तेहरान में उन्नत तकनीकों और मजबूत रक्षा प्रणाली पर जोर
मध्य पूर्व में जारी भारी तनाव के बीच ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने देश की सुरक्षा और रक्षा क्षमताओं को लेकर बड़ा बयान दिया है। तेहरान के पास आयोजित एक उच्च स्तरीय शैक्षणिक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि ईरान को वैज्ञानिक और तकनीकी मोर्चे पर इतना आत्मनिर्भर होना चाहिए कि कोई भी बाहरी ताकत या दुश्मन देश उस पर आंख उठाने की हिम्मत न कर सके।
राष्ट्रपति पेजेश्कियन ने देश के युवा मानव संसाधन की सराहना करते हुए कहा कि ईरान ने मिसाइल निर्माण और अन्य उन्नत तकनीकों में उल्लेखनीय प्रगति की है। हालांकि, मौजूदा वैश्विक सुरक्षा माहौल को देखते हुए यह प्रयास नाकाफी हैं और देश को अपनी क्षमताओं को और अधिक ऊंचाई पर ले जाना होगा। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि देश के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए शिक्षा और तकनीकी प्रशिक्षण की रीढ़ को मजबूत करना बेहद जरूरी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ईरानी नेतृत्व का यह बयान ऐसे समय आया है जब पश्चिमी देशों के साथ उसके कूटनीतिक संबंध बेहद नाजुक दौर से गुजर रहे हैं। ईरान की कोशिश अपनी घरेलू जनता और वैश्विक समुदाय दोनों को यह संदेश देने की है कि वह किसी भी दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है और अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए हर संभव कदम उठाएगा।
अमेरिकी सेना द्वारा सबसे बड़े गैर-परमाणु बम के इस्तेमाल की चर्चा
अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी रक्षा हलकों में ईरान के ऊर्जा बुनियादी ढांचे और सुरक्षित परमाणु स्थलों को निशाना बनाने के लिए एक बड़े विकल्प पर विचार किया जा रहा है। अमेरिकी सेना के जखीरे में मौजूद सबसे बड़े गैर-परमाणु बम, जिसे 'जीबीयू-43/बी मैसिव ऑर्डनेंस एयर ब्लास्ट' (MOAB) कहा जाता है, के इस्तेमाल की चर्चा फिर तेज हो गई है।
इस बम को आम बोलचाल में 'मदर ऑफ ऑल बॉम्ब्स' भी कहा जाता है, जिसका वजन करीब 10 टन है। हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने स्पष्ट किया है कि यह कोई परमाणु हथियार नहीं है, लेकिन इसकी मारक क्षमता इतनी अधिक है कि यह जमीन के नीचे बने सुरक्षित ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचा सकता है। अमेरिकी सैन्य रणनीतिकार ईरान के भूमिगत परमाणु प्रतिष्ठानों को भेदने के लिए इस पारंपरिक विस्फोटक के उपयोग की संभावनाओं का आकलन कर रहे हैं।
सैन्य जानकारों का कहना है कि यदि अमेरिका इस तरह के किसी पारंपरिक बड़े बम का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ करता है, तो यह मौजूदा संघर्ष में एक बहुत बड़ा और खतरनाक मोड़ साबित होगा। इससे न केवल दोनों देशों के बीच सीधी सैन्य भिड़ंत का खतरा बढ़ेगा, बल्कि पूरे खाड़ी क्षेत्र में ऊर्जा आपूर्ति और शांति पर भी गहरा संकट मंडराने लगेगा।
ईरान के परमाणु कार्यक्रमों और यूरेनियम संवर्धन पर वैश्विक चिंताएं
एक तरफ जहां अमेरिकी और पश्चिमी देश ईरान की परमाणु गतिविधियों को लेकर लगातार संशय में हैं, वहीं तेहरान ने दोटूक शब्दों में साफ कर दिया है कि वह अपने परमाणु वैज्ञानिक कार्यक्रमों से पीछे हटने वाला नहीं है। ईरान के परमाणु ऊर्जा संगठन के प्रमुख मोहम्मद इस्लामी ने हाल ही में घोषणा की है कि बाहरी दबाव और कड़े प्रतिबंध तेहरान की वैज्ञानिक प्रगति को नहीं रोक सकते।
तेहरान का दावा है कि उसने परमाणु विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विभिन्न क्षेत्रों में विकसित देशों के बराबर तकनीकी दक्षता हासिल कर ली है। इसके अलावा, ईरान यूरेनियम संवर्धन की प्रक्रिया को छोड़ने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है, क्योंकि इसे देश के औद्योगिक और ऊर्जा भविष्य के लिए अनिवार्य माना जाता है।
दूसरी ओर, पश्चिमी खुफिया एजेंसियों की सैटेलाइट तस्वीरों में ईरान के कुछ प्रमुख परमाणु ठिकानों और पहाड़ी क्षेत्रों के आसपास पुनर्निर्माण की तेज गतिविधियों को देखा गया है। इससे अमेरिका और इजराइल की चिंताएं काफी बढ़ गई हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि ईरान परमाणु हथियार विकसित करने की अपनी तकनीकी क्षमता को अंतिम रूप देने के करीब पहुंच रहा है।
एनपीटी से बाहर निकलने की मांग और घरेलू राजनीतिक हलचल
ईरान के भीतर भी रणनीतिक नीतियों को लेकर आंतरिक बहस तेज हो गई है। हाल ही में देश के लगभग बत्तीस प्रभावशाली सांसदों और पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों ने ईरानी संसद को एक औपचारिक पत्र सौंपा है। इस पत्र में मांग की गई है कि संसद को तत्काल एक आपातकालीन विधेयक लाना चाहिए जिसके तहत ईरान को 'परमाणु अप्रसार संधि' (NPT) से बाहर कर दिया जाए।
पत्र लिखने वाले इन प्रभावशाली नेताओं का तर्क है कि मौजूदा सुरक्षा चुनौतियों और इजराइल की आक्रामक नीतियों के सामने पारंपरिक कूटनीति अब पर्याप्त नहीं रह गई है। हालांकि, ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेतृत्व और फतवों का हवाला देते हुए कुछ धड़े परमाणु हथियारों के पूर्ण विकास पर रोक का समर्थन भी करते आए हैं, लेकिन बदलते क्षेत्रीय समीकरणों के कारण अब देश के भीतर नीतिगत बदलाव की मांग जोर पकड़ती जा रही है।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि यदि ईरान एनपीटी से बाहर निकलने जैसा कोई कदम उठाता है, तो संयुक्त राष्ट्र और पश्चिमी देश उस पर और अधिक कठोर आर्थिक प्रतिबंध लगा सकते हैं। इसके बावजूद, ईरान के भीतर एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि देश की रक्षा और क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने के लिए अब कड़े फैसले लेने का समय आ गया है।
युद्ध के आठवें महीने में अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और भविष्य की आशंकाएं
वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य में अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा गतिरोध अब आठवें महीने में प्रवेश कर चुका है। संयुक्त राष्ट्र और आर्मेनिया जैसे देशों की मध्यस्थता के बावजूद दोनों पक्षों के बीच भरोसे की भारी कमी साफ दिखाई देती है। ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने बार-बार यह दोहराया है कि तेहरान बातचीत और कूटनीतिक संवाद के जरिए समाधान निकालने के लिए तैयार है, बशर्ते वाशिंगटन धमकियों और प्रतिबंधों की भाषा का इस्तेमाल बंद करे।
आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प और चिंताजनक होगा कि क्या अमेरिका अपने सबसे बड़े पारंपरिक हथियारों के जरिए ईरान पर कोई बड़ा सैन्य हमला करता है या दोनों देश कूटनीतिक टेबल पर किसी समझौते पर पहुंचते हैं। मध्य पूर्व की यह सुलगती आग पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था और तेल बाजार को बुरी तरह प्रभावित कर सकती है, जिससे दुनिया भर की निगाहें तेहरान और वाशिंगटन के अगले कदमों पर टिकी हुई हैं।
"हम तकनीकी विकास के रास्ते पर लगातार आगे बढ़ रहे हैं और हमारी कोशिश ऐसी व्यवस्था बनाने की है जिससे देश पर कोई आंख उठाने की हिम्मत न करे।" — मसूद पेजेश्कियन, राष्ट्रपति, ईरान












