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कर्नाटक हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, पचास प्रतिशत से ज्यादा एससी-एसटी आरक्षण का कोटा रद्द

कर्नाटक हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को बड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने एससी और एसटी जातियों के लिए आरक्षण को पचास प्रतिशत की कानूनी सीमा से ऊपर बढ़ाने वाले फैसले को पूरी तरह खारिज और असंवैधानिक करार दिया है।
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नेशनल डेस्क, द फ्रीलांस
राष्ट्रीय संपादकीय ब्यूरो•15 अक्टूबर 2026 • अपडेटेड•27
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कर्नाटक हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, पचास प्रतिशत से ज्यादा एससी-एसटी आरक्षण का कोटा रद्द
📷 कर्नाटक हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, पचास प्रतिशत से ज्यादा एससी-एसटी आरक्षण का कोटा रद्द — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • कर्नाटक हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को बड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने एससी और एसटी जातियों के लिए आरक्षण को पचास प्रतिशत की कानूनी सीमा से ऊपर बढ़ाने वाले फैसले को पूरी तरह खारिज और असंवैधानिक करार दिया है।
  • इस खबर से जुड़े सभी पहलुओं की जांच और निगरानी संबंधित विभागों द्वारा की जा रही है।
  • विशेषज्ञों के अनुसार इस घटनाक्रम का आम जनता पर सीधा असर पड़ सकता है।

बेंगलुरु/ग्राउंड ब्यूरो — कर्नाटक की राजनीति और कानूनी गलियारों में इस समय एक बड़ा भूचाल आ गया है। कर्नाटक हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के एक बेहद अहम फैसले को गैरकानूनी करार देते हुए रद्द कर दिया है। अदालत ने अनुसूचित जाति यानी एससी और अनुसूचित जनजाति यानी एसटी के लिए कोटे की सीमा को पचास प्रतिशत से ज्यादा बढ़ाने के सरकार के फैसले को खारिज किया है। हाई कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि आरक्षण की पचास प्रतिशत की तय सीमा को लांघना संविधान के नियमों के खिलाफ है। इस फैसले के बाद से राज्य की राजनीति में हलचल तेज हो गई है और सरकार के सामने एक नई कानूनी चुनौती खड़ी हो गई है।

यह पूरा मामला पिछली सरकारों के कार्यकाल से जुड़ा हुआ है जब राज्य में एससी और एसटी समुदायों का आरक्षण बढ़ाने की मांग बहुत जोर पकड़ रही थी। राजनीतिक दलों ने इस दिशा में कदम उठाते हुए कोटे की सीमा को बढ़ाने का फैसला लिया था ताकि अधिक से अधिक युवाओं और परिवारों को इसका लाभ मिल सके। लेकिन इस फैसले को अदालत में चुनौती दी गई थी जिस पर लंबी सुनवाई चली। अदालत ने सभी पक्षों की दलीलें सुनीं और कानूनी पहलुओं की गहराई से जांच की। इसके बाद कोर्ट ने यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया जिससे यह साफ हो गया कि पचास प्रतिशत की सीमा को कानूनी तौर पर पार नहीं किया जा सकता है।

आरक्षण की पचास प्रतिशत की सीमा पर अदालत की कड़ी टिप्पणी

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में इस बात पर जोर दिया कि देश का संविधान सामाजिक न्याय के साथ-साथ समानता के अधिकार पर भी पूरा जोर देता है। अदालत ने कहा कि आरक्षण का दायरा किसी भी सूरत में पचास प्रतिशत की तय सीमा से ऊपर नहीं जा सकता है। अगर इस सीमा को तोड़ा जाता है तो यह दूसरे वर्गों के अधिकारों के खिलाफ होगा। अदालत की इस सख्त टिप्पणी से यह साफ हो गया है कि सरकारें जनभावनाओं के नाम पर संविधान की तय लक्ष्मण रेखा को पार नहीं कर सकती हैं। कानूनी जानकारों का मानना है कि अदालत के इस फैसले का असर देश के दूसरे राज्यों में चल रही ऐसी ही आरक्षण बहसों पर भी पड़ सकता है।

दूसरी ओर, कर्नाटक सरकार के भीतर इस फैसले को लेकर मंथन शुरू हो गया है। मुख्यमंत्री और उनके वरिष्ठ मंत्रियों के बीच दिल्ली और बेंगलुरु में लगातार बैठकों का दौर जारी है। सरकार अब इस बात पर विचार कर रही है कि हाई कोर्ट के इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया जाए या नहीं। राज्य के मंत्रियों का कहना है कि वे इस फैसले का गहराई से अध्ययन कर रहे हैं ताकि आदिवासी और दलित समुदायों के हितों की रक्षा का कोई दूसरा कानूनी रास्ता निकाला जा सके। सरकार के सामने इस समय अपने राजनीतिक वादों को बचाने और अदालत के आदेश का पालन करने के बीच संतुलन बनाने की बड़ी चुनौती आ गई है।

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राजनीतिक गलियारों में मचा हड़कंप और विरोधियों के तीखे हमले

हाई कोर्ट के इस फैसले के आते ही राज्य में राजनीतिक दलों के बीच बयानों की बौछार शुरू हो गई है। विपक्षी दलों ने मौजूदा सरकार को घेरना शुरू कर दिया है और आरोप लगाया है कि सरकार ने बिना पुख्ता कानूनी तैयारी के सिर्फ राजनीतिक फायदे के लिए यह फैसला लिया था। विपक्षी नेताओं का कहना है कि सरकार को पहले ही पता था कि पचास प्रतिशत की सीमा को अदालत में चुनौती मिल सकती है लेकिन इसके बावजूद जनता को गुमराह करने के लिए यह कदम उठाया गया। इस तीखी बयानबाजी के चलते राज्य का राजनीतिक माहौल काफी गर्म हो गया है और आने वाले दिनों में इसके बड़े सामाजिक और राजनीतिक परिणाम देखने को मिल सकते हैं।

आम जनता और आरक्षित वर्गों के युवाओं के बीच भी इस फैसले को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। जिन छात्रों और नौकरीपेशा युवाओं को इस बढ़े हुए कोटे के तहत उम्मीदें बंध रही थीं, वे अब खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। युवाओं का कहना है कि सरकारों को अदालतों में टिकने वाले ठोस फैसले लेने चाहिए ताकि बार-बार कानूनी पेंच में फंसकर उनका भविष्य अधर में न लटके। दूसरी तरफ, सामान्य वर्ग के लोग इस फैसले को संविधान की जीत बता रहे हैं। द फ्रीलान्स की टीम इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए हुए है और आने वाले हर नए कानूनी कदम की सटीक जानकारी आप तक पहुंचाती रहेगी।

सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी और आगे की कानूनी राह

इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि कर्नाटक सरकार सुप्रीम कोर्ट में किस तरह अपनी बात रखती है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार को इस कोटे को बचाना है तो उसे अदालत में बहुत मजबूत और ठोस आंकड़े पेश करने होंगे जो यह साबित कर सकें कि इन समुदायों को विशेष और अतिरिक्त सुरक्षा की सख्त जरूरत क्यों है। राज्य सरकार के महाधिवक्ता और वरिष्ठ वकीलों की टीम सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाखिल करने की तैयारियों में जुट गई है। आने वाले हफ्तों में इस मामले पर देश की सबसे बड़ी अदालत में होने वाली सुनवाई बेहद अहम साबित होगी।

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