देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET (UG) में 'पेपर लीक' और धांधली की समस्याओं से हमेशा के लिए निजात पाने के लिए एक बड़ा और क्रांतिकारी फॉर्मूला सामने आया है। इन्फोसिस के सह-संस्थापक और जाने-माने टेक्नोलॉजी एक्सपर्ट नंदन नीलेकणि की अध्यक्षता वाली हाई-लेवल कमेटी ने परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह सुरक्षित बनाने के लिए नए सुझाव दिए हैं।
पेपर लीक के ब्लैक मार्केट पर कसेगा शिकंजा
कमेटी का मुख्य तर्क यह है कि जब तक बाजार में परीक्षा से हफ्ते-दस दिन पहले एक तय क्वेश्चन पेपर मौजूद रहेगा, तब तक उसे चुराने और बेचने का 'आर्थिक लालच' बना रहेगा। पारंपरिक परीक्षा प्रणाली में क्वेश्चन पेपर हफ्तों पहले तैयार होता है, प्रिंट होता है और फिर लंबी सप्लाई चेन से गुजरता है। इस दौरान लीक होने की आशंका हमेशा बनी रहती है। नीलेकणि कमेटी चाहती है कि टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके इस टाइम-गैप को शून्य कर दिया जाए ताकि माफिया के पास लीक करने के लिए कोई एक तय पेपर बचे ही नहीं।
क्या हैं नंदन नीलेकणि कमेटी के मुख्य सुझाव?
- विशाल क्वेश्चन बैंक: परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसी हजारों-लाखों कठिन और मानक प्रश्नों का एक विशाल डेटाबेस तैयार रखेगी।
- लास्ट-मिनट AI पेपर जेनरेशन: परीक्षा शुरू होने से ठीक कुछ समय पहले आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) या रैंडम एल्गोरिदम के जरिए उस विशाल डेटाबेस में से प्रश्न चुनकर एक नया और फ्रेश क्वेश्चन पेपर ऑटो-जनरेट किया जाएगा।
- सीबीटी मोड का विस्तार: पेन-पेपर ओएमआर (OMR) मोड के बजाय देशभर में कंप्यूटर-बेस्ड टेस्ट (CBT) सेंटर्स के नेटवर्क को 1.5 लाख से भी आगे बढ़ाने पर जोर दिया जाएगा।
छात्रों के लिए क्या होंगे फायदे और चुनौतियां?
इस व्यवस्था के लागू होने से पेपर लीक और रद्दी खरीद-फरोख्त पूरी तरह बंद हो जाएगी, जिससे योग्य छात्रों को पूरा न्याय मिलेगा। हालांकि, इसके साथ कुछ बड़ी तकनीकी चुनौतियां भी जुड़ी हैं। 23 लाख से अधिक नीट अभ्यर्थियों के लिए एक साथ सुरक्षित कंप्यूटर नेटवर्क बनाना एक बड़ा लॉजिस्टिक चैलेंज है। इसके अलावा, सर्वर क्रैश होने या सॉफ्टवेयर में गड़बड़ी होने का जोखिम भी बना रहेगा। भारत ने पहले भी आधार, यूपीआई और कोविन जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म सफलतापूर्वक बनाए हैं, ऐसे में इस तकनीक को सही दिशा में लागू करना देश की शिक्षा व्यवस्था के लिए एक मील का पत्थर साबित हो सकता है।
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