अक्सर जिन लोगों को बार-बार पेशाब आने की समस्या होती है, वे इस बात को लेकर सबसे बड़े भ्रम में रहते हैं कि यह डायबिटीज का संकेत है या प्रोस्टेट से जुड़ी कोई गंभीर बीमारी। कुछ लोग तो इसे सीधे प्रोस्टेट कैंसर से भी जोड़कर देखते हैं, जिससे अनावश्यक चिंता बढ़ जाती है। लेकिन इन लक्षणों के पीछे असली कारण क्या होता है? कब यह समस्या खतरनाक हो सकती है और कब इसे सामान्य माना जा सकता है? इन महत्वपूर्ण सवालों के जवाब जानने के लिए 'The Freelance' ने विशेषज्ञ से खास बातचीत की है।
डायबिटीज या प्रोस्टेट: लक्षणों में अंतर और समानता
सफदरजंग अस्पताल और VMMC के यूरोलॉजी विभाग के हेड प्रोफेसर (डॉ.) अनूप कुमार ने दिल्ली में आयोजित 'सोसाइटी ऑफ़ रोबोटिक सर्जरी (SRS) इंडिया 2026' इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में जानकारी देते हुए बताया कि डायबिटीज में ब्लड शुगर का स्तर बढ़ने पर शरीर अतिरिक्त ग्लूकोज को यूरिन के रास्ते बाहर निकालने का प्रयास करता है। यह प्रक्रिया शरीर में तरल पदार्थों के संतुलन को बिगाड़ देती है, जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति को बार-बार और अधिक मात्रा में पेशाब आता है। इसे पॉलीडिप्सिया (अधिक प्यास) और पॉल्यूरिया (अधिक पेशाब) के नाम से जाना जाता है।
वहीं, पुरुषों में उम्र बढ़ने के साथ प्रोस्टेट ग्रंथि का आकार स्वाभाविक रूप से बढ़ने लगता है, जिसे बिनाइन प्रोस्टेटिक हाइपरप्लासिया (BPH) कहते हैं। जब प्रोस्टेट का आकार बढ़ता है, तो वह मूत्रमार्ग (पेशाब की नली) पर दबाव डाल सकता है। इस दबाव के कारण पेशाब की धार कमजोर होना, पेशाब शुरू करने में परेशानी होना, बार-बार पेशाब आना (खासकर रात में कई बार उठना) और पेशाब करने के बाद मूत्राशय पूरी तरह खाली न होने का एहसास जैसी दिक्कतें हो सकती हैं।
डॉ. कुमार ने स्पष्ट किया कि हालांकि ये लक्षण बेहद परेशान करने वाले हो सकते हैं, लेकिन इसका मतलब सीधे प्रोस्टेट कैंसर नहीं है। प्रोस्टेट कैंसर और सामान्य प्रोस्टेट बढ़ने (BPH) के लक्षण कई बार एक जैसे दिख सकते हैं। इसलिए केवल लक्षणों के आधार पर यह अनुमान लगाना कि व्यक्ति को प्रोस्टेट कैंसर है, गलत है। इसके लिए मेडिकल जांच बहुत जरूरी है।
कब हो जाएं सतर्क और कौन सी हैं जरूरी जांचें?
डॉ. अनूप कुमार के मुताबिक, किसी भी समस्या को सही ढंग से समझने के लिए डॉक्टर मरीज की पूरी मेडिकल हिस्ट्री, उसके लक्षणों और जीवनशैली से जुड़ी आदतों पर ध्यान देते हैं। इसके साथ ही कुछ जरूरी जांचें भी कराई जाती हैं। इनमें प्रोस्टेट स्पेसिफिक एंटीजन (PSA) ब्लड टेस्ट, सामान्य यूरिन टेस्ट और ब्लड शुगर की जांच शामिल हो सकती है। PSA टेस्ट प्रोस्टेट से संबंधित समस्याओं का पता लगाने में सहायक होता है, हालांकि केवल PSA का बढ़ा हुआ स्तर कैंसर का एकमात्र प्रमाण नहीं होता। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर प्रोस्टेट की डिजिटल रेक्टल एग्जामिनेशन (DRE), अल्ट्रासाउंड या अन्य इमेजिंग जांचों की सलाह भी दे सकते हैं ताकि समस्या की जड़ तक पहुंचा जा सके।
डॉक्टर ने यह भी बताया कि पिछले कुछ वर्षों में भारत में संक्रामक बीमारियों के मुकाबले डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और किडनी से जुड़ी बीमारियों का बोझ काफी बढ़ा है। चिंताजनक बात यह भी है कि कम उम्र में ही कैंसर के मामले सामने आ रहे हैं। इसके पीछे बदलती जीवनशैली, शराब का सेवन, धूम्रपान और बढ़ते प्रदूषण जैसे कई जोखिम कारक भूमिका निभा सकते हैं। उनका मानना है कि अब कैंसर फैलाने वाले जीन भी बढ़ रहे हैं, जो कम उम्र में कैंसर का एक कारण हो सकता है।
डॉ. अनूप कुमार कहते हैं कि ऐसे लक्षणों में घबराने के बजाय सबसे महत्वपूर्ण कदम यह है कि समय रहते किसी अनुभवी यूरोलॉजिस्ट से सलाह ली जाए। उनका कहना है कि भारत में इन बीमारियों के इलाज के लिए आधुनिक और प्रभावी विकल्प उपलब्ध हैं। सही समय पर बीमारी की पहचान होने के बाद उसका उचित इलाज संभव है, जिससे मरीज को एक बेहतर और सामान्य जीवन जीने में मदद मिल सकती है।
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