शेयर बाजार में दो दशक से अधिक का सबसे लंबा मंदी का दौर
भारतीय शेयर बाजार इन दिनों बेहद चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा है। निवेशकों के लिए यह समय किसी बड़े झटके से कम नहीं है क्योंकि प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी लगातार आठ हफ्तों से लाल निशान में बंद हो रहे हैं। वित्तीय विश्लेषकों और बाजार के जानकारों के मुताबिक, पिछले 25 वर्षों के इतिहास में यह पहला मौका है जब बाजार को इतने लंबे समय तक लगातार साप्ताहिक गिरावट का सामना करना पड़ा है। यह मंदी साल 2020 के कोविड-19 क्रैश और साल 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान देखे गए दौर से भी लंबी साबित हो रही है।
इस लगातार मंदी के कारण निवेशकों की गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा बाजार की भेंट चढ़ गया है। पिछले आठ हफ्तों के दौरान बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) पर लिस्टेड कंपनियों का कुल मार्केट कैप घटकर 467 लाख करोड़ रुपये के नीचे आ गया है। इस पूरी अवधि में निवेशकों की कुल संपत्ति से लगभग 26 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान हुआ है, जिससे आम निवेशकों से लेकर बड़े फंड हाउस तक सभी चिंतित नजर आ रहे हैं।
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विदेशी निवेशकों की लगातार भारी बिकवाली और बॉन्ड यील्ड का दबाव
घरेलू शेयर बाजार में चल रही इस मंदी के पीछे कई वैश्विक और घरेलू कारण जिम्मेदार हैं, जिनमें विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की अंधाधुंध बिकवाली सबसे प्रमुख वजह है। विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयरों से लगातार अपना पैसा निकाला है, जिससे बाजार का सेंटिमेंट पूरी तरह से बिगड़ गया है। अकेले अक्टूबर के शुरुआती दिनों में विदेशी निवेशकों ने हजारों करोड़ रुपये के शेयरों की शुद्ध बिकवाली की, जिसका सीधा असर सूचकांकों पर देखने को मिला।
इसके साथ ही वैश्विक स्तर पर अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में आया तेज उछाल भी एक बड़ा कारण है। अमेरिकी 10 साल के ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड में हुई वृद्धि के बाद से वैश्विक निवेशकों के लिए कम जोखिम वाला डेट मार्केट ज्यादा आकर्षक बन गया है। इसके परिणामस्वरूप, निवेशकों ने भारत जैसे उभरते हुए और थोड़े जोखिम भरे शेयर बाजारों से अपना पैसा निकालकर सुरक्षित जगहों पर लगाना शुरू कर दिया है।
किन शेयरों में सबसे ज्यादा गिरावट और किसने संभाला मोर्चा
पिछले कुछ हफ्तों के दौरान बाजार के विभिन्न सेक्टरों में भारी बिकवाली का असर साफ दिखाई दिया है। ऑटोमोबाइल सेक्टर से लेकर बैंकिंग और आईटी सेक्टर तक के प्रमुख शेयरों में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। टाटा मोटर्स, मारुति सुजुकी, महिंद्रा एंड महिंद्रा और टीसीएस जैसी दिग्गज कंपनियों के शेयरों में निवेशकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। निफ्टी के कई प्रमुख शेयर अपने ऊंचे स्तरों से काफी नीचे फिसल चुके हैं।
हालांकि, इस मंदी के बीच घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) ने बाजार को संभालने की पूरी कोशिश की है। जब भी विदेशी निवेशकों ने बिकवाली बढ़ाई, घरेलू फंड्स ने आगे आकर खरीदारी की और बाजार को गिरने से बचाने का प्रयास किया। इसके अलावा कुछ चुनिंदा शेयरों जैसे कोटक महिंद्रा बैंक, डॉ रेड्डीज और कोल इंडिया ने इस मुश्किल दौर में भी सकारात्मक रिटर्न देकर निवेशकों को कुछ हद तक राहत पहुंचाई है।
कच्चे तेल की कीमतें और महंगाई का बढ़ता खतरा
शेयर बाजार पर केवल विदेशी बिकवाली का ही दबाव नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में हो रहा उतार-चढ़ाव भी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है, ऐसे में ऑयल के दाम बढ़ने से देश का आयात बिल बढ़ता है और राजकोषीय घाटे पर असर पड़ता है। इसका सीधा असर भारतीय रुपये की कमजोरी और देश के भीतर बढ़ने वाली महंगाई के रूप में सामने आता है, जिससे बाजार का मनोबल कमजोर होता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक वैश्विक स्तर पर बॉन्ड यील्ड और कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता नहीं आती तथा विदेशी निवेशकों का रुख सकारात्मक नहीं होता, तब तक बाजार में उतार-चढ़ाव का यह दौर जारी रह सकता है। हालांकि, लंबी अवधि के निवेशकों के लिए इस तरह की गिरावट को एक अवसर के रूप में भी देखा जा रहा है, लेकिन फिलहाल बाजार पूरी तरह सतर्कता के मूड में है।
"बाजार में इस तरह की लंबी गिरावट निवेशकों के लिए धैर्य की परीक्षा होती है। जब तक वैश्विक अनिश्चितताएं और विदेशी फंडों की निकासी थम नहीं जाती, तब तक बाजार में अत्यधिक सतर्कता बरतने की आवश्यकता है। निवेशकों को घबराने के बजाय चुनिंदा और मजबूत फंडामेंटल वाले शेयरों पर फोकस करना चाहिए।" — वरिष्ठ वित्तीय विश्लेषक





