उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में इन दिनों स्वास्थ्य विभाग से जुड़ी आशा और संगिनी कार्यकर्ताओं का गुस्सा सड़क पर साफ दिखाई दे रहा है। जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं को लोगों तक पहुंचाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाने वाली ये महिला कर्मचारी लंबे समय से अपनी उपेक्षा से नाराज हैं। हाल ही में हुए एक बड़े प्रदर्शन के दौरान इन कर्मियों ने सरकार के सामने अपनी कई सूत्रीय मांगें रखीं और साफ कर दिया कि जब तक उनकी समस्याओं का समाधान नहीं होता, उनका संघर्ष जारी रहेगा।
ग्रामीण इलाकों में गर्भवती महिलाओं की देखभाल, बच्चों का टीकाकरण और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं का प्रचार-प्रसार करने वाली ये महिलाएं आज खुद आर्थिक तंगी और अनिश्चितता के दौर से गुजर रही हैं। उनका कहना है कि वे दिन-रात मेहनत करती हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें जो प्रोत्साहन राशि या मानदेय मिलता है, वह उनके परिवार का गुजारा करने के लिए बेहद कम है। बलिया के जिला मुख्यालय पर इकट्ठा हुई सैकड़ों आशा बहुओं और संगिनियों ने सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और अपनी आवाज बुलंद की।
राज्य कर्मचारी का दर्जा पाने के लिए सड़कों पर उतरीं आशा बहुएं
प्रदर्शन के दौरान आशा और संगिनी कर्मियों की सबसे प्रमुख मांग यह है कि उन्हें सरकारी कर्मचारी का दर्जा दिया जाए। उनका तर्क है कि वे स्वास्थ्य विभाग के लगभग सभी अभियानों में पूरी ईमानदारी से ड्यूटी करती हैं, फिर भी उन्हें संविदा या अस्थायी कर्मचारी की तरह भी सुविधाएं नहीं मिलती हैं। सरकार की हर छोटी-बड़ी योजना को गांव-गांव तक पहुंचाने की जिम्मेदारी इन्हीं के कंधों पर होती है, लेकिन सुरक्षा और स्थायित्व के नाम पर इनके पास कुछ नहीं है।
संगठन से जुड़ी महिलाओं का कहना है कि जब सरकार कोरोना काल या अन्य आपातकालीन स्थितियों में उनसे पूरी मेहनत करा सकती है, तो उन्हें स्थायी क्यों नहीं किया जा सकता। राज्य कर्मचारी का दर्जा मिलने से न केवल उनका भविष्य सुरक्षित होगा, बल्कि उन्हें वे तमाम बुनियादी लाभ भी मिलने लगेंगे जो अन्य सरकारी विभागों के कर्मचारियों को मिलते हैं। इस मांग को लेकर बलिया में पिछले कुछ दिनों से सुगबुगाहट तेज हो गई है और महिलाएं अब आर-पार की लड़ाई के मूड में नजर आ रही हैं।
संबंधित खबरें
महंगाई के दौर में बेहद कम मानदेय से चल रहा है गुजारा
आज के दौर में जब हर चीज के दाम आसमान छू रहे हैं, तब आशा और संगिनियों को मिलने वाली प्रोत्साहन राशि मजाक बनकर रह गई है। प्रदर्शनकारियों ने बताया कि उन्हें कई महीनों तक समय पर भुगतान नहीं मिलता और जब पैसा आता भी है, तो वह इतनी कम मात्रा में होता है कि उससे महीने भर का खर्च चलाना नामुमकिन हो जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में इनकी ड्यूटी 24 घंटे की होती है, क्योंकि किसी भी समय प्रसव या स्वास्थ्य आपातकाल की स्थिति आ सकती है।
विशेषज्ञों का भी मानना है कि जब तक जमीनी स्तर के स्वास्थ्य कर्मियों को आर्थिक रूप से मजबूत नहीं किया जाएगा, तब तक स्वास्थ्य योजनाओं का पूरा लाभ धरातल पर नहीं उतर पाएगा। कम मानदेय के कारण इन महिलाओं को मानसिक तनाव का भी सामना करना पड़ता है। बलिया के इस प्रदर्शन ने एक बार फिर से इस बात को उजागर कर दिया है कि स्वास्थ्य विभाग की रीढ़ कही जाने वाली ये महिलाएं कितनी कठिन परिस्थितियों में अपना काम कर रही हैं।
"हम दिन-रात अपनी जान जोखिम में डालकर सरकारी योजनाएं घर-घर पहुंचाती हैं, लेकिन बदले में हमें मेहनताना तक समय पर नहीं मिलता। सरकार को हमारी सुध लेनी ही होगी और हमें राज्य कर्मचारी घोषित करना होगा।" — मालती देवी, आशा कार्यकर्ता नेता, बलिया
स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ सकता है असर, प्रशासन सतर्क
आशा और संगिनियों के इस आंदोलन का असर आने वाले दिनों में ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं पर भी पड़ सकता है। यदि सरकार ने समय रहते इनकी मांगों पर विचार नहीं किया, तो ये कर्मचारी काम बंद करने का बड़ा कदम उठा सकती हैं। इससे टीकाकरण अभियान, जननी सुरक्षा योजना और परिवार नियोजन से जुड़े कार्यक्रम सीधे तौर पर प्रभावित हो सकते हैं। जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं और प्रदर्शनकारियों से बातचीत करने के प्रयास भी किए जा रहे हैं।
स्थानीय प्रशासन की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह इन महिला कर्मियों की समस्याओं को गंभीरता से सुने और उनकी मांगों का एक व्यावहारिक हल निकाले। उत्तर प्रदेश सरकार के स्वास्थ्य निदेशालय तक भी इन मांगों को पहुंचाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। आने वाले दिनों में देखना यह होगा कि शासन स्तर से इन महिला कर्मियों के लिए क्या राहतभरी घोषणा की जाती है।
निष्कर्ष: सरकार और प्रशासन से न्याय की उम्मीद
बलिया में हुआ यह प्रदर्शन सिर्फ एक जिले की तस्वीर नहीं है, बल्कि पूरे देश और प्रदेश में काम कर रही लाखों आशा और संगिनी कार्यकर्ताओं के मन की टीस है। वे केवल अपने हक और सम्मान की लड़ाई लड़ रही हैं। जनता और समाज के बीच रहकर स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने वाली इन महिलाओं को उनका अधिकार मिलना बेहद जरूरी है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार इनकी मांगों पर क्या रुख अपनाती है और क्या वाकई इन्हें इनका हक मिल पाता है।





