उत्तर प्रदेश की राजनीति में सीटों को लेकर बढ़ी तल्खी
उत्तर प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य में 'INDIA' गठबंधन के भीतर आगामी चुनावी रणनीति और सीटों के बंटवारे को लेकर घमासान मचा हुआ है। समाजवादी पार्टी (SP) और कांग्रेस के बीच भले ही विपक्षी गठबंधन के तहत हाथ मिलाया गया हो, लेकिन समय-समय पर दोनों दलों के नेताओं के बीच तीखे बयानों का दौर सामने आता रहता है। इस कड़ी में प्रतापगढ़ से समाजवादी पार्टी के सांसद शिवपाल सिंह पटेल (डॉ. एस. पी. सिंह पटेल) ने कांग्रेस पार्टी और उसके शीर्ष नेतृत्व को लेकर एक ऐसा सनसनीखेज बयान दिया है, जिससे राजनीतिक सरगर्मी काफी बढ़ गई है।
सांसद शिवपाल सिंह पटेल ने एक साक्षात्कार के दौरान खुलकर अपनी बात रखते हुए दावा किया कि वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस की स्थिति बेहद कमजोर थी। उनके मुताबिक, यदि समाजवादी पार्टी ने सूबे में कांग्रेस का साथ न दिया होता, तो राज्य के अंदर कांग्रेस का खाता तक नहीं खुल पाता। उन्होंने यहां तक कह दिया कि गांधी परिवार की पारंपरिक मानी जाने वाली सीटों पर भी कांग्रेस के नेता चुनाव मैदान में उतरने से कतरा रहे थे और उनके भीतर एक प्रकार का डर साफ तौर पर दिखाई दे रहा था।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश जैसे अहम राज्य में जहां विधानसभा के आगामी चुनाव और स्थानीय निकाय चुनावों की सरगर्मी शुरू हो रही है, ऐसे में इस तरह के बयान गठबंधन के भीतर आपसी भरोसे पर सवालिया निशान खड़े करते हैं। हालांकि, दोनों दलों के राष्ट्रीय नेतृत्व की ओर से अक्सर साथ मिलकर चुनाव लड़ने और भाजपा को कड़ी टक्कर देने की बात कही जाती है, लेकिन जमीनी स्तर पर नेताओं की बयानबाजी अलग ही कहानी बयां कर रही है।
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अखिलेश यादव के कड़े रुख के बाद मैदान में उतरे राहुल गांधी
सपा सांसद शिवपाल सिंह पटेल ने अपने बयान में सबसे बड़ा दावा राहुल गांधी के चुनाव लड़ने को लेकर किया है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और सांसद राहुल गांधी रायबरेली से चुनाव लड़ने को लेकर बिल्कुल भी आश्वस्त नहीं थे और वे इस पारंपरिक सीट को भी छोड़ने का मन बना चुके थे। उन्होंने अमेठी और रायबरेली क्षेत्र को लेकर यह भी टिप्पणी की कि वहां से कांग्रेस नेतृत्व दूरी बनाने का विचार कर रहा था।
सांसद पटेल के अनुसार, यह समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव का मजबूत राजनीतिक हस्तक्षेप और स्पष्ट रुख था, जिसके कारण राहुल गांधी को रायबरेली से उम्मीदवार बनना पड़ा। उन्होंने विस्तार से बताया कि अखिलेश यादव ने न केवल कांग्रेस नेतृत्व को जीत का पूरा भरोसा दिलाया, बल्कि यह चेतावनी भी दी थी कि यदि कांग्रेस इस सीट पर अपना उम्मीदवार नहीं उतारेगी, तो समाजवादी पार्टी वहां से अपना प्रत्याशी मैदान में उतार देगी। इसी दबाव और राजनीतिक रणनीति के तहत आखिरकार राहुल गांधी ने मैदान में उतरने का फैसला किया।
"अगर समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन न होता, तो कांग्रेस यूपी में एक भी सीट नहीं जीत पाती। हालात यह थे कि उनके शीर्ष नेता राहुल गांधी तो सीट छोड़ने तक को तैयार थे। हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने जब उन्हें भरोसा दिलाया और चेतावनी दी कि अगर वे नहीं लड़े तो सपा अपना उम्मीदवार उतार देगी, तब जाकर गांधी चुनाव लड़ने के लिए तैयार हुए।" — शिवपाल सिंह पटेल, समाजवादी पार्टी सांसद
सपा सांसद ने यह भी स्पष्ट किया कि रायबरेली निर्वाचन क्षेत्र में राहुल गांधी की जीत में कांग्रेस के खुद के संसाधनों से ज्यादा समाजवादी पार्टी के एक-एक कार्यकर्ता, कैडर और मजबूत वोटबैंक की सबसे बड़ी भूमिका रही है। उन्होंने कहा कि सपा के स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं ने पूरी निष्ठा के साथ इस सीट पर गठबंधन के प्रत्याशी को जिताने के लिए जमीन पर काम किया था।
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ही गठबंधन का 'बड़ा भाई'
राज्य की राजनीति में अपनी पार्टी के दबदबे को रेखांकित करते हुए सांसद शिवपाल सिंह पटेल ने आंकड़ों का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश की मौजूदा राजनीतिक वास्तविकताओं को कांग्रेस पार्टी को स्वीकार करना चाहिए। विधानसभा में 101 विधायकों और लोकसभा में 37 सांसदों की ताकत के साथ समाजवादी पार्टी इस गठबंधन में निर्विवाद रूप से 'बड़ा भाई' की भूमिका निभा रही है।
उन्होंने पिछले लोकसभा चुनाव के परिणामों का जिक्र करते हुए कहा कि समाजवादी पार्टी ने अपने दम पर उत्तर प्रदेश में 37 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस पार्टी महज 6 सीटों पर सिमट गई थी। इसके अलावा 403 सदस्यों वाली उत्तर प्रदेश विधानसभा में कांग्रेस के पास केवल 2 विधायक हैं। ऐसी स्थिति में कांग्रेस की ओर से 50 से अधिक सीटों की मांग करना पूरी तरह से अनुचित और व्यावहारिक धरातल से दूर है। सपा सांसद ने दो टूक शब्दों में कहा कि कांग्रेस को अपनी ज़मीनी ताकत का आकलन करना चाहिए और राज्य में बड़े दल की भूमिका का सम्मान करते हुए आगे की रणनीति तय करनी चाहिए।
उन्होंने यह भी चेतावनी भरे लहजे में कहा कि यदि कांग्रेस आगामी चुनावों में अकेले अपने दम पर लड़ने की गलती दोहराती है, तो उत्तर प्रदेश की जनता उसे पूरी तरह नकार देगी और वह राज्य में पूरी तरह शून्य पर आ जाएगी। जनता अब सब जानती है और किसी भी दल को सिर्फ वोट काटने वाली पार्टी के रूप में स्वीकार नहीं करेगी।
नेतृत्व परिवर्तन और सामाजिक समीकरणों पर सपा का तंज
हाल ही में उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी में किए गए संगठनात्मक बदलावों पर भी सपा सांसद ने तीखा कटाक्ष किया। कांग्रेस द्वारा ब्राह्मण चेहरे को प्रदेश अध्यक्ष और मुस्लिम चेहरे को कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने के फॉर्मूले पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि इस तरह के जोड़-तोड़ से धरातल पर कोई राजनीतिक चमत्कार नहीं होने वाला है।
पटेल ने दावा किया कि उत्तर प्रदेश का दलित और पिछड़ा वर्ग अब कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों की नीतियों से पूरी तरह ऊब चुका है। यह बड़ा मतदाता वर्ग अब समाजवादी पार्टी की लोहियावादी और सामाजिक न्याय की विचारधारा के साथ मजबूती से जुड़ चुका है। उन्होंने कहा कि जनता अब खोखले वादों और सतही समीकरणों के झांसे में आने वाली नहीं है, बल्कि वह ज़मीन पर काम करने वाली ताकतों के साथ खड़ी है।
दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी हाल ही में सोशल मीडिया के माध्यम से सीट बंटवारे की खींचतान के बीच स्पष्ट संदेश दिया था कि 'बात सीट की नहीं, जीत की है।' उन्होंने जोर दिया था कि गठबंधन का मुख्य उद्देश्य देश के संविधान, लोकतंत्र और आरक्षण की रक्षा करना तथा सांप्रदायिक ताकतों को रोकना होना चाहिए। बहरहाल, सपा सांसदों और नेताओं के इस तरह के बयानों से साफ जाहिर है कि आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश के विपक्षी खेमे में सीटों के तालमेल को लेकर राह इतनी आसान नहीं रहने वाली है।






