सीआरपीएफ में तीन दशक बाद प्रशासनिक बदलाव की बड़ी तैयारी
देश के सबसे बड़े अर्धसैनिक बल केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) में निचले स्तर के जवानों के करियर को गति देने के लिए एक अहम प्रशासनिक कदम उठाया जा रहा है। बल के मुख्यालय ने करीब तीस साल पहले समाप्त किए जा चुके 'लांस नायक' और 'नायक' के सैन्य रैंकों को दोबारा बहाल करने का प्रस्ताव तैयार किया है। इस प्रस्ताव के तहत बल की सभी क्षेत्रीय इकाइयों और बटालियनों से कहा गया है कि वे अपने स्तर पर बैठकें आयोजित कर जवानों और अधिकारियों के विचार जुटाएं। इस पूरी प्रक्रिया को बेहद कम समय में पूरा करने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि जल्द से जल्द इस पर कोई ठोस निर्णय लिया जा सके।
लगभग 3.25 लाख जवानों की ताकत वाले इस बल में लंबे समय से यह महसूस किया जा रहा था कि निचले पायदान पर तैनात कर्मियों को पदोन्नति के पर्याप्त अवसर नहीं मिल पा रहे हैं। सिपाही के पद पर भर्ती होने वाले जवान को अपनी सेवा के शुरुआती दौर में कई वर्षों तक एक ही पद पर काम करना पड़ता है। इस ठहराव को तोड़ने और जवानों के भीतर उत्साह बनाए रखने के लिए ही इन दोनों मध्यवर्ती रैंकों को फिर से शुरू करने का विचार मुख्य रूप से सामने आया है।
वर्ष 1997 में समाप्त कर दिए गए थे ये दोनों सैन्य पद
इतिहास पर नजर डालें तो सीआरपीएफ और सीमा सुरक्षा बल जैसे केंद्रीय बलों में लांस नायक और नायक के पद काफी लंबे समय तक सेवा का हिस्सा रहे थे। हालांकि, गृह मंत्रालय द्वारा 10 अक्टूबर 1997 को एक आदेश जारी किया गया था, जिसके तहत इन दोनों रैंकों को समाप्त कर दिया गया था। उस समय वेतनमान और प्रशासनिक ढांचे को सरल बनाने की नीति के तहत लांस नायक के पद को सिपाही यानी कांस्टेबल और नायक के पद को हेड कांस्टेबल के दायरे में मिला दिया गया था।
इस बदलाव के बाद से निचले स्तर पर प्रमोशन का पूरा गणित बदल गया था। जवानों के पास सिपाही से सीधे हेड कांस्टेबल बनने के बीच कोई मध्यम स्तर का पद नहीं बचा था। इसके कारण पदोन्नति की प्रक्रिया काफी लंबी और जटिल हो गई थी, जिसकी टीस समय-समय पर जवानों और उनके संगठनों द्वारा उठाई जाती रही है। अब इतने लंबे अंतराल के बाद पुरानी व्यवस्था की वापसी की सुगबुगाहट से बल के भीतर सकारात्मक चर्चा शुरू हो गई है।
मौजूदा समय में पदोन्नति में लग जाते हैं 22 से 25 साल
वर्तमान स्थिति की बात करें तो सीआरपीएफ में कांस्टेबल के रूप में करियर की शुरुआत करने वाले एक जवान को अपना पहला प्रमोशन यानी हेड कांस्टेबल बनने के लिए औसतन 22 से 25 साल तक का लंबा इंतजार करना पड़ता है। इतने लंबे समय तक एक ही पद पर बने रहने के कारण जवानों के बीच निराशा और असंतोष की स्थिति भी पैदा होती रही है। सेवा के शुरुआती वर्षों में कोई बड़ी छलांग या प्रगति न होना मनोबल को प्रभावित करता है।
प्रस्तावित नई योजना के मुताबिक, यदि लांस नायक और नायक के पद वापस आते हैं, तो सेवाकाल के एक निश्चित अंतराल पर जवानों को चरणबद्ध तरीके से पदोन्नति मिलने का रास्ता साफ हो जाएगा। शुरुआती खाके के अनुसार, पांच साल की सेवा पूरी करने पर लांस नायक और दस साल की सेवा पर नायक का रैंक दिए जाने पर विचार चल रहा है। इससे हेड कांस्टेबल बनने से पहले ही जवानों को दो बार तरक्की का अहसास हो सकेगा और उनका मनोबल ऊंचा रहेगा।
सेना से रिटायर होने वाले अग्निवीरों के समायोजन में मिलेगी मदद
इस बड़े प्रशासनिक बदलाव के पीछे केवल आंतरिक पदोन्नति की समस्या का समाधान ही नहीं, बल्कि केंद्र सरकार की अन्य रक्षा नीतियों के साथ तालमेल बिठाना भी एक बड़ा कारण है। अग्निपथ योजना के तहत भारतीय सेना में चार साल की सेवा पूरी करने वाले अग्निवीरों का पहला बैच इसी साल के अंत से रिटायर होना शुरू हो जाएगा। इसके बाद ये युवा केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) में भर्ती के लिए पात्र होंगे।
सैन्य पृष्ठभूमि से आने वाले इन युवाओं के लिए सेना की तर्ज पर ही सीआरपीएफ में भी लांस नायक और नायक जैसी रैंक का होना एक सहज और अनुकूल माहौल तैयार करेगा। इससे अग्निवीरों को अर्धसैनिक बलों की कार्यप्रणाली में खुद को ढालने और अपने सैन्य अनुभवों का पूरा लाभ उठाने में आसानी होगी। बल के भीतर एकरूपता बनाए रखने की दिशा में इसे एक दूरदर्शी कदम के रूप में देखा जा रहा है।
फील्ड यूनिटों से मांगे गए सुझाव, अंतिम फैसले का इंतजार
सीआरपीएफ मुख्यालय द्वारा भेजे गए इस प्रस्ताव पर फिलहाल जमीनी स्तर पर मंथन का दौर जारी है। देश भर में तैनात कमांडेंट और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे सैनिकों के बीच सम्मेलन आयोजित कर उनकी राय जानें। पूर्व अर्धसैनिक कर्मियों और जानकारों का भी मानना है कि इस तरह के बदलाव केवल कागजी या नाममात्र के नहीं होने चाहिए, बल्कि इनसे वास्तव में जवानों के सेवाकाल पर सकारात्मक असर पड़ना चाहिए।
"जवानों को इन रैंकों की बहाली का वास्तविक लाभ तभी मिल सकेगा, जब पदोन्नति की प्रक्रिया पूरी तरह समयबद्ध और पारदर्शी हो। यदि रैंक जुड़ने के बाद भी प्रशासनिक देरी बनी रही, तो उद्देश्य पूरा नहीं होगा। बल के अनुशासन और कार्यकुशलता को ध्यान में रखते हुए ही अंतिम निर्णय लिया जाना चाहिए।"— रणबीर सिंह, महासचिव, पूर्व अर्धसैनिक कर्मी संगठन
फिलहाल यह पूरा मामला एक प्रस्ताव के रूप में संबंधित यूनिटों के पास भेजा गया है और सभी सेक्टरों से रिपोर्ट मांगी गई है। निर्धारित समय सीमा के भीतर सुझाव मिलने के बाद इन्हें सक्षम प्राधिकारी के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा, जिसके बाद ही इस पर अंतिम मुहर लगेगी। यदि इसे हरी झंडी मिलती है, तो यह पिछले तीन दशकों में सीआरपीएफ के संगठनात्मक ढांचे में होने वाला सबसे बड़ा सुधार साबित होगा।












