता की निगाहें सदन के अंदर होने वाली हर बड़ी गतिविधि पर टिकी रहेंगी।




