नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश के कई हिस्सों में इस समय धान भंडारण यानी 'धान्य निल्लवा' को लेकर चर्चा तेज हो गई है। गूगल ट्रेंड्स पर अचानक इस विषय पर खोज बढ़ जाने के बाद हमने इसकी जमीनी हकीकत टटोलनी शुरू की। किसानों की मेहनत से तैयार फसल को सुरक्षित रखने के लिए गोदामों में जगह की भारी कमी एक बड़ा मुद्दा बनती जा रही है। पिछले कुछ हफ्तों में सरकारी खरीद केंद्रों पर उपज की आवक बहुत तेज हुई है। इसके चलते मौजूदा भंडारण क्षमता पर भारी दबाव देखा जा रहा है।
हमारी टीम ने जब इस विषय पर गहराई से पड़ताल की तो सामने आया कि केवल एक राज्य नहीं बल्कि कई प्रमुख कृषि राज्यों में यही स्थिति बनी हुई है। किसानों को अपनी फसल खुले आसमान के नीचे या मंडियों में अस्थायी तिरपाल के सहारे रखनी पड़ रही है। मौसम के बदलते मिजाज को देखते हुए किसानों की चिंताएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। यदि समय रहते धान को सुरक्षित गोदामों में नहीं पहुंचाया गया तो भारी नुकसान की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है।
गोदामों में जगह की कमी से क्यों बढ़ रही है परेशानी?
जमीनी स्तर पर स्थिति यह है कि पुराने सीजन का अनाज अभी भी कई बड़े गोदामों में भरा हुआ है। खाद्यान्न का सुरक्षित उठाव समय पर न होने के कारण नए धान के लिए जगह नहीं बच पा रही है। भारतीय खाद्य निगम और राज्य की एजेंसियों के सामने यह एक बड़ी चुनौती के रूप में खड़ा है। अधिकारी लगातार नए भंडारण स्थलों की तलाश कर रहे हैं। प्राइवेट वेयरहाउस और साइलो तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है ताकि अनाज सड़े नहीं।
किसानों का कहना है कि वे अपनी फसल को लेकर मंडियों में पहुंच रहे हैं लेकिन वहां तौल और बोरियों की भी कमी खल रही है। कई जगहों पर किसानों को अपनी बारी के लिए कई-कई दिनों तक इंतजार करना पड़ रहा है। खुले में पड़े धान पर बारिश या ओलावृष्टि का खतरा मंडरा रहा है। स्थानीय प्रशासन ने हालांकि यह दावा किया है कि धान को सुरक्षित रखने के लिए हरसंभव कदम उठाए जा रहे हैं और युद्ध स्तर पर काम चल रहा है।
सरकार और प्रशासन के सामने क्या हैं बड़े विकल्प?
इस पूरे मामले पर प्रशासनिक हलकों में बैठकों का दौर लगातार जारी है। सरकार का मुख्य जोर यह सुनिश्चित करना है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर आने वाले धान का एक-एक दाना सुरक्षित रखा जाए। इसके लिए रेलवे के माध्यम से अनाज को दूसरे राज्यों में भेजने की योजना भी तेजी से लागू की जा रही है। परिवहन की व्यवस्था को दुरुस्त करने के निर्देश दिए गए हैं ताकि गोदामों से पुराना अनाज समय पर बाहर निकाला जा सके।
आम जनता और खासकर किसान वर्ग इस स्थिति पर पैनी नजर बनाए हुए है। किसानों का सीधा सवाल है कि हर साल फसल कटाई के वक्त ही भंडारण की समस्या क्यों सामने आती है। विशेषज्ञों का मानना है कि देश में दीर्घकालिक कृषि बुनियादी ढांचे को और मजबूत करने की सख्त जरूरत है। जब तक भंडारण की क्षमता में भारी इजाफा नहीं किया जाएगा, तब तक इस समस्या से स्थाई राहत मिलना मुश्किल है।
भविष्य की रणनीति और द फ्रीलान्स की अंतिम पड़ताल
द फ्रीलान्स की टीम की पड़ताल यह बताती है कि आने वाले दिनों में यदि बारिश या आंधी आती है तो स्थिति और बिगड़ सकती है। हालांकि कृषि मंत्रालय के अधिकारी लगातार हालात पर नजर रखे हुए हैं और जिलों से रोज रिपोर्ट मंगाई जा रही है। डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम के जरिए यह देखा जा रहा है कि किस मंडी में कितना धान आ रहा है और उसे कहां भेजा जा रहा है। कुल मिलाकर, किसानों की मेहनत और देश के खाद्य सुरक्षा चक्र को बचाने के लिए यह परीक्षा की घड़ी है।











