नई दिल्ली से ग्राउंड रिपोर्ट — देश के मेडिकल छात्रों के लिए एक बहुत बड़ी राहत भरी खबर सामने आई है। राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग यानी एनएमसी ने एमबीबीएस के छात्रों को फर्स्ट प्रोफेशनल परीक्षा पास करने के लिए एक अतिरिक्त मौका देने का बड़ा फैसला किया है। इस नए नियम के बाद उन हजारों मेडिकल छात्रों की जान में जान आई है जो परीक्षा पास न कर पाने की वजह से अपना भविष्य अधर में देख रहे थे। एनएमसी के इस आदेश से देश भर के मेडिकल कॉलेजों में पढ़ाई कर रहे छात्रों और उनके परिवारों में खुशी की लहर दौड़ गई है।
लंबे समय से छात्र और उनके अभिभावक इस बात की मांग कर रहे थे कि परीक्षा के नियमों में थोड़ी नरमी बरती जाए। कई छात्र पहले साल की परीक्षा तयशुदा चार प्रयासों में पास नहीं कर पा रहे थे। इसके चलते उन्हें मेडिकल कोर्स बीच में ही छोड़ना पड़ रहा था। अब आयोग ने साफ कर दिया है कि छात्रों को एक खास मर्सी अटेम्प्ट यानी दया का मौका दिया जाएगा। इस एक अतिरिक्त मौके के सहारे कमजोर छात्र भी अपनी परीक्षा पास करके आगे की पढ़ाई जारी रख सकेंगे।
फर्स्ट प्रोफेशनल परीक्षा के नियमों में हुआ बड़ा बदलाव
मेडिकल की पढ़ाई में पहला साल यानी फर्स्ट ईयर सबसे कठिन माना जाता है। एनाटॉमी, फिजियोस्लॉजी और बायोकेमिस्ट्री जैसे भारी-भरकम विषयों की वजह से कई नए छात्र तनाव में आ जाते हैं। पहले नियम यह था कि छात्रों को पहले साल की परीक्षा पास करने के लिए केवल सीमित मौके ही मिलते थे। तय सीमा में परीक्षा पास न होने पर छात्रों का एडमिशन रद्द कर दिया जाता था और उनका डॉक्टर बनने का सपना टूट जाता था। कोर्ट के फैसलों और छात्र संगठनों की अपीलों के बाद आखिरकार एनएमसी ने इस नियम में बड़ा बदलाव कर दिया है।
नए दिशा-निर्देशों के मुताबिक अब छात्रों को एमबीबीएस की पूरी डिग्री हासिल करने के लिए कुल दस साल का समय मिलेगा। इसका मतलब यह हुआ कि अगर कोई छात्र किसी साल फेल हो जाता है या कोर्स में पीछे छूट जाता है, तो भी वह दस साल के भीतर अपनी डिग्री पूरी कर सकता है। यह फैसला उन छात्रों के लिए संजीवनी बूटी साबित होगा जो किसी बीमारी, पारिवारिक मुसीबत या अन्य कारणों से अपनी पढ़ाई समय पर पूरी नहीं कर पाए थे।
दस साल में एमबीबीएस पूरी करने का क्या है पूरा गणित
अदालतों ने भी एनएमसी के इन कड़े और अनुशासित नियमों को छात्रों के हित में और सही ठहराया है। अदालत का मानना है कि डॉक्टर बनने की पढ़ाई देश की सेहत से जुड़ी है इसलिए इसमें पूरी सख्ती जरूरी है। लेकिन साथ ही मानवीय दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए छात्रों को कुछ अतिरिक्त समय देना भी लाजिमी था। यही वजह है कि एनएमसी ने अपने पुराने और सख्त ढांचे में थोड़ा लचीलापन दिखाते हुए यह नया रास्ता निकाला है।
देशभर के तमाम मेडिकल कॉलेजों के प्राचार्यों और प्रशासनिक अधिकारियों को एनएमसी के नए आदेशों की जानकारी भेज दी गई है। कॉलेज प्रशासन अब उन छात्रों की सूची तैयार कर रहा है जो इस अतिरिक्त मर्सी अटेम्प्ट के दायरे में आते हैं। कॉलेजों को यह भी निर्देश दिए गए हैं कि वे तनाव में रहने वाले छात्रों की काउंसलिंग करें ताकि वे मानसिक रूप से मजबूत होकर अपनी परीक्षा की तैयारी कर सकें।
छात्रों के मानसिक तनाव को कम करने की दिशा में बड़ा कदम
द फ्रीलान्स की टीम ने जब कुछ मेडिकल छात्रों से इस बारे में बात की तो उन्होंने राहत की सांस ली। छात्रों का कहना था कि पहले साल का डर उनके मन में हमेशा बना रहता था। कई बार दबाव इतना ज्यादा होता था कि छात्र गलत कदम उठाने तक का सोच लेते थे। एनएमसी के इस फैसले से अब उन पर से तलवार लटकनी बंद हो जाएगी। वे शांत मन से अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे सकेंगे और बिना किसी डर के परीक्षा में बैठ सकेंगे।
यह पूरा मामला देश की चिकित्सा शिक्षा व्यवस्था में सुधार की एक बड़ी बानगी पेश करता है। एक तरफ जहां डॉक्टर की पढ़ाई की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ छात्रों की मानवीय और व्यावहारिक समस्याओं का भी पूरा ख्याल रखा जा रहा है। आने वाले दिनों में इस नए नियम से मेडिकल कॉलेजों में फेल होने वाले छात्रों की संख्या में कमी आएगी और अधिक से अधिक छात्र अपनी डिग्री सफलतापूक पूरी कर पाएंगे।











