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राजनीतिपढ़ने में समय: 5 मिनट

धर्म जोड़ता है राजनीति विभाजित करती है: मोहन भागवत के बयान पर सियासी हलचल तेज

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बयान पर देश की राजनीति गरमा गई है। विपक्ष ने इस बयान को लेकर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए समर्थन की मांग की है, जबकि राजनीतिक गलियारों में इस पर नई बहस छिड़ गई है।
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19 सितंबर 2026 • अपडेटेड
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धर्म जोड़ता है राजनीति विभाजित करती है: मोहन भागवत के बयान पर सियासी हलचल तेज
📷 धर्म जोड़ता है राजनीति विभाजित करती है: मोहन भागवत के बयान पर सियासी हलचल तेज — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि धर्म लोगों को आपस में जोड़ता है जबकि राजनीति उन्हें विभाजित करने का काम करती है।
  • विपक्ष ने इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि यदि यह बात सही है तो इस वैचारिक रुख का खुलकर समर्थन किया जाना चाहिए।
  • देश के राजनीतिक परिदृश्य में धर्म और राजनीति के अंतर्संबंधों पर एक बार फिर से गंभीर बहस शुरू हो गई है।
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धर्म और राजनीति के अंतर्संबंधों पर नया बयान

भारतीय समाज और राजनीति में समय-समय पर धर्म और उसकी भूमिका को लेकर तमाम तरह की चर्चाएं होती रही हैं। हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने एक ऐसा बयान दिया, जिसने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि धर्म हमेशा से लोगों को आपस में जोड़ने का काम करता है, जबकि इसके विपरीत राजनीति समाज को विभाजित और खंडित करने का साधन बन जाती है। इस बयान के सामने आने के बाद से ही विभिन्न राजनीतिक दलों और वैचारिक संगठनों के बीच प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया है।

यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश के भीतर विभिन्न मुद्दों पर सामाजिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण लगातार गहराता जा रहा है। ऐसे संवेदनशील दौर में संघ प्रमुख का यह कथन अपने आप में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रकार के बयान न केवल वैचारिक मंचों पर बल्कि आम जनता के बीच भी गहरी चर्चा का विषय बनते हैं, क्योंकि धर्म और राजनीति का मेल भारतीय लोकतंत्र की एक ऐसी वास्तविकता है जिससे इनकार नहीं किया जा सकता।

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विपक्ष की प्रतिक्रिया और समर्थन की मांग

मोहन भागवत के इस बयान के बाद विपक्षी दलों ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। कई विपक्षी नेताओं का कहना है कि यदि संघ प्रमुख इस बात को मानते हैं कि राजनीति समाज को विभाजित करती है, तो उन्हें और उनके वैचारिक सहयोगियों को ध्रुवीकरण की राजनीति से पूरी तरह तौबा कर लेनी चाहिए। विपक्षी खेमे से यह भी मांग की जा रही है कि इस वैचारिक सत्य को केवल बयानों तक सीमित न रखकर व्यावहारिक धरातल पर भी लागू किया जाना चाहिए।

राजनीतिक जानकारों का यह भी कहना है कि विपक्ष इस बयान का उपयोग वैचारिक मोर्चे पर सरकार और उसके समर्थकों को घेरने के लिए कर रहा है। उनका तर्क है कि जब देश का सबसे बड़ा वैचारिक संगठन यह स्वीकार कर रहा है कि राजनीति विभाजनकारी होती है, तो चुनाव जीतने और सत्ता हासिल करने के लिए अपनाए जाने वाले तौर-तरीकों पर भी गंभीर आत्ममंथन होना चाहिए। इस मुद्दे पर आने वाले दिनों में और अधिक तीखे राजनीतिक बयान सामने आने की पूरी संभावना है।

सामाजिक समरसता और देश की वर्तमान स्थिति

भारत जैसे विविधता से भरे देश में सामाजिक समरसता बनाए रखना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है। यहां हर कोने पर अलग-अलग संस्कृतियां, भाषाएं और मान्यताएं मौजूद हैं। ऐसे में धर्म की परिभाषा को लेकर अलग-अलग मत होना स्वाभाविक है। मोहन भागवत का यह कहना कि धर्म जोड़ने का काम करता है, एक दार्शनिक दृष्टिकोण को दर्शाता है, जिसका मूल उद्देश्य मानव कल्याण और नैतिकता को बढ़ावा देना होता है।

हालांकि, जब धर्म का दायरा सिमटकर राजनीतिक मंचों तक पहुंच जाता है, तो इसके मायने पूरी तरह बदल जाते हैं। इतिहास गवाह है कि जब-जब धर्म का उपयोग राजनीतिक लाभ के लिए किया गया है, तब-तब समाज में दूरियां बढ़ी हैं। आज के समय में आम नागरिक भी यही चाहता है कि देश का विकास और आपसी भाईचारा सर्वोपरि हो, न कि कोई ऐसा मुद्दा जो लोगों के बीच दरार पैदा करे।

"धर्म का असली उद्देश्य इंसानियत को पिरोना और समाज में सद्भाव कायम करना है। जब राजनीति इसमें दखल देती है, तो विभाजन की दीवारें खड़ी होने लगती हैं।" — एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक

राजनीतिक दलों की कार्यशैली पर सवाल

देश के मौजूदा राजनीतिक हालात पर नजर डालें तो हर पार्टी अपने तरीके से जनता को लुभाने का प्रयास करती है। चुनाव जीतने के लिए जाति और धर्म के समीकरणों को साधना आज के समय की सबसे बड़ी चुनावी रणनीति बन चुका है। ऐसे में मोहन भागवत का यह बयान उन सभी दलों के लिए एक आईना है जो अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए समाज को बांटने से भी गुरुकहेज नहीं करते।

जनता के बीच भी अब इस बात को लेकर बहस छिड़ गई है कि क्या वाकई राजनीति पूरी तरह विभाजनकारी हो चुकी है? कई बुद्धिजीवियों का मानना है कि राजनीति को जनसेवा का माध्यम होना चाहिए, न कि समाज को अलग-अलग खांचों में बांटने का यंत्र। जब तक राजनीति का यह चरित्र नहीं बदलेगा, तब तक देश में वैचारिक और सामाजिक एकता को मजबूत करना एक कठिन चुनौती बना रहेगा।

आगे की राह और निष्कर्ष

मोहन भागवत के इस बयान ने एक बार फिर से इस बात की आवश्यकता को रेखांकित कर दिया है कि देश को जोड़ने वाली ताकतों को मजबूत किया जाना चाहिए और तोड़ने वाली ताकतों से सख्ती से निपटा जाना चाहिए। धर्म और राजनीति के बीच की इस महीन रेखा को समझना हर नागरिक और नेता के लिए जरूरी है।

अंत में यही कहा जा सकता है कि बयान चाहे किसी भी मंच से आया हो, उसकी सार्थकता इसी बात में है कि उसे धरातल पर कितना उतारा जाता है। यदि देश के तमाम राजनीतिक दल और संगठन इस मूल मंत्र को अपना लें कि समाज को जोड़ना ही सबसे बड़ा धर्म है, तो भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था और अधिक मजबूत और परिपक्व हो सकती है।

द फ्रीलांस पत्रकारिता नीति (Editorial Commitment):हम निष्पक्ष, सटीक और तथ्यात्मक पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह समाचार रिपोर्ट विभिन्न प्रमाणित समाचार एजेंसियों, आधिकारिक बयानों और स्थानीय संवाददाताओं से प्राप्त इनपुट के आधार पर तैयार की गई है।
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