प्रशासनिक सेवा को अलविदा कहकर राजनीति के मैदान में उतरीं दिव्या मित्तल
भारतीय प्रशासनिक सेवा यानी आईएएस की नौकरी छोड़कर चर्चा में आईं दिव्या मित्तल ने अब अपने भविष्य के राजनीतिक सफर को लेकर तमाम अटकलों पर खुद ही विराम लगा दिया है। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक वीडियो जारी कर इस बात की आधिकारिक जानकारी दी है कि वह अब देश की मुख्यधारा की राजनीति में कदम रख रही हैं। उनकी इस घोषणा के बाद से राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं क्योंकि उन्होंने किसी भी पारंपरिक दल के साथ जुड़ने से साफ इनकार कर दिया है।
दिव्या मित्तल ने करीब 13 वर्षों तक प्रशासनिक पदों पर अपनी सेवाएं दी थीं। अगस्त महीने के आखिर में उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था जो सितंबर के मध्य में औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया गया था। नौकरी छोड़ने के बाद से ही यह सवाल बना हुआ था कि क्या वह सियासत में एंट्री लेंगी या किसी अन्य क्षेत्र में जाएंगी। अब उन्होंने अपना रुख बिल्कुल साफ कर दिया है और जनता के बीच जाकर काम करने का संकल्प लिया है।
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उत्तर प्रदेश से होगी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत
अपने वीडियो संदेश में पूर्व आईएएस अधिकारी ने स्पष्ट किया कि उनकी राजनीतिक शुरुआत उत्तर प्रदेश की धरती से ही होगी। उन्होंने कहा कि यह प्रदेश सिर्फ उनका कार्यक्षेत्र नहीं रहा, बल्कि यहां के लोगों ने उन्हें परिवार का हिस्सा माना है। उन्होंने शिक्षकों, डॉक्टरों, किसानों, मजदूरों, वकीलों और छात्रों से अपील की है कि वे इस बदलाव की मुहिम में उनके साथ जुड़ें।
उन्होंने एक नया नारा भी दिया है जिसका शीर्षक ‘चलिए हिसाब मांगते हैं’ रखा गया है। उनका कहना है कि अब समय आ गया है कि जनता दशकों से चली आ रही व्यवस्था से सवाल पूछे और अपने बुनियादी अधिकारों का हिसाब ले। उनका यह वीडियो सोशल मीडिया पर काफी तेजी से वायरल हो रहा है और लोग इस पर अपनी तरह से प्रतिक्रिया दे रहे हैं।
किसी भी राजनीतिक दल का हिस्सा नहीं बनने का कड़ा फैसला
पारंपरिक राजनीति से अलग राह चुनते हुए दिव्या मित्तल ने ऐलान किया है कि वह किसी भी राजनीतिक दल के साथ नहीं जाएंगी। उन्होंने कहा कि जिन झंडों के तले पिछले कई दशकों में व्यवस्था नहीं बदली, उनके नीचे खड़े होकर कभी भी सही मायनों में जवाबदेही तय नहीं की जा सकती है। वह जनता के साथ मिलकर एक स्वतंत्र मंच तैयार करेंगी जो पूरी तरह से आम आदमी के मुद्दों पर आधारित होगा।
उन्होंने जाति और धर्म के समीकरणों पर भी खुलकर बात की। उनका कहना था कि उन्होंने अपने प्रशासनिक कार्यकाल के दौरान कभी भी किसी का नाम पूछकर न्याय नहीं किया। देश के विकास में बाधक बन रहे पुराने तौर-तरीकों को छोड़कर अब जनता को खुद आगे आना होगा क्योंकि बदलाव के लिए किसी बाहरी मसीहा का इंतजार करने का वक्त अब बीत चुका है।
नौकरी छोड़ने के बाद क्या मिलती रहेगी पेंशन?
जब से दिव्या मित्तल ने प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा दिया है, तब से एक बड़ा सवाल यह भी उठ रहा था कि क्या एक राजनेता या नई भूमिका में आने के बाद उन्हें आईएएस अधिकारी के रूप में मिलने वाली पेंशन का लाभ जारी रहेगा या नहीं। प्रशासनिक और कानूनी नियमों के जानकारों के अनुसार, जब कोई अधिकारी अपनी स्वेच्छा से सेवा से त्यागपत्र देता है, तो उसकी पुरानी सेवा की गणना शून्य मान ली जाती है।
अखिल भारतीय सेवा से जुड़े नियमों के तहत, इस्तीफा देने वाले अधिकारी की सेवा की निरंतरता समाप्त हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप, उन्हें भविष्य में किसी भी प्रकार की सेवानिवृत्ति पेंशन या अन्य सरकारी लाभ पाने का अधिकार नहीं रहता है। दिव्या मित्तल ने इन सभी कानूनी पहलुओं को भली-भांति समझते हुए ही प्रशासनिक सेवा से पूरी तरह मुक्त होने का यह बड़ा कदम उठाया है।
"मुझे आवाज बनना है, आवाज उठाकर वंचित लोगों की आवाज बनूंगी। राजनीति बदलनी होगी, इरादे की राजनीति करनी होगी। सत्ता है, शोर है, पर सोच नहीं है। मुझे उस सोच का हिसाब चाहिए। जिन झंडों के नीचे इतने सालों में हिसाब नहीं बदला, उनके नीचे खड़े होकर हिसाब नहीं मांगा जा सकता।" — दिव्या मित्तल, पूर्व आईएएस अधिकारी
मैदानी अनुभवों से उपजी राजनीतिक चेतना
दिव्या मित्तल ने अपने प्रशासनिक जीवन के कई संस्मरणों को साझा करते हुए बताया कि कैसे जमीनी हकीकत और दफ्तरों की फाइलों के बीच एक बड़ा फासला होता है। उन्होंने मिर्जापुर के एक पहाड़ी इलाके का जिक्र करते हुए बताया कि वहां एक महिला ने पानी या पेंशन की मांग करने के बजाय अपने गांव के स्कूल में अगली कक्षा शुरू कराने की गुहार लगाई थी। स्कूल की मंजूरी मिलने के बावजूद तीन साल तक निर्माण कार्य शुरू न होना प्रशासनिक व्यवस्था की सुस्ती को साफ दर्शाता है।
उन्होंने सरकारी जमीन के पट्टों और फाइलों से जुड़ी अनियमितताओं का भी हवाला दिया। उनके अनुसार, कई बार फाइलों पर कागजी कार्रवाई पूरी होने के बावजूद धरातल पर वास्तविक कब्जा या राहत नहीं मिल पाती है और जब कारण पूछा जाता है तो ऊपर से मना होने की बात कही जाती है। इन्हीं तमाम व्यवस्थागत कमियों को दूर करने के लिए अब उन्होंने प्रशासनिक दायरे से बाहर निकलकर सीधे जनआंदोलन का रास्ता चुना है।








