दीक्षांत समारोह में सीजेआई सूर्यकांत का संबोधन
देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने शनिवार को कानून की पढ़ाई पूरी करने वाले युवाओं से न्याय, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करने की पुरजोर अपील की। उन्होंने कहा कि कानूनी पेशे में केवल किताबों से मिलने वाली कानूनी जानकारी होना ही काफी नहीं है, बल्कि अन्याय के खिलाफ खड़े होने का साहस और दूसरों की बात ध्यान से सुनने की विनम्रता भी बेहद जरूरी है।
बेंगलुरु स्थित प्रतिष्ठित नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (NLSIU) के दीक्षांत समारोह में शिरकत करते हुए सीजेआई सूर्यकांत ने अपने इस दौरे को लेकर हाल ही में हुए विरोध प्रदर्शनों पर भी अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि कुछ बाहरी ताकतों के कारण ऐसी परिस्थितियां बनाई गईं, जिससे कार्यक्रम के आयोजन को लेकर असमंजस और अनिश्चितता पैदा हो गई थी। हालांकि, इसके बावजूद छात्रों ने समझदारी दिखाते हुए बाधाओं को दरकिनार किया और खुले संवाद का समर्थन किया।
बाहरी ताकतों द्वारा पैदा की गई अनिश्चितता पर बोले सीजेआई
अपने संबोधन के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने खुलकर उन चुनौतियों का जिक्र किया, जो इस दीक्षांत समारोह से ठीक पहले सामने आई थीं। उन्होंने कहा कि समारोह से पहले के दिन पूरी तरह सामान्य नहीं थे और कुछ अवांछित परिस्थितियों के कारण कार्यक्रम के भविष्य पर सवालिया निशान लग गया था।
उन्होंने छात्रों की सराहना करते हुए कहा कि तमाम मुश्किलों और अनिश्चितता के बाद भी यहां के युवाओं ने जिस दृढ़ संकल्प और परिपक्वता का परिचय दिया, वह काबिल-ए-तारीफ है। उन्होंने माना कि कुछ समय के लिए ऐसा लगने लगा था कि शायद यह ऐतिहासिक आयोजन उस रूप में संपन्न नहीं हो पाएगा जिसकी उम्मीद सभी ने की थी, लेकिन छात्रों की जिद और सकारात्मक सोच ने हर बाधा को पार कर लिया।
दमनकारी प्रवृत्तियों पर भारी पड़ा छात्रों का खुला संवाद
छात्रों के रुख की प्रशंसा करते हुए सीजेआई ने कहा कि इस संस्थान के प्रतिभाशाली युवाओं ने यह साबित कर दिया है कि किसी भी तरह के दबाव या दमन की भावना को लंबे समय तक दबाया नहीं जा सकता है। बाधाएं खड़ी करने वाली आवाज़ों से ऊपर उठकर इन भावी वकीलों ने तानाशाही या कायरतापूर्ण तरीकों को ठुकराया और खुले संवाद की गरिमा को सर्वोपरि रखा।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र और न्यायपालिका दोनों ही स्वस्थ संवाद पर टिके हैं। असहमति जताना सबका अधिकार है, लेकिन संवाद का रास्ता कभी बंद नहीं होना चाहिए। छात्रों द्वारा दिखाई गई यह परिपक्वता देश के भविष्य के लिए एक बहुत बड़ा संकेत है।
कानूनी पेशा कमजोर दिल वालों के लिए नहीं
युवा स्नातकों को सलाह देते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि वकालत का पेशा किसी भी रूप में कमजोर दिल वाले इंसानों के लिए नहीं है। उन्होंने नए वकीलों से अपील की कि वे हमेशा सच्चाई और न्याय का पक्ष लें। साथ ही, उन्होंने यह भी याद दिलाया कि किसी भी बड़े फैसले पर पहुंचने से पहले विरोधी पक्ष की बात को भी पूरी शालीनता से सुनना चाहिए।
"कानूनी पेशा कमजोर दिल वालों के लिए नहीं है। सही का पक्ष लेने का साहस और दूसरों की अनसुनी आवाजों को सुनने की विनम्रता ही एक सच्चे न्यायविद की पहचान है।" — जस्टिस सूर्यकांत, मुख्य न्यायाधीश, भारत
उन्होंने यह भी जोड़ा कि कानून कोई स्थिर या जड़ चीज नहीं है, बल्कि यह उन लोगों के व्यवहार और विचारों से निरंतर विकसित होता है जो इसकी प्रैक्टिस करते हैं। कानूनी शिक्षा का दायरा केवल धाराओं और अनुच्छेदों तक सीमित नहीं होना चाहिए।
युवा वकीलों को शॉर्टकट से बचने की सख्त सलाह
अपने संदेश के अंत में सीजेआई ने युवा वकीलों को आगाह करते हुए कहा कि वे करियर में आगे बढ़ने के लिए कभी भी शॉर्टकट का रास्ता न चुनें और अपने नैतिक मूल्यों से किसी भी कीमत पर समझौता न करें। उन्होंने कहा कि राष्ट्र और समाज को इन युवाओं से बहुत उम्मीदें हैं और इन्हें अपनी योग्यता का उपयोग समाज के सबसे कमजोर वर्ग को न्याय दिलाने के लिए करना चाहिए।












