पहाड़ी राज्यों में राजनीतिक विस्तार की नई रणनीति
देश के उत्तर प्रदेश राज्य की राजनीति में मजबूत पकड़ रखने वाली समाजवादी पार्टी अब पड़ोसी राज्य उत्तराखंड में अपनी सियासी जमीन को मजबूत करने के लिए पूरी तरह से सक्रिय हो गई है। उत्तराखंड विधानसभा चुनावों से पहले पार्टी ने अपनी रणनीतियों को नए सिरे से तैयार करना शुरू कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी का मुख्य उद्देश्य पर्वतीय राज्यों में अपनी खोई हुई राजनीतिक पहचान को दोबारा हासिल करना है, जिसके लिए विपक्षी दलों के 'इंडिया' गठबंधन को एक बड़े मोर्चे के रूप में देखा जा रहा है।
पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि उत्तराखंड में अकेले दम पर सभी सीटों पर चुनाव लड़ना और जीत हासिल करना फिलहाल एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में गठबंधन के बैनर तले चुनाव लड़ने से न सिर्फ पार्टी का जनाधार बढ़ेगा, बल्कि विपक्षी वोटों के बिखराव को भी रोका जा सकेगा। हालांकि, अभी तक कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच सीटों के तालमेल को लेकर कोई अंतिम और आधिकारिक सहमति नहीं बन पाई है, लेकिन अंदरखाने मुलाकातों और वार्ताओं का दौर जारी है।
सपा नेताओं का तर्क है कि राज्य में कई ऐसे इलाके हैं जहां पार्टी का वैचारिक और सांगठनिक आधार पुराना है, लेकिन समय के साथ वह कमजोर होता गया। अब वक्त आ गया है कि उन तमाम पुराने कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं को जोड़कर पार्टी को एक बार फिर से मुख्यधारा की राजनीति में खड़ा किया जाए। इसके लिए केंद्रीय नेतृत्व स्तर पर भी लगातार मंथन किया जा रहा है और उत्तराखंड इकाई को पूरी तरह से सक्रिय कर दिया गया है।
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सपा के सामने सीटों के बंटवारे और विकल्पों की चुनौती
उत्तराखंड में समाजवादी पार्टी के सामने सबसे बड़ी दुविधा सीटों के बंटवारे को लेकर है। राज्य में कांग्रेस पार्टी मुख्य विपक्षी दल के रूप में स्थापित है और उसका सांगठनिक ढांचा सपा की तुलना में काफी मजबूत और व्यापक है। ऐसे में कांग्रेस पार्टी कितनी सीटें सपा के लिए छोड़ेगी, यह सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है। यदि समय रहते सम्मानजनक सीटों पर समझौता नहीं होता है, तो सपा के सामने अन्य विकल्प भी खुले हुए हैं।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यदि इंडिया गठबंधन के तहत बात नहीं बनती है, तो समाजवादी पार्टी के पास या तो केवल कुछ चुनिंदा सीटों पर अपने स्वतंत्र उम्मीदवार उतारने का विकल्प है या फिर वह गठबंधन के अन्य दलों के साथ मिलकर रणनीति बना सकती है। पार्टी नेतृत्व हरसंभव स्थिति से निपटने के लिए अपनी तैयारियों को अंतिम रूप दे रहा है। कार्यकर्ताओं से लगातार फीडबैक लिया जा रहा है कि किन विधानसभा सीटों पर पार्टी की स्थिति सबसे मजबूत है।
सपा की इस रणनीति का असर आने वाले समय में उत्तराखंड के चुनावी समीकरणों पर साफ तौर पर दिखाई दे सकता है। पार्टी उन सीटों पर विशेष फोकस कर रही है जहां पूर्वांचल या उत्तर प्रदेश से आकर बसे लोगों की संख्या अच्छी खासी है। इन इलाकों में सपा अपने पारंपरिक वोट बैंक को साधने की पुरजोर कोशिश में जुटी हुई है ताकि चुनाव के वक्त उसका सीधा फायदा पार्टी उम्मीदवारों को मिल सके।
उत्तराखंड में सपा का पुराना चुनावी इतिहास और उतार-चढ़ाव
उत्तराखंड राज्य के गठन के बाद से ही समाजवादी पार्टी ने यहां अपनी जड़ें जमाने के लिए कड़ा संघर्ष किया है। साल 2004 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को राज्य में अपनी सबसे बड़ी सफलता मिली थी, जब सपा के टिकट पर चुनाव लड़ते हुए राजेंद्र कुमार बाड़ी ने हरिद्वार लोकसभा सीट पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी। उस चुनाव में पार्टी को उत्तराखंड की पांचों लोकसभा सीटों पर कुल 7.93 प्रतिशत वोट मिले थे, जो अब तक का उसका सबसे बेहतरीन प्रदर्शन माना जाता है।
हालांकि, इस शुरुआती सफलता के बाद पार्टी अपने इस प्रदर्शन को कभी दोहरा नहीं पाई। साल दर साल विधानसभा और लोकसभा चुनावों में सपा का मत प्रतिशत लगातार गिरता चला गया। आंकड़ों पर नजर डालें तो साल 2002 के पहले विधानसभा चुनाव में पार्टी को 6.30 प्रतिशत वोट मिले थे, हालांकि तब पार्टी एक भी सीट जीतने में कामयाब नहीं हो पाई थी। इसके बाद साल 2007 में मत प्रतिशत घटकर करीब 5 प्रतिशत रह गया।
आने वाले दशकों में यह गिरावट और भी ज्यादा तेज हो गई। साल 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा का मत प्रतिशत गिरकर 1.4 प्रतिशत पर आ गया, और साल 2017 के चुनाव में यह घटकर मात्र 0.4 प्रतिशत तक सिमट गया। साल 2022 के पिछले विधानसभा चुनाव में भी पार्टी का मत प्रतिशत लगभग 0.3 प्रतिशत के आसपास ही रहा। इन घटते आंकड़ों से साफ है कि पार्टी को अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए अब एक आक्रामक और नए सिरे से रणनीति की सख्त जरूरत है।
शिल्पकार और काश्तकार आरक्षण के जरिए सामाजिक मुद्दों पर फोकस
केवल राजनीतिक गठजोड़ के भरोसे रहने के बजाय समाजवादी पार्टी ने अब राज्य के स्थानीय और ज्वलनशील सामाजिक मुद्दों के जरिए आम जनता के बीच पैठ बनाने की रणनीति बनाई है। पार्टी ने मंडल आयोग की संस्तुतियों के आधार पर उत्तराखंड के शिल्पकार और काश्तकार समुदायों को आरक्षण के दायरे में शामिल करने का बड़ा मुद्दा उठाने का निर्णय लिया है। सपा का मानना है कि इस नीतिगत मांग से राज्य के एक बहुत बड़े वर्ग को सीधा लाभ मिलेगा।
पार्टी नेताओं का तर्क है कि उत्तराखंड के पहाड़ी और मैदानी दोनों ही इलाकों में बड़ी संख्या में लोग काश्तकारी यानी खेती किसानी और पारंपरिक शिल्पकला से जुड़े हुए हैं। यदि इन मेहनतकश समुदायों को आरक्षण का सुरक्षा कवच मिलता है, तो उनके जीवन स्तर में सुधार आएगा और वे मुख्यधारा से जुड़ सकेंगे। सपा इस मुद्दे को जन-जन तक पहुंचाने के लिए आने वाले दिनों में राज्यभर में पदयात्राओं और सम्मेलनों का आयोजन करने की योजना बना रही है।
"समाजवादी पार्टी देश और राज्य स्तर पर इंडिया गठबंधन का पूरी तरह हिस्सा है। उत्तर प्रदेश में जिस तरह हमने कांग्रेस के साथ मिलकर मजबूत सियासी तालमेल बनाया है, उसी प्रकार की सकारात्मक पहल उत्तराखंड में भी किए जाने का पूरा प्रयास जारी है ताकि जनता को एक बेहतर विकल्प दिया जा सके।" — डॉ. सत्यनारायण सचान, राष्ट्रीय सचिव व पूर्व प्रदेश अध्यक्ष, समाजवादी पार्टी
संगठन विस्तार और भविष्य की चुनावी तैयारियां
उत्तराखंड की राजनीति में अपनी पकड़ को दोबारा मजबूत करने के लिए समाजवादी पार्टी जमीनी स्तर पर संगठन को पुनर्जीवित करने में जुट गई है। पार्टी ने जिला स्तर पर नए कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी सौंपनी शुरू कर दी है और युवाओं तथा महिलाओं को पार्टी से जोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाए जा रहे हैं। पार्टी का मानना है कि जब तक बूथ स्तर पर संगठन मजबूत नहीं होगा, तब तक किसी भी गठबंधन का पूरा लाभ चुनावी मैदान में नहीं मिल सकता है।
आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए सपा नेतृत्व ने राज्य के सभी प्रमुख जिलों में बैठकों का दौर तेज कर दिया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता लगातार उत्तराखंड का दौरा कर रहे हैं और स्थानीय मुद्दों पर जनता की नब्ज टटोल रहे हैं। महंगाई, बेरोजगारी, पलायन और स्थानीय अधिकारों जैसे मुद्दों पर भी पार्टी आक्रामक रुख अपनाने की तैयारी कर रही है ताकि पारंपरिक वोट बैंक के अलावा नए मतदाताओं को भी अपनी ओर आकर्षित किया जा सके।
कुल मिलाकर, उत्तराखंड की राजनीतिक फिजा में समाजवादी पार्टी की यह नई हलचल आने वाले विधानसभा चुनावों को बेहद दिलचस्प बनाने का काम कर रही है। यह देखना वाकई दिलचस्प होगा कि क्या 'इंडिया' गठबंधन के सहारे सपा उत्तराखंड के पहाड़ों पर अपनी राजनीतिक साइकिल को रफ्तार देने में कामयाब हो पाती है या नहीं, और कांग्रेस के साथ उसका सीट बंटवारे का समीकरण अंततः किस रूप में सामने आता है।








