मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने एक बार फिर विपक्षी दल कांग्रेस पर तीखा राजनीतिक प्रहार किया है। चुनावी रोल के 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' (SIR) और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर हो रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच मुख्यमंत्री ने कांग्रेस के राजनीतिक इतिहास की कई परतों को उधेड़ा है। उन्होंने साफ कहा कि जब चुनाव नतीजे मनमुताबिक आते हैं तो प्रक्रिया सही लगती है, लेकिन हार मिलते ही संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाए जाने लगते हैं।
अतीत के पन्ने पलटने की नसीहत और टीएन शेषन का उदाहरण
नरसिंहपुर में आयोजित एक विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए सीएम मोहन यादव ने कांग्रेस के पुराने फैसलों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी आज संवैधानिक मर्यादाओं और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर रही है, जबकि उसने खुद अतीत में ऐसे कई कदम उठाए हैं जो व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। मुख्यमंत्री ने विशेष तौर पर याद दिलाया कि देश के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त रह चुके टीएन शेषन को कांग्रेस पार्टी ने ही बीजेपी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी के खिलाफ चुनावी अखाड़े में उतारा था।
इतिहास के पन्नों के अनुसार, टीएन शेषन ने 1999 के लोकसभा चुनाव में गांधीनगर निर्वाचन क्षेत्र से लालकृष्ण आडवाणी के खिलाफ कांग्रेस समर्थित या पार्टी के टिकट पर अपनी चुनावी किस्मत आजमाई थी। मुख्यमंत्री ने तंज कसते हुए कहा कि जो लोग आज संस्थाओं की गरिमा का पाठ पढ़ा रहे हैं, उन्हें पहले अपने कार्यकाल और फैसलों पर नजर डालनी चाहिए।
सुरक्षा अधिकारियों से जुड़े सियासी किस्से और वैचारिक प्रहार
अपने संबोधन को आगे बढ़ाते हुए मुख्यमंत्री ने पूर्व मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल का भी जिक्र किया। उन्होंने दावा किया कि 1990 के दशक में पंजाब में उग्रवाद पर नकेल कसने वाले मशहूर आईपीएस अधिकारी केपीएस गिल से भी कांग्रेस ने राजनीतिक हित साधने का प्रयास किया था। सीएम यादव ने आरोप लगाया कि देश के राजनीतिक नेतृत्व और संवैधानिक संस्थाओं को एक परिवार विशेष की 'आजीवन जागीर' मान लिया गया था, जिसके कारण आज भी वैचारिक असंतोष दिखाई देता है।
मुख्यमंत्री ने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी कि चुनाव आयोग जैसी सर्वोच्च संस्थाओं के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के नाम पर किसी भी प्रकार की अराजकता या राजनीतिक दबाव की राजनीति को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। जनता अब सब जानती है और राजनीतिक दल अपने स्वार्थ के लिए संवैधानिक संस्थाओं को कठघरे में खड़ा करना बंद करें।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और राजनीतिक बयानों पर आधारित इस रिपोर्ट के दावों की सत्यता की 'The Freelance' स्वतंत्र रूप से पुष्टि करता है। यह बयान सार्वजनिक सभा और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का हिस्सा रहा है। साभार: संबंधित राजनीतिक मंच / समाचार एजेंसी।
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