तिहाड़ जेल की अलग-अलग बैरकों में रखे गए दोनों नेता
राजधानी दिल्ली के बहुचर्चित जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान तिरंगा फहराने के मामले में गिरफ्तार किए गए सिविल राइट्स जस्टिस पार्टी (सीजेपी) के नेता आशुतोष रांका और सौरव दास को तिहाड़ जेल के उच्च सुरक्षा वाले वार्डों में भेज दिया गया है। जेल प्रशासन से मिली प्राथमिक जानकारी के मुताबिक, दोनों नेताओं को अलग-अलग बैरकों में रखा गया है ताकि किसी भी तरह की अप्रिय स्थिति से बचा जा सके। सुरक्षा व्यवस्था को और पुख्ता करने के लिए उनकी सेल के बाहर अतिरिक्त सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की गई है।
अदालत ने दोनों आरोपियों को पांच दिनों की न्यायिक हिरासत में तिहाड़ भेजा है। जेल मैनुал के अनुसार, आशुतोष रांका को कैदी नंबर 1784 और सौरव दास को कैदी नंबर 3752 आवंटित किया गया है। शुरुआत में दोनों को एक ही जेल नंबर दो में रखने की बात सामने आई थी, लेकिन बाद में सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए आशुतोष रांका को जेल नंबर चार में शिफ्ट कर दिया गया। इन दोनों बैरकों में सामान्य कैदियों की तुलना में भीड़भाड़ कम है और विशेष सुरक्षा घेरा तैयार किया गया है।
सीसीटीवी कैमरों से 24 घंटे हो रही सख्त निगरानी
जेल के उच्च पदस्थ सूत्रों ने पुष्टि की है कि सौरव दास और आशुतोष रांका की कोठरियों के भीतर और बाहर हाई-डेफिनिशन सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। इन कैमरों के जरिए कंट्रोल रूम से 24 घंटे उनकी हर गतिविधि पर नजर रखी जा रही है। जेल प्रशासन का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वे किसी भी तरह से खुद को नुकसान न पहुँचा सकें या आत्महत्या का प्रयास न करें।
तिहाड़ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि इन दोनों कैदियों के आसपास किसी भी दूसरे वार्ड के कैदी को फटकने की अनुमति नहीं दी जा रही है। जेल प्रशासन ने यह भी सुनिश्चित किया है कि वे अन्य विचाराधीन या सजायाफ्ता कैदियों के संपर्क में न आ सकें। मुलाकात के नियमों का भी कड़ाई से पालन कराया जा रहा है और केवल अधिकृत लोगों को ही तय प्रक्रिया के तहत मिलने की अनुमति दी जा रही है।
जेल नंबर दो और चार का रहा है पुराना इतिहास
दिलचस्प बात यह है कि सौरव दास को उसी जेल नंबर दो में रखा गया है जहाँ अतीत में कई हाई-प्रोफाइल कैदियों को रखा जा चुका है। इसी जेल में कड़े सुरक्षा पहरे के बीच उमर खालिद और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी बंद रहे हैं। वहीं, आशुतोष रांका को जेल नंबर चार में रखा गया है, जिसके एक हिस्से का इस्तेमाल पहले विपश्यना ध्यान केंद्र के रूप में होता था और यहाँ कुख्यात हथियार डीलर अभिषेक वर्मा को भी रखा गया था।
कानूनी जानकारों और तिहाड़ प्रशासन के बीच इस बात की चर्चा है कि इस तरह के संवेदनशील मामलों में आरोपियों को अलग-थलग रखना सुरक्षा के लिहाज से एक सामान्य प्रक्रिया है। पुलिस का यह भी कहना है कि बार-बार चेतावनी दिए जाने के बावजूद दोनों नेता सार्वजनिक शांति भंग करने और कानून को अपने हाथ में लेने की कोशिश कर रहे थे, जिसके चलते यह कानूनी कार्रवाई जरूरी हो गई थी।
राजनीतिक हलचल और विपक्ष की तीखी प्रतिक्रिया
इन दोनों नेताओं की गिरफ्तारी और तिहाड़ में नजरबंदी को लेकर राष्ट्रीय राजधानी की राजनीति गरमा गई है। विपक्षी दलों के नेताओं ने सरकार के इस कदम की कड़ी आलोचना की है। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रख रहे युवाओं और कार्यकर्ताओं की आवाज़ को दबाने के लिए प्रशासनिक मशीनरी का दुरुपयोग किया जा रहा है।
दूसरी ओर, सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और केंद्र सरकार के नुमाइंदों ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। सरकार का पक्ष है कि प्रदर्शन की आड़ में सुनियोजित तरीके से अराजकता फैलाने और व्यवस्था को चुनौती देने का प्रयास किया जा रहा था। कानून अपना काम कर रहा है और शांति व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकता है।
"कानून व्यवस्था से खिलवाड़ करने वालों और बार-बार चेतावनी के बावजूद शांति भंग करने की कोशिश करने वालों के खिलाफ नियमों के अनुसार सख्त कानूनी कार्रवाई की जा रही है। तिहाड़ जेल के भीतर सभी जरूरी सुरक्षा मानक और प्रोटोकॉल पूरी तरह से लागू किए गए हैं।" — वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, दिल्ली पुलिस
मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे और एसआईआर को लेकर उठा था विवाद
यह पूरा विवाद उस समय शुरू हुआ जब जंतर-मंतर पर विभिन्न छात्र संगठनों और राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं ने मार्च निकाला। ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) और सीजेपी से जुड़े प्रदर्शनकारियों ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की थी। इसके साथ ही मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े नए अधिनियम को तुरंत वापस लेने की पुरजोर मांग उठाई गई थी।











