फॉर्म-6 में बदलाव को लेकर राजनीतिक गलियारों में गरमाई सियासत
देश में चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर एक बार फिर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के तेजतर्रार राज्यसभा सांसद साकेत गोखले ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए अनिवार्य रूप से भरे जाने वाले 'फॉर्म-6' में हाल ही में जोड़े गए एक नए घोषणा-पत्र को लेकर तीखा हमला बोला है। साकेत गोखले का दावा है कि यह संशोधन बिना किसी विधिवत कानूनी प्रक्रिया और नियमों में बदलाव के किया गया है, जो सीधे तौर पर चुनावी कानूनों का उल्लंघन है।
विपक्षी दलों का मानना है कि चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थानों को इस तरह के नीतिगत बदलावों से पहले संसद और देश के सामने पारदर्शी तरीके से बात रखनी चाहिए। इस मुद्दे के तूल पकड़ने के बाद से राजनीतिक विश्लेषक भी इसे लोकतंत्र और मतदाता अधिकारों के लिहाज से एक बड़ा कदम मान रहे हैं। साकेत गोखले ने इस पूरे मामले को लेकर सार्वजनिक मंचों पर अपनी बात रखते हुए देश के सामने कई अहम दस्तावेज भी पेश किए हैं।
संबंधित खबरें
आरटीआई के खुलासे से सामने आया बड़ा विरोधाभास
साकेत गोखले का यह पूरा विरोध एक आरटीआई (सूचना का अधिकार) के जवाब पर आधारित है, जो उन्होंने कानून मंत्रालय से मांगा था। सांसद के मुताबिक, मंत्रालय ने अपने जवाब में स्पष्ट किया है कि फॉर्म-6 या उससे जुड़े नियमों में किसी भी तरह के संशोधन के संबंध में चुनाव आयोग की तरफ से कोई भी आधिकारिक प्रस्ताव विभाग को नहीं भेजा गया था। जब देश के कानून मंत्रालय के पास ही इस बदलाव की कोई आधिकारिक जानकारी नहीं है, तो यह संशोधन किस आधार पर लागू किया गया, यही इस पूरे विवाद की मुख्य वजह बन गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि चुनाव आयोग को किसी भी फॉर्म या नियमों में संशोधन करने के लिए एक तय प्रक्रिया का पालन करना होता है। यदि बिना कानूनी संशोधन के कोई नया खंड जोड़ा जाता है, तो उसकी वैधता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। टीएमसी सांसद ने इसी तकनीकी और कानूनी खामी को आधार बनाते हुए निर्वाचन आयोग की नीयत पर गंभीर सवालिया निशान लगाए हैं।
नए मतदाताओं के लिए जोड़े गए घोषणा-पत्र से बढ़ी मुश्किलें
विवाद के केंद्र में वह नया घोषणा-पत्र है जिसे जुलाई 2026 के दौरान फॉर्म-6 में जोड़ा गया था। इसके तहत अब देश के नए मतदाताओं से यह जानकारी मांगी जा रही है कि वे पिछली विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के दौरान अपने माता-पिता या दादा-दादी का पुराना वोटर सूची का विवरण दें। आलोचकों और विपक्षी नेताओं का तर्क है कि कई परिवारों के लिए दशकों पुराना रिकॉर्ड खंगालना बेहद मुश्किल काम है, जिससे वास्तविक और पात्र युवाओं को भी मताधिकार मिलने में अनावश्यक बाधा उत्पन्न हो सकती है।
युवाओं के पंजीकरण की प्रक्रिया को जितना सरल होना चाहिए, इस प्रकार के अतिरिक्त दस्तावेजों की मांग से वह उतनी ही जटिल होती जा रही है। देश के विभिन्न हिस्सों से ऐसे कई मामले सामने आ रहे हैं जहाँ पहली बार मतदाता बनने वाले युवा जटिल दस्तावेजों की औपचारिकता के कारण परेशान हो रहे हैं।
सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस और साकेत गोखले के तीखे तेवर
टीएमसी सांसद ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर इस पूरे मामले का कच्चा-चिट्ठा खोलते हुए केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को घेरा है। उन्होंने सिलसिलेवार पोस्ट में लिखा कि बिना कानूनी बदलाव के इस तरह की शर्तें थोपना नागरिकों के अधिकारों पर सीधा प्रहार है।
"नए मतदाताओं के पंजीकरण फॉर्म में मनमाने ढंग से अतिरिक्त घोषणा-पत्र जोड़ना पूरी तरह से गैरकानूनी है। जब कानून मंत्रालय के पास इसका कोई प्रस्ताव ही नहीं था, तो यह बदलाव किसके आदेश पर लागू किया गया?" — साकेत गोखले, राज्यसभा सांसद (TMC)
सांसद के इन बयानों के बाद सोशल मीडिया पर भी आम नागरिक और कानूनी विशेषज्ञ बहस में जुट गए हैं। कई लोग इसे पारदर्शिता के अभाव के रूप में देख रहे हैं, तो कुछ लोग प्रशासनिक सुचिता बनाए रखने के लिए नियमों के कड़े पालन की वकालत कर रहे हैं।
निष्कर्ष और आगे की संभावित कानूनी व राजनीतिक लड़ाई
यह पूरा घटनाक्रम आने वाले दिनों में और तूल पकड़ सकता है। विपक्षी दल संसद के आगामी सत्र में भी इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाने की तैयारी कर रहे हैं। मतदाता सूची जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखना देश के लोकतंत्र के लिए सबसे अहम है। ऐसे में चुनाव आयोग की ओर से इस मामले में कोई आधिकारिक सफाई आती है या नहीं, यह देखना बेहद दिलचस्प होगा। फिलहाल, साकेत गोखले के इन खुलासों ने देश की चुनावी व्यवस्था में एक नया राजनीतिक भूचाल जरूर ला दिया है।






