मथुरा रोड पर पैदल यात्रियों की सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त
राजधानी दिल्ली की सड़कों पर आम नागरिकों की सुरक्षा को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर बेहद सख्त रुख अख्तियार किया है। सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठ जजों ने शुक्रवार को सुनवाई के दौरान दो टूक शब्दों में प्रशासनिक अधिकारियों को चेतावनी दी। अदालत ने साफ कर दिया कि यदि तय समय सीमा के भीतर सड़क सुरक्षा के इंतजाम पूरे नहीं किए गए, तो गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। मामला दिल्ली हाईकोर्ट जंक्शन और नेशनल जूलॉजिकल पार्क के पास स्थित बेहद व्यस्त और खतरनाक पैदल क्रॉसिंग का है, जहां रोजाना हजारों आम लोग, वकील और स्कूली बच्चे अपनी जान जोखिम में डालकर सड़क पार करने को मजबूर हैं।
सुनवाई कर रही बेंच ने प्रशासनिक सुस्ती और अधिकारियों के लचर रवैया पर गहरी नाराजगी जाहिर की। अदालत ने कहा कि बार-बार निर्देश दिए जाने के बावजूद जमीन पर कोई ठोस काम नजर नहीं आ रहा है। अधिकारियों के ढुलमुल रवैये से साफ है कि उन्हें आम जनता की सुरक्षा की कोई खास परवाह नहीं है, जिसे अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
'जब तक काम पूरा नहीं होगा, घर नहीं जाएंगे जज'
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने सुनवाई के दौरान बेहद सख्त लहजे में लेकिन तंज कसते हुए कहा कि अगर अगली सुनवाई से पहले सड़क सुधार का काम पूरा नहीं हुआ, तो वे दोनों जज खुद दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य गेट पर धरने पर बैठ जाएंगे। अदालत ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) विक्रमजीत बनर्जी से दो टूक कहा कि इस बार कोई बहाना नहीं चलेगा और उन्हें भी काम पूरा होने तक घर नहीं जाने दिया जाएगा।
अदालत की इस तीखी टिप्पणी ने प्रशासनिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। जजों ने कहा कि अब फाइलों पर चर्चा करने और कमेटियां बनाने का खेल बंद होना चाहिए। जमीन पर काम दिखना चाहिए ताकि आम जनता और वकीलों को सुरक्षित रास्ता मिल सके।
"अगर आप अगली तारीख से पहले यह काम नहीं करते हैं, तो हम दोनों दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य गेट पर पहुंच जाएंगे और तब तक घर नहीं जाएंगे, जब तक आप काम पूरा नहीं कर लेते। यह पक्का है। हम वहां धरने पर बैठ जाएंगे, और मिस्टर बनर्जी आपको भी घर नहीं जाने देंगे।" — सुप्रीम कोर्ट बेंच
हाई-लेवल कमेटी के नाम पर प्रशासनिक बहानों पर कड़ी फटकार
सुनवाई के दौरान जब एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि उच्च स्तर पर चर्चा के बाद इस मामले को देखने के लिए एक कमेटी बनाई गई है, तो बेंच का गुस्सा फूट पड़ा। अदालत ने सवाल किया कि इस छोटी सी और बुनियादी ट्रैफिक समस्या को ठीक करने के लिए आखिर किसी हाई-लेवल कमेटी की क्या आवश्यकता है।
पीठ ने तंज कसते हुए कहा कि क्या सरकार को इस काम के लिए कुछ खास इंजीनियरों की जरूरत है? कोर्ट ने सुझाव दिया कि बेहतर होगा कि मामले में अदालत की मदद कर रहे न्याय मित्र यानी अमिकस क्यूरी गौरव अग्रवाल को ही उस कमेटी में शामिल कर लिया जाए, क्योंकि वे जमीनी हकीकत और असल समस्या को अच्छी तरह समझते हैं।
25 नवंबर की डेडलाइन और अधिकारियों को अंतिम चेतावनी
सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मामले में एक कड़क डेडलाइन तय करते हुए अधिकारियों को चेताया है कि अब किसी भी तरह के प्रशासनिक बहाने या गोलमोल जवाब स्वीकार नहीं किए जाएंगे। अदालत ने स्पष्ट आदेश दिया है कि मथुरा रोड पर पैदल यात्रियों की सुरक्षा से जुड़े सभी जरूरी इंतजाम 25 नवंबर से पहले हर हाल में जमीन पर दिखने चाहिए।
न्यायालय ने यह भी चेतावनी दी कि यदि इस बार आदेश की अवहेलना हुई, तो संबंधित विभाग के मुख्य सचिव को भी व्यक्तिगत रूप से अदालत में तलब किया जाएगा। बता दें कि इससे पहले भी कई बार अदालत ने इस व्यस्त हिस्से पर ट्रैफिक की गति नियंत्रित करने, रेड लाइट लगाने और रंबल स्ट्रिप्स बनाने के निर्देश दिए थे, लेकिन कागजी कार्रवाई के सिवा धरातल पर खास काम नहीं हो पाया था। अब सबकी निगाहें 25 नवंबर को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं।











